समर्थक

सितंबर 02, 2013

शबनमी बूँदें ---

रातें गुमसुम सी थीं
बातें कुछ भी ना हुई थीं
सिलसिला यही चलता रहा गर्मियों में कहाँ कुछ सुनने को मिला

जाड़े की ठिठुरन भरी रात
बागीचे की हरी चटाई पर
गुपचुप हुई कई बात
सुनगुन हमने भी सुनी
खिड़की खोलकर बाहर
देखने की हिम्मत ना हुई

सुबह होते ही खिड़की खोली
हरी हरी चटाई भीगी मिली

मैंने सोचा-
आज कितना रोई होगी चांदनी
चाँद से जब यूँ अरसे बाद मिली
महीनों के उसने ग़म बांटे होंगे
ख़ुशी से भी आँखें छलकी होंगी
चाँद नहीं भर पाया होगा अंजुली में
वह भी इस दुःख में रो ही दिया होगा

प्रिय चांदनी की आँखों का आँसू
हरी चादर ने जमीं में न गिरने दिया होगा
दोनों के प्यार भरे वार्तालाप को
कुछ यूँ ही उसने
अपनी झोली में संजोया होगा

देख शबनमी बूँदें
कुछ इस कदर मैं भी खोयी
कि चढ़ते सूरज की किरणों से ही जागी
देखा-
देखते-देखते ओस की बूँदें
आँखों से ओझल हुईं
सूरज की तपिश को
प्यार भरी ओस की बूँदें
भला कैसे सह पातीं

सूरज की लाल लाल आँखों में
समाहित जैसे वो हों गयीं |..सविता मिश्रा

कोई टिप्पणी नहीं: