फ़ॉलोअर

अप्रैल 02, 2015

हमारा उत्तर प्रदेश

बस मन में एक ख्याल आया लिख गये ...:)

बदनाम भले है
उत्तर प्रदेश
पर इसकी
माटी को छूते ही
हर कोई खरा
हाँ खरा सोना सा
हो जाता है

कितने महात्मन
साधू-सन्यासी
वेद, पुराण ज्ञाता
लेखक-कवि
कद्दावर नेता
और कई बुद्धिजीवी
इसी धरती की देन हैं

जो नहीं भी हैं
इस धरती पर
कदम रखते ही
वो लोग भी
कनक से हो जाते हैं

पारस !!
हाँ पारस !
कह सकते हैं आप
इस धरती को 
स्वर्ग सा सुंदर 
मेरा, तुम्हारा और 
सभी का भी प्यारा 
यह उत्तर प्रदेश

एक बार ही सही
यहाँ की हवा में
लीं हैं साँसे जिसने
सांसो के जरिये उनके
शरीर में घुल गयी है
यूपी की माटी की तासीर
बुद्धिमता की दौड़ में
बढ़ गया वो आगे

पर अफ़सोस
परजीवी भी
बहुतायत में
इसी माटी में
पाए जाने लगे हैं
और बद से ज्यादा
बदनाम होने लगा है
हमारा उत्तर प्रदेश |

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
 

मार्च 19, 2015

~~कृपया कोई जुगत बताओ ~~

मन में रोज सवाल उठता था
हिम्मत ना हुई पूछने की
पर आज अपनी
पूरी हिम्मत को जुटा कर
पूछ रहे हैं
अपने ही आस्तीन में
पलते हुए सांप से-
क्यों सांप नाथ
आप बताएगें,
आप में और जंगल के
बिलों में रहने वाले
सांपो में फर्क क्या हैं?

सांप ने सवाल सुन
पहले आँखे तरेरी
फिर की लाल-पीली
गुस्से से फुंफकार कर बोला-
क्या तुझे
यह भी नहीं पता?

जंगल में रहने वाला सांप
थोड़ा शरीफ होता है
बिना छेड़खानी किये
नहीं काटता किसी इंसान को।

पर मैं थोड़ा हट के हूँ
जो मुझे पालता हैं
मौका मिलते ही
उसी को पहले डंसता हूँ।
अपने अजीज को भी नहीं छोड़ता
इसी लिए तो आस्तीनों में पलता हूँ।

हम सुन थोड़ा सकपका गये
आस्तीन से कैसे हटायें
कृपया कोई जुगत बताओ|....सविता मिश्रा

मार्च 15, 2015

~~हम तुम्हारी ही परछाई है~~

अर्धांगनी है तुम्हारी
तुम्हारे साथ ही जीना-मरना है
हम तुम्हारी ही परछाई है
परछाई की तरह ही साथ रहना है
जब जब तुम लड़खड़ा कर गिरोंगे
बढ़कर हम थाम लेंगे तुम्हें
जो तुम देख नहीं पाओंगे
वो चीज भी दिखायेंगे तुम्हें,
भटक गए यदि कही दो राहें पर
तो मंजिल का पता बताएगें तुम्हें,
जब कभी तुम हमें आवाज दें पुकारोंगे
सब कुछ छोड़ पास तुम्हारें दौड़े आएगें
जब जब तुम संकट में होंगे
वादा है हमारा हम साथ ही होंगे तुम्हारें ,
पर एक प्रार्थना है हमारी तुमसे
हमें अपने दिल में यू ही बसायें रखना ,
प्यार करते हो तुम जितना हमसे सनम
उसे यूँ ही सदैव हृदय में बनायें रखना |
+++++ सविता मिश्रा +++++

बस यूँ ही (५)

१....

मेरे हुनर का होगा देखना ऐसा कमाल कि
दुश्मन को भी होगा मेरे मरने का मलाल |....सविता

२...

शांति मिली कहाँ, यहाँ कभी शांति से
करनी पड़ी अशांति, अक्सर शांति से | ,...सविता

३ ...

