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जनवरी 13, 2017

पुस्तक मेला जनवरी २०१७ - एक रिपोर्ट

यकीं मानिये मेले के नाम से ही हम दस कदम दूर ही रहते थे| जहाँ तक हमें याद कोई भी मेला घूमने की चाहत हमने कभी न की| लेकिन पुस्तक मेला सुनकर इस बार कुछ कुछ हुआ |
पुस्तक मेला घूम आने के कई कारण थे| एक तो अपनी साँझा संग्रहों का विमोचन| दूसरे कई लोगों से मिलकर उनसे मिलें स्नेह-प्यार को सहेज लेने की चाहत| तीसरे अपनों की ख़ुशी में शामिल होना|
कई लोगों से आत्मीयता से मिलना बड़ा अच्छा लगा| कई दिन तक ये सारी यादें बनी रहेंगी| जो आभासी से निकल धरातल पर मिलें वह हमें याद रखे या न रखे किन्तु इस बात की ख़ुशी है कि कई साँझा संग्रह और पत्रिकाओं में हमने अपना नाम दर्ज करा दिये है|
कोई और जाने या न जाने पर किताब में मेरा पड़ोसी अपना देखते समय हमें भी देख ही लेगा, आखिर हम किताब में उसके पड़ोसी जो ठहरे| जैसे हमने 'अपने अपने क्षितिज' में अपना देखते समय आगे सुकेश साहनी भैया को देखे| मेले में भी नजर गयी थी लेकिन देखे से लगते हुए भी हमें पता न चला कि ये लघुकथा के गुरु| पहली लघुकथा वेबसाईट चलाने वाले व्यक्ति हैं| फेसबुक पर न जाने कब निमंत्रण उन्होंने स्वीकार किया यह पता ही न चला| वरना शायद फोटो देखते तो पहचान लेते | अफ़सोस की सामने देखकर भी हम उनसे मिल न पाये|
दिल्ली में सुन रहे थे कि ठण्ड बहुत है, अतः सुबह सबेरे घने कोहरे में जब हम 8 जनवरी को आगरा से लगभग 8:३० बजे चले तो ठंड से बचने के लिए कोटप्रूफ थे| मन में था कि समय से पहुँच पायेंगे भी कि न| कार में बैठे बैठे यह लाइन सूझी --
अभी कोहरा फिर धूप फिर वही घना कोहरा छाया
सूरज की किरणों को घमंडी बादल रोकता ही आया|sm

पर ड्राइवर का हुनर ऐसा कि हम 11:३० के लगभग विमोचन हॉल के पास पहुँच चुके थे| समझ न आते हुए भी बेटे के साथ चलते चल रहे थे कि प्रभाकर भैया को देख लगा अब तो भैया के जरिये ही सही पहुँच जायेंगे क्योंकि पूछने पर पता चला भैया वहीं (वनिका पब्लिकेशन के स्टैंड पर) जा रहें हैं|
बुक फेयर गेट से अंदर आने में तो भूलभुलैया था ही किन्तु अन्दर पहुँचकर और ज्यादा भूलभुलैया हो गया था| शायद आधे घंटे तो लगी गए थे वनिका पब्लिकेशन तक पहुचंने में| आदरणीया नीरज दी बड़े गर्मजोशी से मिलते हुए बोलीं अब सविता आ गयी, अब करते हैं विमोचन| यानि विमोचन न हुआ था तब तक| niraj दीदी इतनी अच्छी इतनी प्यारी की शब्द न अपने पास| मिलकर लगा किसी ख़ास अपनी दी से ही मिल रहे हम|

वैसे हमें इस मेले को अटैंड करके एक बात बड़ी प्रभावित कर रहीं कि हमसे बड़ी उम्र के लोगों की याददाश्त कितनी दुरुस्त है| अब कभी मुलाकात हुई तो पूछेंगे कि भैया किस चक्की का आटा खातें हैं आप लोग| अपनी तो इस उम्र में ही ये हाल कि दरवाजा बंद करके भी निकले तो रास्ते भर यह सोचते रहते कि ताला बंद किया था सही से या न| पर्स में मोबाईल डाल के निकले तो घर आने के बाद भी मोबाईल कभी कभी दुसरे दिन पर्स से निकलता| बिना नाम किसी का लिए नाम कैसे लोग याद रख लेंतें लोग| हम तो दस बार नाम लेके बोलें तो याद रहेगा फिर शायद किसी का नाम|
कौन सबसे पहले मिला यह याद न क्योंकि कई फेसबुक चेहरे सामने देख हम विस्मित से थे| ज्योत्सना या नीता सखी पहले मिलीं शायद| ज्योत्सना ने तो दिन रोशन कर दिया था कॉलगेट के प्रचार से| हँसती- खिलखिलाती हुई रही| नीता सखी तो बहुत ज्यादा हर्षित होकर गले मिली| लगा ही न कि यह पहली मुलाकात| इतनी सरलता अच्छे स्वभाव का परिचायक ही तो है|
असल में फेसबुक पर हम जब आपस में मिलते रहते तो अनजान से न रहते| पोस्ट पढ़के एक दूजे को अच्छे से जान समझ लेते| इसीलिए शायद आभासी दुनिया जब सामने मिली तो पहले विशवास ही न हुआ| लेकिन एक दूजे के गले लगके हम सब ने अपने को शायद अहसास कराया कि हम जमीनी हकीकत में मिल रहें | कल्पना भट्ट दी जो अब तक हमें फालो कर रहीं थीं यह न की जुड़ी होतीं तो हम पहचान भी लेते, लेकिन फिर भी आपसे और महिमा सखी से मिलकर लगा ही न कि यह पहली मुलाकात है| फेसबुक पर भी शायद आमना समाना न हुआ था ज्यादा आप दोनों जन से|
सरलता की मूरत शोभा रस्तोगी सखी, विनय पवार दी जो अब तक हमें दी बोल खुद छोटी बन रहीं थीं, वैसे उम्र ने आपको मात न दी है और मासाल्लाह ताकत और हिम्मत भी आपमें खूब है, भगवान करें बना रहे यह सब| रेणुका चितकारा जो माहिलाओं की टोली की सबसे कम उम्र की प्यारी सी बहन से दूसरी मुलाकात थी|
पहली बार तो कई से मिले, लेकिन फेसबुक पर मुलाकात कई बार कहीं न कहीं हो चुकी थी।

