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मार्च 19, 2015

~~कृपया कोई जुगत बताओ ~~

मन में रोज सवाल उठता था
हिम्मत ना हुई पूछने की
पर आज अपनी
पूरी हिम्मत को जुटा कर
पूछ रहे हैं
अपने ही आस्तीन में
पलते हुए सांप से-
क्यों सांप नाथ
आप बताएगें,
आप में और जंगल के
बिलों में रहने वाले
सांपो में फर्क क्या हैं?

सांप ने सवाल सुन
पहले आँखे तरेरी
फिर की लाल-पीली
गुस्से से फुंफकार कर बोला-
क्या तुझे
यह भी नहीं पता?

जंगल में रहने वाला सांप
थोड़ा शरीफ होता है
बिना छेड़खानी किये
नहीं काटता किसी इंसान को।

पर मैं थोड़ा हट के हूँ
जो मुझे पालता हैं
मौका मिलते ही
उसी को पहले डंसता हूँ।
अपने अजीज को भी नहीं छोड़ता
इसी लिए तो आस्तीनों में पलता हूँ।

हम सुन थोड़ा सकपका गये
आस्तीन से कैसे हटायें
कृपया कोई जुगत बताओ|....सविता मिश्रा

मार्च 15, 2015

~~हम तुम्हारी ही परछाई है~~

अर्धांगनी है तुम्हारी
तुम्हारे साथ ही जीना-मरना है
हम तुम्हारी ही परछाई है
परछाई की तरह ही साथ रहना है
जब जब तुम लड़खड़ा कर गिरोंगे
बढ़कर हम थाम लेंगे तुम्हें
जो तुम देख नहीं पाओंगे
वो चीज भी दिखायेंगे तुम्हें,
भटक गए यदि कही दो राहें पर
तो मंजिल का पता बताएगें तुम्हें,
जब कभी तुम हमें आवाज दें पुकारोंगे
सब कुछ छोड़ पास तुम्हारें दौड़े आएगें
जब जब तुम संकट में होंगे
वादा है हमारा हम साथ ही होंगे तुम्हारें ,
पर एक प्रार्थना है हमारी तुमसे
हमें अपने दिल में यू ही बसायें रखना ,
प्यार करते हो तुम जितना हमसे सनम
उसे यूँ ही सदैव हृदय में बनायें रखना |
+++++ सविता मिश्रा +++++

बस यूँ ही

१....
मेरे हुनर का होगा देखना ऐसा कमाल कि
दुश्मन को भी होगा मेरे मरने का मलाल |....सविता

२...
शांति मिली कहाँ, यहाँ कभी शांति से
करनी पड़ी अशांति, अक्सर शांति से | ,...सविता

३ ...
ऐसे-ऐसे ना जाने कैसे कैसे ....कैसे होकर अपना रूप दिखाते हैं
हम सीधे साधे सच्चे होकर भी बस मुहं ताकते रह जाते हैं| सविता

४....
प्यार के दो बोल बोलता था कोई जेहन में शहद सा घोलता था कोई
ना जानें क्यों अब क्या हुआ ना वह बोलता ना हम ही बोलतें| ...सविता मिश्रा

५...
कद और पद के घमंड में कितने लोग देखो हुए हैं चूर
और कहीं कद पद की मर्यादा भंग कर हुए हैं मगरूर
| ...सविता मिश्रा

मार्च 11, 2015

~उलझा विवाद~

बस अभी ऐसे ही लिख आये कैसे क्यों लिखे पता नहीं
Veeru Sonker bhai ki परेशानी पर
.....

उलझा विवाद
सुलझा क्या कभी
उलझता गया
जितना सुलझाया
तू तड़ाक कर
ख़त्म होते होते भी
फिर उलझा
ऐसे क्या सुलझा कभी
सुलझते उलझते

उलझते सुलझते

हम ही उलझ कर रह गये
बहती नदी के साथ
बहते बहते बह गये
ऐसा नहीं है कि
रुकना नहीं चाहा
चाहा ...
बहुत चाहा पर
क्या कभी रुक पाया
बल्कि लपेट लिया उसने
आस पास बहती
सारी नदी नालियों को | सविता बस यूँ ही

~बेटा ! तू क्या समझेगा ~

यह कविता हम यही फेसबुक पर किसी का स्टेटस पढ़े थे उसको पढ़ने के बाद लिखी वह भी स्टेटस अपने भाई के गंगा में डूब जाने पर थी .वह अपनी माँ पर कविता लिखना चाहते थे जहा तक हमें याद है बहुत दिन हो गया पढ़े अतः याद नहीं पर हा वह कवि ही कोई होगे यह अवश्य पता ..पता नहीं हम उनकी भावना को समझ पाए या नहीं पर इन पंक्तियों में अपनी भावना जरुर व्यक्त की है ........यह पंक्तिया उन भाई को समर्पित करते है ................
बेटा !
तू क्या समझेगा
माँ की वेदना
कभी
तू बेटा है अ
भी
बाप बनेगा कभी
पर माँ नहीं बन पायेगा |
बिन माँ बने कैसे समझेगा
माँ की भावनाएं
कैसे दर्द को
उसके
अपने अंतःकरण से
महसूस कर पायेंगा |
ढ़ेर सारी तकलीफ सह
जन्म दिया उसने
नाज-नखरे उठा तेरे
किया था बड़ा उसने |
जब वही अकाल ही
काल के गर्त में
समां जाता है
कितना कष्ट होता है
तू क्या समझेगा ?
आँख से पानी नहीं खून रिसता है
दिल भी पल-पल हर क्षण रोता है |
दिखे तुम्हें अश्रु भले ही ना
पर आँखे भर आती है
हर क्षण, पल पल
याद कर वह लम्हां |
शरीर क्या वह तो
लाश बन रह जाती है
तेरे लिए ही बस
सब कुछ सह जाती है |
बेटा !
तू क्या समझेगा
कभी माँ की बेदना
माँ को बहुत कुछ
पड़ता है सहना ..
बहुत ही सहना ...
ऐसे मंजर ना हो घटित
कभी किसी माँ के जीवन में
बस कर सकना तो यही
प्रार्थना तुम!
प्रभु के आगे सदैव  करना || .सविता मिश्रा

मार्च 05, 2015

लंगूर बन के --

हम नारियाँ 
गुझियाँ पापड़ और पकवान 
बना बना करके  
थक हार गयें हैं 
इस कारण चुप बैठे हैं 
 होली में भी मन मार के

  चुप्पी जो तोड़ दी हमने
 रह जाओगें हक्के-बक्के
 रंग जो चढ़ गया तो
 होली खेलेगें फिर हम 
खूब ही छक के

 जो चल रहे हों यहाँ 
तुम सब तन तन के
 फिरोगे फिर भीगी बिल्ली 
तुम सब बन-बन के

 बच्चो की सी पिचकारी 
इधर-उधर लिए हो फिरते
 दम नहीं हैं कोई 
गुलाल लगाये
 हाथ में अपने मल के
  भंग के नशे में होकर सब 
जो आ रहे हों उछल-उछल के
 भंग उतरते ही मिलोगें कहीं
किसी कोई में ही
सारे के सारे तुम सब दुबके

 सभी जरा होली खेलना 
हम सब से संभल संभल के
 वरना बच के जा भी नहीं पाओगें
सबके सब निकलोगें यहाँ से
लाल पीले लंगूर बन के|...सविता मिश्रा