ऐसे-ऐसे ना जाने कैसे -कैसे ....कैसे होकर अपना रूप दिखाते हैं
हम सीधे-साधे सच्चे इंसा होकर भी ....खड़े बस मुँह ताकते रह जाते हैं | सविता

४....

प्यार के दो बोल बोलता था कोई, जेहन में शहद सा घोलता था कोई
ना जानें क्यों अब ऐसा क्या हुआ, ना वह बोलता ना हम ही बढ़कर बोलतें | ...सविता मिश्रा

५...

 कद व पद के घमंड में  जाने 
कितने लोग हुए हैं चकचूर
और कहीं कद पद की मर्यादा भंग कर हुए हैं मगरूर | ...सविता मिश्रा

मार्च 11, 2015

~उलझा विवाद~

बस अभी ऐसे ही लिख आये कैसे क्यों लिखे पता नहीं
Veeru Sonker bhai ki परेशानी पर
.....

उलझा विवाद
सुलझा क्या कभी
उलझता गया
जितना सुलझाया
तू तड़ाक कर
ख़त्म होते होते भी
फिर उलझा
ऐसे क्या सुलझा कभी
सुलझते उलझते

उलझते सुलझते

हम ही उलझ कर रह गये
बहती नदी के साथ
बहते बहते बह गये
ऐसा नहीं है कि
रुकना नहीं चाहा
चाहा ...
बहुत चाहा पर
क्या कभी रुक पाया
बल्कि लपेट लिया उसने
आस पास बहती
सारी नदी नालियों को | सविता बस यूँ ही

~बेटा ! तू क्या समझेगा ~

यह कविता हम यही फेसबुक पर किसी का स्टेटस पढ़े थे उसको पढ़ने के बाद लिखी वह भी स्टेटस अपने भाई के गंगा में डूब जाने पर थी .वह अपनी माँ पर कविता लिखना चाहते थे जहा तक हमें याद है बहुत दिन हो गया पढ़े अतः याद नहीं पर हा वह कवि ही कोई होगे यह अवश्य पता ..पता नहीं हम उनकी भावना को समझ पाए या नहीं पर इन पंक्तियों में अपनी भावना जरुर व्यक्त की है ........यह पंक्तिया उन भाई को समर्पित करते है ................
बेटा !
तू क्या समझेगा
माँ की वेदना
कभी
तू बेटा है अ
भी
बाप बनेगा कभी
पर माँ नहीं बन पायेगा |
बिन माँ बने कैसे समझेगा
माँ की भावनाएं
कैसे दर्द को
उसके
अपने अंतःकरण से
महसूस कर पायेंगा |
ढ़ेर सारी तकलीफ सह
जन्म दिया उसने
नाज-नखरे उठा तेरे
किया था बड़ा उसने |
जब वही अकाल ही
काल के गर्त में
समां जाता है
कितना कष्ट होता है
तू क्या समझेगा ?
आँख से पानी नहीं खून रिसता है
दिल भी पल-पल हर क्षण रोता है |
दिखे तुम्हें अश्रु भले ही ना
पर आँखे भर आती है
हर क्षण, पल पल
याद कर वह लम्हां |
शरीर क्या वह तो
लाश बन रह जाती है
तेरे लिए ही बस
सब कुछ सह जाती है |
बेटा !
तू क्या समझेगा
कभी माँ की बेदना
माँ को बहुत कुछ
पड़ता है सहना ..
बहुत ही सहना ...
ऐसे मंजर ना हो घटित
कभी किसी माँ के जीवन में
बस कर सकना तो यही
प्रार्थना तुम!
प्रभु के आगे सदैव  करना || .सविता मिश्रा

मार्च 05, 2015

लंगूर बन के --

भर उमंग मन में हम नारियाँ जहाँ फटके
भाग जाओगे तुम सब वहां से बन्दर बनके।

गुझियाँ पापड़ और पकवान बना-बना करके
थक हार चुप बैठे हैं हुड़दंगी मन को परे धरके |

चुप्पी जो तोड़ दी हमने, रह जाओगे हक्के-बक्के
रंग चढ़ा, तो होली खेलेंगे हम फिर खूब ही छक के |