पुस्तक मेला था या मिलन समारोह कहना मुश्किल जरा | अपने आपको ऐसे देख एक बात यह भी सोच रहे कि शायद समय ने हमारे स्वभाव और सिन्धांत में परिवर्तन ले आ दिया है| सही कहतें थें पूर्वज कि समय बड़ा बलवान होता है| वह सब को बदलने की शक्ति रखता है| कभी समय था कि न किसी से मिलते न घर से निकलते थे|😊

वनिका पब्लिकेशन्स पर पहले विमोचन हुआ साझा लघुकथा संकलन 'अपने अपने क्षितिज' का फिर दो लघुकथा संग्रह का विमोचन हुआ| फिर बालकथा की पुस्तक 'कटी पतंग' और 'व्यंग्य बत्तीसी' का विमोचन हुआ| सब के साक्षी रहे हम|






कुल मिला के बरिष्ठो से, जिनसे अब तक कोई बात न हुई उनसे पुस्तक मेले में मिलकर आगे बढ़ या तस्वीर लेने को कहे, ऐसी हिम्मत न हुई जल्दी| लेकिन Ashok Jain भैया जब आगे बढ़ के बोलें तो थोड़ी जिझक खुली, फिर तो जिनसे बात हुई या जो जाने या थोड़ा अनजाने दिखे सब के साथ ली हमने तस्वीर। कह सकते हम कि तस्वीरें भी मिली कईयों के साथ, ढ़ेरों आत्मीयता भी और अच्छा लेखन करने की टिप्स भी। Ashok Bhatia भैया अनिल शूर भैया Subhash Neerav भैया से।
ऐसे साहित्य समारोह में शामिल होते रहे और झिझक खुलती रही। (आदमी धीरे धीरे खुल जाता, यह मानव प्रकृति। )
कुसुम जोशी दी जिन्हें हम चेहरे से खूब पहचान रहे थे बाद में किसी से नाम पूछे तो याद आया कि ग्रुपों में इनसे मुलाकात हुई है अपनी| बड़ी ही शांत, गम्भीर स्वभाव की धनी दी से भी मिलकर बहुत ख़ुशी हुई| अब तो हमने निमंत्रण भेज अपने फेसबुक परिवार में भी शामिल कर लिया है उनको| आ.नीरजा मेहता कमलिनी दी को देखा हमने पर परिचित नही थे अतः हिम्मत ही न हुई कि ऐसे जाके मिलें| सबसे बड़ी बात लगता है क्या परिचय देकर मिलें| वंदना दी जो कई सालों से जुड़ी हैं फेसबुक पर, उनसे भी मुलाकात पहली बार ही हुई| शशी पाण्डेय जिनसे दूसरी मुलाकात पर शायद वह हमें न पहचानी| उनका व्यंग्य हम सुन चुके थे लाइव और साथ में तस्वीर भी ली थी| वहीं प्रवीण कुमार भी दिखे जो पहचाते हुएअपना परिचय दिये | नाम भले न याद था लेकिन शक्ल से हम भी पहचान लिए थे भाई को|
मधु खंडेलवाल दीदी जैसे ही आई हम पहचान लिए क्योंकि उन्होंने अपनी तुरन्त की पिक लगाकर एक पोस्ट डालीं थी| कलछी का स्वादिष्ट प्रसाद बनाकर लायीं थीं| दिल में बसना हो तो पेट से होकर गुजरिये | उन्होंने इस कहावत को अंगीकार कर यह सफ़र बखूबी तय किया|

संदीप तोमर भाई और सतविंदर भाई अकेले खड़े कुछ बिसूर से रहे थें, शायद सोच रहें थे कि ये औरतें कितना बोलतीं हैं| दोनों को देखते ही हम पहचान गये थे| संदीप भाई को पहचानने का कारण था कि हम उन्हें हटा दिये थे | किसी तस्वीर से हम उन्हें गलत जज कर लिए थे| बाद में पता चला की लघुकथाकार तो फिर हमने ही निमंत्रण भेजा|
शब्द मसीहा जी,वीरेन्द्र वीर मेहता भैया, विनय मिश्र भैया से बस आमना सामान हुआ| तीनों जन से हमारी दूसरी मुलाकात थी| बलराम अग्रवाल भैया से भी दूसरी बार मिले थे, बड़े सीधे सहज और सरल व्यक्ति सभी|
मुकेश दुबे भैया जो सुरेश प्रभु महोदय की वजह से देर से पहुँचे लेकिन हम थे की डटे थे विमोचन के लिए| करते भी क्या दोष तो उनका न सही उनके अंडर में चलने वाली ट्रेन का ही सही| वक्तव्य भी उनका उतना ही शानदार जितना कि वो| सुभाष नीरव भैया का भी उसी समय दिया वक्तव्य सुनकर अच्छा लगा| कुछ हुनर भी बताये उन्होंने लिखने के|
वैसे सयानों से यह पता चला भाव हो और शब्दों से खेलने का हुनर मालूम हो तो आदमी कहीं भी झंडे गाड़ सकता|
'खिल उठे पलाश' तथा अंत में झांनवाद्दन का विमोचन हुआ जिसमें हम उपस्थित रहे| प्यार से दो शब्द लिखकर आप दोनों जन की हस्ताक्षरित झाँनवाद्दन और 'खिल उठे पलाश' पाकर ख़ुशी हुई| या कहे पलाश की तरह खिलके वादन कर रहे आप सब के मिलने की ख़ुशी में|


मठरी और मिठाई बांटी गयी| मठरी खाकर बिना पानी के हालत खराब हो गयी| पानी भूल जाना खलने लगा था| कहीं भी जाये पानी लेके जरुर जाये| (सीख भी)
जहाँ चार नारियां मिली जाये वहीँ सभा बैठी जाये| सभा होती रही| इस सभा में विघ्न न हों इस चक्कर में कई जनों से मिलना रह गया पुस्तक मेले में| जबकि सारी नारियाँ धीरे- धीरे सरक लीं|
हम किसी का साथ ले जाने वाले थे कि निर्देश निधि दी ने अपनी पुस्तक विमोचन के लिए रुकने को कहा| विमोचन हुआ वहां एक महिला जो बहुत अच्छा बोल रहीं थी उनका सुनने की कोशिश कर रहे थे पर सुन न पा रहे थे | तभी नीलिमा दी आकर बोली चल घूम आते| उनके साथ वंदना दी के स्टॉल से होते हुए ayan प्रकाशन पर पहुँचे| हमें कंफ्यूजन था कि अनवरत का भी विमोचन होना| पर नहीं सुनकर थोड़ा दुःख हुआ| क्योकि फिर न जा पाते| खैर स्वभाव से सरल भूपी अंकल और वात्सल्यी प्रभा सूद आंटी के साथ तस्वीरें लीं हम दोनों ने| और थोड़ी बात भी की | बात ज्यादा गहराई में जाती इससे पहले हम दी को चलिए कह चल पड़े| वहीँ बलजीत रैना भैया मिलें जो न जाने कैसे पहचान रहें थे हमें| उन्होंने दी और हमारे साथ सेल्फी लीं|
घूम के हम आ गये फिर वनिका ही पर| समारोह हो चूका था| हमने निर्देश दी के साथ तस्वीरें लीं| वहीं उनकी भतीजी प्यारी सी Anupam Ahalavat sis मिलीं| अंजू दी से भी प्यारी सी मुलाकात हुई| जितनी बार नीलिमा दी से उतनी ही बार अंजू दी से मुलाकात हो चुकी| दोनों जन का ही स्वभाव बहुत ज्यादा सरल|

'खिल उठे पलाश' तथा अंत में झांनवाद्दन का विमोचन हुआ जिसमें हम उपस्थित रहे| प्यार से दो शब्द लिखकर आप दोनों जन की हस्ताक्षरित झाँनवाद्दन और 'खिल उठे पलाश' पाकर ख़ुशी हुई|

















































































राकेश भैया से मुलाकात हुई दर्शन तो हमें उनके करने ही थे आखिर देखना था कि गम्भीर शब्द चोर कइसे हो गए😁 बहुत सहज व्यक्ति| लेकिन एक बात पर हंसी ही न रुकी कि वह कोट उतारने के बाद हमें पहचान ही न पाये| जबकि उससे पहले मिलके हम सब तस्वीरें खींचा चुके थे| फिर सोचकर ख़ुशी हुई कि अपने से भी ज्यादा लोग भुल्लकड़ यहाँ| अपनी कटेगरी में उन्हें खड़ा पाकर अपार प्रसन्नता हुई|

अकेले दिशा स्टॉल टाक चले लेकिन भुलभूला गये| रस्ते में एक बात और दिखी मुफ्त में बंटती हुई इसाई धर्म की प्रचार करती पुस्तक | मुफ्त ही सही लेकिन कोई पुस्तक-छोटी डायरी हाथ में आयेगी तो आदमी देखेगा ही हमने भी देखी| हाथ में पकड़ते समय हमें लगा नया नियम नाम से कोई क़ानूनी पुस्तक होगी| यह अच्छी बात जागरूकता फैला रहे मुफ्त बाँट के| किन्तु घर एके देखने पर कुछ और निकला| किसी धर्म का विरोध करने का मकसद न अपना बल्कि हर धर्म में ऐसा हो यह कहना चाह रहे बस|