जो मचल रहे हो यहाँ-वहाँ तुम सब तन-तन के
भागोगे फिर भीगी बिल्ली तुम सब बन-बन के |

बच्चों-सी पिचकारी लिए इधर-उधर हो फिरते
दम नहीं है किसी में रंग लगाये गाल पे मल के |

भंग के नशे में जो आ रहे हो उछल-उछल के
भंग उतरते ही मिलोगे सारे के सारे कहीं दुबके |

होली खेलना सभी हमसे जरा संभल-संभल के
वरना सब मिलोगे फिर लाल-पीले-लंगूर बन के |...सविता मिश्रा 'अक्षजा'

फ़रवरी 22, 2015

जीवन

नाच-नाच के
थक गयी जब मैं
बैठ़ गई सुस्ताने
पेड़ की छाँव में
पलक झपकते पेड़
पेड़ ही न रहा
मजबूरन कंक्रीट के जंगलों में
छाया की तलाश में
भटक रही हूँ
समय पंख लगा
उड़ गया पल भर में
हताश मैं
अंधी गली के
कोने में पड़ी
जीवन का
चिन्तन कर रही हूँ
एक एक करके
यादों की परत हटाते हुए
देखो तो मैं मूरख
अपने आप से ही
बात कर-करके
कभी आँखों में नमी
और कभी चेहरे पर हँसी
बिखरा रही हूँ
हठ़ात सडाँध का एक झोंका
मुझे हकीक़त के
दायरे में खींच लाता है
मैं सोच रही हूँ
आयेगा एक दिन ऐसा ही
सभी के जीवन में
फिर भी
भविष्य के लिये
वर्तमान को
दांव पर लगते देख
घबरा रही हूँ मैं
स्वयं की जैसी गति देख
सभी गतिमान की
बेचैन हुई जा रही हूँ मैं
तरक्की की अंधी दौड़ में
भागते-भागते
जीवन की सच्चाई से
रूबरू होकर
फिर से पेड़ की छाँव
तलाश रही हूँ मैं
कठपुतली सा मुझे
नचा-नचा के तू न थका पर
नाच-नाच के थक गयी हूँ मैं |

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
---००---

फ़रवरी 16, 2015

~~कुछ खास लिखूँ~~

आज दिल किया कि कुछ खास लिखूँ ,
अपने अन्तःमन में दबे अहसास लिखूँ |

छोटी-छोटी बातों से  दिल पर
हुए जो आघात लिखूँ ,
या नासूर बन गए जो उन जख्मों का हाल लिखूँ |

प्यार के अहसास की खुशफहेमियां लिखूँ ,
या व्यंग बाण की चुभन की तकलीफ लिखूँ |

जो दिल पर हमारे घाव कर निकल गए ,
उनके लिए निकली दिल से जो बद्दुआयें लिखूँ |

या प्यार से संजोया जिसने हमको रात-दिन ,
उनके लिए निकलती रोज दिल से जो दुआएं लिखूँ |

किसी की मदद कर जो दिव्य-अनुभूति हुई ,
उस अहसास को पिरो शब्दों के जाल लिखूँ |

या उसने जो दुआएं दी उससे खुद को हुई ,
जो सुखद अनुभूति उसका अहसास लिखूँ |

आज दिल कर रहा है कुछ खास लिखूँ ,
अपनी ही अहसासों के जज्बात लिखूँ |
||सविता मिश्रा ||

फ़रवरी 04, 2015

~~सांचे में ढल ना सकीं ~~

मगरूर थी सांचे में ढल ना सकीं
ढ़लने चली तो साँचा ही न रहा |


बेकदरी के जमाने में कद्र कितनी
नापने चली तो कद्रदान ही ना रहा |

खुशियों के बादल घुमड़ते हरदम
भींगना चाहा जब तरसा वह रहा |

निश्चिन्त हो शांति तलासती थी कभी
आज शांति का लगा जमावड़ा रहा |

चीखते-चीखते गले पड़ी खराश
बोले बिन आज पड़ ख़राश रहा |

आगे-पीछे घूमते रहते थे लोग
पदमुक्त तब घर में अकाल रहा |..सविता मिश्रा

दिसंबर 17, 2014

+कोई रिश्ता नहीं फिर भी +

कल ही की तो बात है
बैठे बैठे मार रही थी मच्छर
उन्हें मरा देख हुई मन में बेचैनी सी
बुदबुदा लेती मन ही मन
खामखा देख आई
तेरी जान आफत
कुछ दिन या महीने जीने की
ललक थी तेरी
पर मेरे दिमाग की बत्ती गुल थी|