वैसे जहाँ लोग इस 'नया नियम' को मुफ्त लेने से भी कतरा रहें थे वहीं गीता प्रकाशन की स्टॉल पर खूब भीड़ थी भीड़ में कौन घुसे हमने बाहर से ही देखकर लौट चले|
सुधीर द्विवेदी भाई का सम्मान होता हुआ हमें देखना था| लेकिन हम दिशा स्टॉल खोज ही न पाये| घूमफिर के फिर नीरज दी की स्टॉल के सामने आ गये| दीदी ने हमें देखते ही आवाज लगायीं उनके भतीजे का जन्मदिन था| बड़ा सुशील भतीजा था| उसका जन्मदिन मनाने के बाद हमें वहां ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश भैया दिख गए जिनसे हमने पूछा तो उन्होंने खुद दिशा स्टॉल पर छोड़ने को कहा लेकिन तब तक जीतू भैया और दो जन और थे वह छोड़ने को तैयार हो गयें| थोड़ी सी बात हुई जीतू भैया से| इतने विनम्र इतने सरल विश्वास ही न हो रहा था हमें|
दिशा स्टॉल तक जब तक पहुँचे सम्मान समारोह खत्म हो चूका था| लेकिन वहां पर अनिल शूर भैया और ashok भाटिया भैया ने लघुकथा के बारे में कहा कि खूब पढ़ों| एक हम है कि पढ़ते ही न| किताबें खरीदने में भी कोताही कर जातें| बात कर ही रहे थे कि नजर रामेश्वर भैया पर गयी वह देखते ही पहचान गए न जाने कैसे? आश्चर्य की बात लगी| उनसे भी बातें हुई कुछेक| सादगी से पूर्ण, सरल स्वभाव से धनी भैया से थोड़ी सी बात करना भी सुखद रहा |
मृदुभाषी मधुदीप गुप्ता अंकल द्वारा सम्पादित लघुकथा पड़ाव और पड़ताल 24-२५ खंड भी खरीदी हमने| और Ashok Bhatia भैया द्वारा सम्पादित 'देश-विदेश से कथाएँ' भी |
अपना फोन तो प्राणशून्य हो गया था इस कारण हम बाद में तस्वीरें न ले पाये | दूसरों के फोन से ही कहते रहे कि तस्वीर लो | यहाँ ज्योत्स्ना के फोन से तस्वीरें लीं गयी|
साहित्य कलश की बात उठी तो ये हुआ कि स्टॉल पर जाके ले लीजिये| हम और ज्योत्सना 'साहित्य अमृत' लेने जा रहे थे कि मुकेश भैया मिल गए पुनः| बात हो रही थी कि सुधीर भाई आकर मिले| पहले मिले थे उनके पहचाना कहने पर हम जरा देर से पहचान थे क्योकि उनकी प्रोफाइल में सीधी तस्वीर न लगी थी तिरक्षी थी| | हमने अपने बच्चों से भी सबका परिचय कराया| बात हुई थी ऑटोग्राफ की लेकिन सुधीर से ऑटोग्राफ लेना भूली गए|
सुनीता शानू दी से भी फिर मुलाकात हुई |


अंत में तीन बजे लगभग बच्चों को भूख लगी तो फ़ूड कोर्ट की तरफ जा रहे थे कि श्री सुरेन्द्र शर्मा (हास्य कवि) अंकल से मुलाकात हो गयी तो एक मिनट ठिठके , लेकिन फिर आगे बढ़ तस्वीर लेने की गुजारिश कर दिए। फिर उनका नाम सोचते हुए वहीं खड़े रहे। दुसरे यह भी सोच रहे थे कि ऑटोग्राफ भी ले या न ले, देंगे या न देंगे! लेकिन अपने साँझा लघुकथा संग्रह 'अपने अपने क्षितिज ' पर उनका ऑटोग्राफ ले ही लिए| बाद में डॉली अग्रवाल से पता चला कि उन्होंने उन्हें बुलाया, यानि उनसे मिलना डाली के कारण सम्भव हुआ| अंदर मिलकर बाहर आने पर उम्मीद भी खत्म हो गयी थी कि कोई अब मिलेगा। इसलिए डॉली बहन आप से मिलकर बहुत अच्छा लगा | उम्मीद खत्म होते ही फिर जाग उठती तो लाजमी है न कि दुगुना उत्साह भर उठेगा|

फ़िलहाल जिनसे भी मुलाकात हुई आमना सामना हुआ वह सब फल लदें वृक्ष से थे|

बाद में फ़ूड कोर्ट में जाने पर वहां इतनी भीड़ की न बच्चों की हिम्मत हुई लाइन में लगके कुछ लेने की न अपनी ही| कुर्सी एक दो ही ख़ाली थीं| ख्याल आया कहाँ हुआ हैं नोट बंदी का असर| बाहर निकलते समय भी एक खाने की स्टॉल दिखी वहां भी भीड़ ही भीड़| गजब है अपने भारतीय भी| खाने पहनने में ही बिक जातें हैं|

फ़िलहाल मजा आ गया। सोच रहे इतनी तो आत्मीयता लोगो में फिर घोर कलियुग कैसे आ गया ?
इन सब के लिए किसका शुक्रिया कहेँ! जिनसे पहली मुलाकात में ही इतनी आत्मीयता व प्यार मिला। फेसबुक का शुक्रिया।
यह फेसबुक न होता तो सिर्फ डायरी भरती या शायद न भी भरती। ख़ुशी है कि एक सविता की अपनी छोटी सी ही सही पहचान तो बनी। परिवार, सखी सहेलियों से आगे कोई दुनिया तो दिखी। कभी ख्वाइश ही न की कि जिसे सुन रहे है बचपन से उनसे मिले भी । काहे लिखते, काहे छपते और काहे मिलने की चाहत जागती।
सभी को शामिल किया इस रिपोर्ट में जहाँ तक हमें याद आया |
कुछ लोगों से होते हुए भी न मिल पाना बहुत ही खला| हम पहचान ही न पाये| और कुछ से न आ पाने के कारण| शायद संजोग मिलने का न हो| अगली बार सही |
शुक्रिया वर्ल्ड बुक फेयर:) :)
अंत में एक सलाह भी :)
बुक फेयर भूलभुलैया है| अकेले मत जाइएगा| सलाह के लिए एक साहित्यिक पर्सन का होना जरूरी| एक तो जाने का रास्ता बतायेगा दुसरे आपकी खरीदारी में भी महत्वपूर्ण राय देगा| दोनों में भटकने की गुंजाईश है| मार्गदर्शक का होना सबसे जरूरी|





जितनी तस्वीरें थीं अपने पास सारी ही डाल दी हमने ...:) हम कुछ को नाम से जाने कुछ को शक्ल से पहचाने। आभासी दुनिया से निकल के मिले कई कलम के परवाने।

दिसंबर 14, 2016

औरतें मेकअप क्यों करतीं (मन का गुबार )

सीधा सा सवाल फेसबुक पर पूछा था हमने! औरतें मेकअप क्यों करतीं हैं ?? कइयों ने बड़े रोचक जबाब दिए| कईयों की कुंठा दिखी जबाब में|

हर किसी के द्वारा सवाल पूछने का कारण अलग अलग होता है। और जबाब भी आदमी अपने मनःस्थिति के अनुसार देता है| सवाल-जबाब करते वक्त आदमी के मन में क्या चल रहा हैं यह कोई न जान सकता! ख़ासकर सवाल के सन्दर्भ में | हाँ उत्तर कई मजे में देतें, कई गंभीर होकर| कईयों को ऐसे वैसे सवाल पर गुस्सा आता तो वो धो भी देते| उत्तर पढ़ते ही समझ आ जाता क्या कहना चाह रहा कहने वाला| किन्तु प्रश्न का प्रयोजन प्रायः नहीं समझ आता|
जैसे हमने देखा इसी सवाल के साथ किसी दुसरे की पोस्ट को | वहां अलग तरह के आंसर थे|
फ़िलहाल हम सोचे थे  अपनी फेसबुक फ्रेंड लिस्ट वालो का मंतव्य जाने इस सवाल से। 😊इसी लिए लिखे भी कि ओन रिश्क पर जबाब दें | पर शायद कई ओन रिश्क लिखने का मतलब न समझे, या फिर उसे ध्यान से न पढ़े! लापरवाही अक्सर घातक होती है! यही हुआ यहाँ भी |

कइयो ने जबाब दिया कि पुरुषों को लुभाने के लिए करती हैं | बड़ी अजीब बात लगी, क्रोध भी खूब  आया | जबाब  पढ़  के लगा आदमी ने अपनी सोच न बदली, जमाना भले इतना बदल गया | वह खुद घंटो मेकअप करने लगा| पार्लर में जाकर संवरने भी लगा| लाली लिपस्टिक भी पाए तो लगाने से चुके न | पर औरतें सजे तो वह लुभाने के लिए या सिर्फ पति के लिए सजे | वरना पागल जैसी टहले !!
भई वाह ! कंघी करके सलीके से कपड़े भी पहन ले तो सजना समझ बैठते लोग| फिर वह व्यूटी पार्लर में भारीभरकम मेकअप को क्या कहेंगे ?
हमें तो लगता है आदमी जलता है कि औरतों के लिए इतने सारी प्रसाधन सामग्री आखिर क्यों बनी? इतने सारी वैराइटी कपड़ों की क्यों है| उसके लिए नाममात्र की ही  क्यों?

...सोचे थे ऐसे माथा ठनकाने वाले जबाब वालों को उड़ा देंगे| फिर सोचे सब का अपना अपना दिमाग, अपनी अपनी सोच |
सच, और मन की बात बोलने के लिए क्यों हटाये किसी को| हो सकता है जो ऐसा न बोले हों, पर सोच ऐसी ही हो उनकी भी तब !! कपड़े और मेकअप पर आदमी की सोच अक्सर औरतों की सोच से टकरा जाती ही है|
औरतें सज ले, मुस्करा दें, छज्जे पर खड़ी हो जाये तो आदमी को खल जाता क्यों भई ? क्या वह जीव न, क्या उन्हें बंद घर में घुटन न होती? क्या  उन्हें  आपकी  तरह स्वछन्द  न सही  पर  स्वतन्त्र  रहने  की आजादी न !