अपना ही खून था पर
उनके शरीर से बहता देख
दिल चीत्कार कर रहा था
ना जाने क्यों एक अजीब सी
घुटन भर रहा था जेहन में 
वह हमें थोड़ा सा ही
नुकसान पहुंचा रहा था
जीने की जद्दोजहद करता
और मैं उन्हें मृत्युदंड के
फरमान सुना रही थी
बिना किसी जिरह के|

दिमाग में १६ दिसम्बर की
पेशावर में घटी घटना
ना जाने क्यों खटक रही थी
बार बार दस्तक दें रही थी
दोनों ही घटनाओं में क्या रिश्ता
पर न जाने क्यों दिल बार-बार
दोनों घटनाओ को आपस में
मिलान करने को कह रहा था |

दिल को दिमाग समझा रहा था
दोनों का दूर-दूर कोई रिश्ता नहीं
पर दिल मानने को तैयार कहाँ था| सविता

दिसंबर 16, 2014

हायकु

ज्ञान से ज्ञान
अज्ञानी से ज्ञानी
मुर्ख अंजान|

जिज्ञासु प्राणी
उड़ता है गगन
ज्ञान पिपाषु|
ज्ञान पिपाषा
सामने गुरु को पा
हो गयी शांत

ज्ञानी-अज्ञानी
शब्द निकसे मुख
हो जाता ज्ञान |

मन उन्मुक्त
छूने को उत्सुक हैं
ज्ञान गगन|

ज्ञान परिंदा
पंख फड़फडाता
सध उड़ता|


ले जाता सदा
अधकचरा ज्ञान
दुर्गति ओर| सविता

दिसंबर 15, 2014

बिसात क्या है मेरी --

1. उन पर खुशियाँ अपनी लुटाते-लुटाते,
न जाने क्यों सिहर सी जाती हूँ मैं।

2. अपने दिल के घाव दिखाते-दिखाते,
न जाने क्यों ठहर सी जाती हूँ मैं।

3. अपने ज़ख्मों को सहलाते-सहलाते,
न जाने क्यों विफर सी जाती हूँ मैं।

४..पुराने घावों को कुरेदते-कुरेदते ,
ना जाने क्यों नासूर बना देती हूँ मैं |

५..नैनन अश्रु मोती बहाते-बहाते ,
अब प्रस्तर-प्रतिमा सी खुद को पाती हूँ मैं |

६..सारे जुल्मों-सितम सहते-सहते ,
ना जाने क्यों विद्रोह पर उतर आती हूँ मैं |

७..खुशियों के समुद्र में गोता लगाते-लगाते ,
ना जाने क्यों कमजोर सी हो जाती हूँ मैं |

८..चेहरे से गम को छुपाते-छुपाते ,
ना जाने क्यों भावहीन हो गयी हूँ मैं|

९..सभी जिम्मेदारी का बोझ उठाते-उठाते ,
ना जाने क्यों निढ़ाल (थक) सी हो जाती हूँ मैं |

१०..सविता चाँद बनते-बनते,
अपना वजूद ही खो देती हूँ मैं|

११..अपने भूले बिसरे अस्तित्व की तलाश में, 
अपने आप को ही नहीं पहचान पाती हूँ मैं।"
||सविता मिश्रा ||
मौत के आगोश में समाते- समाते,
ना जाने क्यों ठहर सी जाती हूँ मैं।
प्यार के आगोश में सिमटते-सिमटते,
ना जाने क्यों बिखर सी जाती हूँ मैं।
अपने ही जख्मों पर मरहम लगाते-लगाते,
ना जाने क्यों टूट-सी जाती हूँ मैं।
देख आईना अपने को पहचानते-पहचानते,
ना जाने क्यों स्वयं को विवश सी पाती हूँ मैं।
कमियां अपनी गिनाते-गिनाते,
अपने से ही रूबरू नहीं हो पाती हूँ मैं।
बिसात क्या है मेरी? हूँ कौन मैं ?जानते-जानते,
अपनी ही औकात समझ नहीं पाती हूँ मैं।.