भगवान के लिए ऐसी मानसिकता से बाहर निकले| यदि आप लुभाने क लिए सजते हैं तो आप हम औरतों के लिए भी सोच सकते हैं , क्योकि सब कुछ बदला जा सकता पर सोच अचानक से किसी की न बदली जा सकती|

वो जमाना गया जब दो साड़ी में दादी, ताई, चाची की जिन्दगी बीत जाती थी| अब जमाना अलग है अब औरतें घर के बाहर निकल रहीं और पागल की तरह बाहर नहीं निकल सकतीं | उनसे उनकी सुन्दरता के आयाम छिनने से अच्छा है आप अपनी कुंठित सोच अपने मन व दिलो-दिमाग से छीन लीजिए| सविता

नवंबर 19, 2016

लक्ष्मीबाई के जन्मदिन पर मन की बात

आत्मा सुकून पायेगी ...:)
सभी नारियों और बच्चियों को झाँसी की रानी बनने-बनाने का आह्वाहन!
कभी अंग्रेज सत्ता काबिज करने को लड़ते थे| पर आज के अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम हम भारतीय नारियों पर ही कुदृष्टि डाल रहें हैं| एक गुलाम दूजे को गुलाम बनाने पर तुला| हास्यास्पद हैं यह तो ...| खुद जियो और औरों को भी जीने दो चैन से |
नारियों गुलामी का सख्त विरोध करो मिलकर| तलवार न सही किताबें थामों हाथो में और अपना परचम लहराओं| टूटपुजियें छक्के-छिछोरे, जो हर वक्त ताड़ते हैं आपको , भद्दी टिप्पड़ी करते हैं, मुहं तोड़ जबाब दो उनका .....|
हार्दिक शुभकामना सभी को ...|

और ......
लक्ष्मीबाई की जन्मदिन पर भी हार्दिक बधाई .....| दस स्त्री भी हर जन्मदिन पर उनकी तरह बनना चाहेगी तो उनकी रूह सच में सुकून पायेगी|....सविता

सेवा का फल

Dinesh Tripathi भैया आपकी बात का जबाब ......:)

सेवा का फल-

बड़ी शिद्त्तो के बाद
पति पर शासन कर पाते
ना जाने कितने सालों के
सेवा का फल हम पाते|
चंद दिनों में हम पतिदेव को
अपना आदेश कैसे दे पाते
सालों-साल तपस्या करके
हुक्म फिर हम उनपर चलाते|
शुरू-शुरू में तो डरे सहमे से
एक कोने में खड़े हो जाते थे
जो आदेश मिलता वह
इमानदारी से निभाते थे |
नहीं थे पहले अपने यह तेवर
डर-डर ही जीते थे हम भी
अपमान का घूंट रह-रहकर
कभी-कभी पीते थे हम भी|
अब मुद्दतों बाद
सेवा कर-करके
यह स्तिथि है आई
हुक्म चलाने की नौबत
बड़ी मुश्किल से है पाई|

आज की नवयुवती 
जाते ही ससुराल 
शासन करना चाहती
बन के सास की काल |

वृक्ष को ही जड़ से झकझोर देती 
पति के दिल को भी वह तोड़ देती 
पिज्ज़ा बर्गर सा झट बनता समझ लेती  पकवान 
बीरबल की खिचड़ी बनाने का होता नहीं उसे भान |

जल्दीबाजी की होती उसे होड़  
घर प्यारा अपना देती वह तोड़ |

अकेले रहकर सारा जीवन अपना काट देती 
या फिर रिश्ते को ही टुकड़ों में वह बाँट देती |..
क्षुधा शांत करनी हो गर तो बीरबल सा रखो सब्र 
वरना फिर खोद लो अपने ही मुहब्बत की कब्र |

हर पत्नी की दशा और दिशा ...:) सविता मिश्रा
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12 March 2013 at 18:15 · Like · 1

नवंबर 18, 2016

भुक्तभोगी हैं क्या ...:)


गुरुत्वाकर्षण का नियम कहिये या मंथरा जैसे लोगों की उपलब्धी .....!! बुराई जहाँ, जिससे शुरू होती हैं, घूम फिर के फिर वहीं आ जाती है ....!! बस उसमें नमक मिर्च और हाँ खटाई भी लग जाती है ......!!
उदाहरण बताते चले ...!
जैसे आपने कहा 'यार शर्माइन बड़ी कंजूस हैं, इतने घटिया कपड़ें या चीजें उपहार देती है कि जी करता है कि किसी को दे दे! पहनने लायक होते ही नहीं ....!!
यह बात दुसरे के पास फिर तीसरे के पास पहुंची .......! तीसरे से फिर शर्माइन के पास और शर्माइन फिर गुस्से में तमतमा आपसे आकर बोलेगी कि "तुमने कहा कि हम (शर्माइन) बड़ी कंजूस हैं, इतने घटिया कपड़ें या चीजें उपहार देते हैं कि तुम्हारा जी करता है कि मुहं पर हमारे ही फेंक दो .... ! हम लेने को चाहते है कि कोई हजारों की दे और खुद सौ की भी देने में माई मरती हैं हमारी ....! कैसे कहा ऐसा तुमने ....?"
हिदायत :) कोई शर्माइन मुहँ न फुलाना ....जो कोई शर्मा शर्माइन हो यहाँ :) सविता