दिसंबर 12, 2014

कुछ क्षणिकायें.


...६/८४
१-चले थे समुद्र की गहराई को नापने,
पर स्वयं को ही समुद्र से गहरा पाया |

२-पानी में डूबते वही जो तैरना जाने,
तैरते वही जो स्वयं को निडर माने

३-दिखाने चले थे उन्हें डगर हम,
पर स्वयं को ही भटका पाया |
रास्ता भटक गये जब हम ,
तो उन्होंने ही हमें रास्ता दिखाया |

नवंबर 29, 2014

"सुनहले ख़्वाब बस"


दिल में तो धड़कती ही हूँ मैं
पर! साँसों में भी तेरे
फ़ैल जाना चाहती हूँ मैं 

किसी ने तीसरी बटन
किसी ने दूसरी
किसी ने सिर्फ बटन कहकर ही
ख्याली पुल कर लिया तैयार
अपने पति का सानिध्य पाने को........

मैंने भी सोचा ...तोड़ दूँ मैं भी
तुम्हारे शर्ट की पहली बटन
क्योंकि मैं साँसों में तुम्हारे
बस जाना चाहती थी
टांकने को बटन जब तुम कहो
तुम्हारी साँसों को
बिलकुल पास आकर
महसूस कर सकूँ मैं

तुम्हारी आँखों में झांक सकूँ प्यार
तुम्हारी साँसों से अपनी साँस को
मिलाकर साँसों की प्यारी सी
करूँ एक खूबसूरत डोर तैयार
साँसों में मेरे बस जाओ तुम
अपने साँसों के जरिये
तुम्हारे दिल की धड़कन
महसूस करूँ मैं करीब से
जिसमें बसती हूँ
शायद ! सिर्फ मैं !

बटन हाथो में लिए
तुम तक पहुँचने के
खयाली पुल बना रही थी मैं
तभी एक झटका सा लगा
तुम्हारे गुस्से का शिकार हो गया
सपना मेरा प्यार भरा
टूटी है बटन वर्दी की
कैसे पहनू मैं ?
गूंजी कानो में एक तीखी आवाज !

तुम्हारी लापरवाही के कारण
समय पर नहीं पहुँच पाउँगा
मोबाईल फोन कान खा रहा है
ऊपर से अधिकारी सिर चढ़ रहे हैं
बड़बड़ा रहे थे जब तलक वो
जल्दी से रात जो धोयी थी वर्दी
बहाते-बहाते आँसू झट प्रेस करके
उनके हाथो में थमा दी

आँसुओ को पास जाने से पहले ही
जब्ज कर लिया आँखों में ही मैंने
क्योंकि पता है यह मुझे
तुम्हारें लिए इन आँसुओ की
कोई भी कीमत नहीं
तुम्हें अपनी नौकरी से ज्यादा
कोई और चीज प्यारी भी नहीं !

रोज ही ऐसे कई सपनें
चकनाचूर हो जाते हैं
तुम्हारी मजबूरियों को समझती हुई मैं
अपने इन सपनों को
सुनहले ख्बाब की
अपनी छोटी सी पिटारी में
बंद करके रख देती हूँ मैं टांड पर |

सपनों की अपनी बगिया में जो
नन्हें- सुंदर फूल सजाये होते हैं
वो समयाभाव में अक्सर ही तो
असमय ही मुरझा जाते हैं | सविता मिश्रा

प्रेम पर भी लिखने चलो तो अंत जाके ना जाने कहाँ का कहाँ हो जाता है उफ़ मेरी कलम तू क्यों नहीं चलती मेरे ही इशारे पर..... हमारी भावनायें (सविता मिश्रा)