नवंबर 15, 2016

जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई (आलेख)


दुनिया में न जाने कितने प्रकार के दर्द हैं। इनमें से जब एक भी प्रकार का दर्द खुद पर पड़ता है, तभी पता चलता कि दर्द में कितना दर्द होता है।
दर्द को भोगे बगैर कोई कैसे जान पाएगा दर्द की इन्साइक्लोपीडिया| उसको जानना हैं तो दर्द तो भोगना ही पड़ेगा| वैसे भी इस जहान में ऐसा कोई नहीं जिसे दर्द से रूबरू न होना पड़ा हो| इधर कोई जिस प्रकार के दर्द से रूबरू हुआ उधर उसको उस दर्द से पीड़ितों का दर्द समझ में आया| 'जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई' कहा ही गया है।
किसी हथियार, या फिर गिरने-पड़ने से तो चोट लगती रहती है| पर इन चोटों के घाव जल्दी भर जाते हैं। लेकिन बातों से जो घाव लगते हैं वे कभी नहीं भरते| हम सब यह सुनते ही रहते हैं कई बार।
बातों की चोट तभी लगती है जब हम मन से घायल होते है| जब हम मन से स्वस्थ होते तो यह बातें महज़ शब्दबाण की तरह दिखती हैं | जिसे हम स्वयं भी दूसरों पर बेफ़िक्री से छोड़ते रहते हैं| परन्तु जैसे ही ये बातें हमारे घायल मन पर पड़ती है तो ये सामान्य सी बातें भी व्यंग्य बाण बनकर सीधे हृदय के विच्छेदन की क्षमता रखती हैं| हमारे अंदर का कोई सूखा हुआ घाव भी हरा हो जाता है, ऐसे व्यंग्यात्मक बाणों से| तभी हमें "जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई" कहावत का अर्थ समझ में आता है|
ऐसा लगता है, कुछ तो ऐसा असामान्य नहीं कहा गया, परन्तु जब तक खुद को न लगे वह शब्द बाण, अपने सूखे जख्म, हृदय के किसी कोने में सुषुप्तावस्था से जागृत नहीं हो जाते, हम नहीं समझ पाते।
बातों की चोट पर एक बात याद आई जो कहावत से ही सम्बन्धित है| कहावत का मतलब तो सामान्य सा ही होता है, पर यदि वह कहावत किसी ऐसे व्यक्ति के सामने कही जाये जिसपर यह कहावत चरितार्थ होती हो, तो उन्हें अवश्य चोट लगतीं है|
वह कहावत है- 'बाँझ बियाय न बियाय देय'। अक्सर आप सभी ने भी सुना ही होगा इस कहावत को, अपने गाँव के अंचल में| कोई जब न खुद कोई काम करे न किसी को कुछ करने दे, ऐसी स्थिति में अक्सर यह कहावत कही जाती हैं गाँवों में। यह कहावत तब तक सामान्य सी लगती थी जब तक हम इसे ऐसो के सामने न कहें जहाँ कोई बाँझ स्त्री हो|
एक बाँझ(गर्भधारण में असक्षम) औरत के सामने इस कहावत को कहते ही आप खुद देखेंगे कि इस कहावत को सुनकर कोई भी बाँझ स्त्री बेइंतहा पीड़ा से भर सकती है। आपको उसकी पीड़ा उसके चेहरे पर उभरती हुई दिख जाएगी| फिर महसूस करिये उसकी पीड़ा!! यदि आप दिल से उस पीड़ा को महसूस करेंगे तो आपको लगेगा कि आप को जैसे किसी जलती अंगीठी पर बैठा दिया गया हो।

यदि दूसरों के दर्द को हम महसूस नहीं कर पाते हैं तो हममें संवेदना का आभाव कहा जा सकता है| किन्तु जिन्दगी के किसी भी मोड़ पर ऐसी कोई बात तो हर इंसान के साथ हो ही सकती है जो उसे दर्द पहुँचाती है| या हर इंसान की दु:खती रग होती है कोई न कोई बात। बस उस दुखती रग पर कभी हाथ रखिये, फिर देखिये। वह आहत होते ही कराहकर कह उठेगा कि जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई!!!

बड़ी बिडंबना है कि हम कोई भी बात तब तक बड़े सामान्य होकर बोल लेते हैं , जब तक उस बात से खुद न आहत होते हो। खुद के आहत होते ही हमें पता चलता है कि हम कितना गलत बोल गए..! फिर लाख माफ़ी मांगकर भी व्यंग बाण से हुए दिल के घाव नहीं भर सकते हैं..! भले ही कितनी भी कोशिश क्यों न करें।

कई कहावतें ऐसी हैं जिनका अर्थ बड़ा सीधा और सरल सा है| पर कहावत बड़े टेढ़े अंदाज में कही गयी है| जैसे कि 'भैंस के आगे बीन बजायें, भैंस खड़ी पगुराय', 'अंधे के आगे रोये, अपने दीदे खोये, 'या फिर '
कुत्ते भौंकते रहते हैं, हाथी चलती रहती अपनी राह' |
बड़े बड़े घाव किये है ऐसी ऐसी कहावतों ने| और ऐसी कहावतें यह कहने को भी मजबूर करती हैं कि जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई|
--सविता मिश्रा

नवंबर 10, 2016

सामयिक घटनाक्रम पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी-(नोट की चोट)

मोदी भैया यहाँ दो दिन सब की ढ़ोल बजाने के बाद टोक्यो में बड़ी ख़ुशी से ड्रम बजा रहे हैं | देख के लगा कि उन्हें इस तरह बड़ा मजा आ रहा है| और यहाँ विरोधी से लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले तक...अरे इस बात से याद आया कि कहाँ हैं हमारे अन्ना चाचा .. बहुत दिनों से दिखे नहीं ..? हम तो समाचार घंटो देखे |

देश में इतनी उथल-पुथल हो गयी| और वह बाल्मीकि की तरह बिलकुल शांत हैं| तपस्या रत हैं लगता है| जो शांत थे वह दुर्वाषा रूप में दिख रहें हैं | दो दिन में न जाने कितनी गृहणियां दुर्वाषा बनकर मोदी भाई पर अपने मुख से अग्निवाण बरसा चुकी हैं| एक जन विश्वामित्र बनने की कोशिश में थे दो दिनों से, लेकिन आज वह भी मुखर हुए| कह रहे थे कि उन्हें समझ ही नहीं आया कि 2000 के नोट चलाकर भ्रष्टाचार कैसे रोका जा सकता है|

सबकी राजनीतिक बहनजी कह रही हैं कि श्री मोदी जी अपने 100 साल के खर्चे के लिए पैसे विदेश में छुपा आए| हमें भी अफ़सोस है। मोदी भैया को ख्याल रखना चाहिए अपने भाई बन्धुओं का भी|

हम जनता का क्या है, किसी न किसी तरह तोड़-मोड़कर अपनी जुगाडू राह निकाल ही लेंगे| परन्तु चुनाव आ रहें| आप अपने खर्च का इंतजाम तथाकथित ही सही, कर लिए और सब अपने संगी-साथियों को मौका ही न दिए| इतनी बड़ी नाइंसाफ़ी कर कैसे सकते भई आप !

हम सोच रहें है और विनती भी कर रहें प्रभु से, सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं आप सभी के लिए भी कि वहीं टोक्यो में ही बजा लीजिए। अरे बाबा ड्रम, फालतू ही न सोच लिया करें आप सभी | अधूरी लाइन पढ़ना सोच के लिए घातक हो सकती है|

मतलब जितना मन करे, उतना ड्रम जोश से वहीं बजाइए। फिर आकर अपने देश में मत बजा डालियेगा सबकी| बड़ी मुश्किल से लोग तोड़ निकाल रहें हैं आपके सुर-संगीत की| भ्रष्टाचार से उबरने के आपके इस अभियान में कितनी बेतुकी राहें अपनाए हैं लोग, आप न जानेंगे| अपने ही करारे नोटों को घाटे में देकर तुड़े-मुड़े से सौ-पचास के नोट लेकर अपने लाकर में रखने का दर्द आप क्या जानें| समचार पढ़-सुनकर आप जान भी गए होंगे, पर समझेगें नहीं|

दो हजार के नोट के रूप में मंजिल तो आपने सबकी तय कर दी है एक महीने समय देकर| अब तो मंजिल पर पहुँचना मज़बूरी है सबकी| रास्ते में ही अटक भी गए यदि मंजिल समझ, तो वह रद्दी बन कर रह जाएगी ३० दिसम्बर तक | अतः सब भले ही संकरे, छोटे, कांटे भरे रास्ते चुनें लेकिन मिलेंगे आपकी बनाई मंजिल पर ही| उसके लिए अपनी ब्लैक में से व्हाईट के लिए जरा कुर्बानी भी देंगे ही|

आपने स्वच्छ भारत का सपना नोटों के लिए भी साकार कर ही दिया हैं | यकीन करिए, जनता हर हाल में चाहती है कि यह स्वछता कायम रहें | जनता से अलग हटकर जैसे ही आदमी कुरता पायजामा पहनकर नेता बन जाता है, वह स्वछता भूलकर ब्लैक होने लग जाता है| उसके काले होते ही उसकी परछाई जिस जिस पर पड़ती है वह भी उन्ही के रंग में रंगता जाता है| जबकि सब देशवासियों का दिल कहता है कि रे नेता, न कर, न कर, गंदा तन-मन-धन! पर दिमाग़ है कि इस भ्रष्टाचार के खेल में रंगता हुआ देश की धरती को अस्वच्छ कर देता है | #सविता