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अक्टूबर 14, 2014

सोने के फायदे

सोना है तो जाग जाइये
जगने के लिय सोते ही रहिये
सोते रहे है इसी लिय जगा रहे है
हम तो चैन से रहने का  गुर बता रहे है
जागते रहेंगे महंगाई डायन डराएगी
सोते रहेगे खर्च ही कहा कराएगी
सोते रहने से बड़े है फायदे
पानी बिजली राशन सब बचे
बचाना है सब तो सोते ही रहिये
जाग भी जाये तो सोने का ढोंग करिये
कलह लड़ाई सबसे दूर रहेगें
बोलेगें नहीं तो कैसे फंसेगे
जाम की जद्दोजहद से बचगें
तू तू मैं मैं के होने से दूर रहेंगे
भीड़ की ना होगी धक्कामुक्की
सड़कें भी सब सुनसान होगी
बलात्कार हत्या डकैती से बचेगें
और तो और ये  सब अपराधकर्ता भी
चादर तान कर  तो सोते रहेंगे
देखा न सोने से कितने है फायदे
पारिवारिक जीवन भी ये सफल बना दे| सविता

अक्टूबर 08, 2014

:( गांधी नोट :(


:)===========:)
अपनी आबरू बेच जब
हाथ में नोट आया
लड़की ने नोट पर
अंकित गांधी के चित्र पर
अपनी बेबस नजरों को गड़ाया
गांधी बहुत ही शर्मिंदा हुए
अपनी खुद की नजरों को
जमीं में गड़ता पाया
नहीं मिला पायें नजर
आंसुओं से डबडबाई नजरों से
देश के हालत पर चीत्कार से उठे
पर सुनता कौन|

आग पेट की बुझाने
के खातिर एक औरत
अपनी ही औलाद जब
मजबूर हुई बेचने को
बेचने के उपरांत जो
नोट हाथों में लिया
उसने भी गांधी को घूरा
खूब आंसू बहाया
पर मजबूर थे गांधी भी
नजरें ना मिला सकें
औरत ने तोड़-मरोड़
नोट को ठूंस लिया
अपने ही सीने में सिसकते हुए
उसी सीनें से जिसमें
अब तक उसका लाल
छुप जाया करता था
पेट की आग बुझाने के खातिर|

मेहनत मजदूरी करते
धर दिया ठेकेदार ने
चंद नोट शाम को हाथ
मेहनताने स्वरूप
गांधी छपे उन नोटों को देख
मजदूर व्यंग में मुस्काया
और मन ही मन बोला
वाह रे गांधी क्या तुमने
भविष्य हमारा इसी में देखा था
तू आज उतार दें अपना ऐनक
क्योकि ऐनक में हमें तेरा
दोगलापन नजर आता है
तू खुद गरीबी का चोला ओढ़
हम गरीबों को मुहं चिढ़ाता हैं और
अमीरों के घर लाखों-करोड़ों की
नोटों में पा खुद को
हँसता-खिलखिलाता हैं|

दस साल के एक नौनिहाल की
फीस रूप में चंद गांधी नोटों को
ना दे पाने की वजह से
जब रुक जाती हैं पढ़ाई उसकी
फीस के चंद टुकड़े भरने के लिए
दर-दर भटकना पड़ता हैं उसे
भटकने के उपरान्त जब
बीस-पचास के नोट हाथ आते हैं
देख मुस्काता तेरा चेहरा
लगता है उड़ा रहा हैं खिल्ली
तू विदेश से पढ़ लौटा और हमें
सड़े-गले सरकारी स्कूल में भी
चंद गांधी धारी नोट
ना होने की वजह से
ठीक ढंग से पढ़ने को भी नहीं मिलता
वाह रे गांधी क्या यही सपना
हम नौनिहालों के लिय था तूने देखा|

महंगाई के सुरसा रूपी मुहं में
अब कोई कीमत ही नहीं रह गयी
सौ-पचास के नोटों की
तू फिर भी गर्व से छपा हैं उसमें
ऐसा लगता हैं खुद ही शर्मिंदा हैं
इस बढ़ती हुई महंगाई पर
और मुहं छुपा लेना चाहता हैं
सौ-पचास के मुड़े-तूड़े नोटों के बीच
खुद ही बाहर नहीं आना चाहता
कोसता रहता हैं खुद की ही तक़दीर को
भिचा हुआ किसी गरीब की मुट्ठी में रह|

अच्छा हुआ तूनें सिक्कों में
खुद को नहीं छपने दिया
उस पर भारत का गौरव छपा हैं
और किसी पर किसान का प्रतीक
वर्ना और भी शर्मिंदा होता
भिखमंगों के कटोरे में देख
नजरें ना मिला पाता
तब खुद से ही|
पर जब किसी पर्स से सिक्के निकल
गरीब के कटोरे में जाते होगें
कनखियों से उनकी गत
और भारत के गौरव को
गरीबों के कटोरे में खनखनाता देख
यकीं हैं हमें और भी शर्मिंदा होता होगा
सोचता होगा काश मैं सिक्के पर ही होता
नोटों पर भारत का गौरव होता
कम से कम हमारे देश में गौरव को
इतना तो शर्मिंदा ना होना होता|

मेरी उलाहोनों को सुन कर गांधी
बहुत ही शर्मिंदा हुए और बोले
हो सकें तो मेरी आवाज उप्पर तक पहुंचा दो
नोटों के बजाय मुझे सिक्के में ही ढलवा दो| सविता मिश्रा

अक्टूबर 06, 2014

~प्यार का धागा ~

प्यार के धागे को तोड़कर
बिखेर गया था वो
समेट रही हूँ उसे
गांठ पर गांठ डाल
जोड़ रही हूँ
जोड़ने के बाद
सोच में डूबी थी
क्या यह प्यार वही
पुराना प्यार पा सकेगा
अथवा जैसे इस पर
गांठे लग गयी है
उसी तरह उस प्यार पर भी
थोड़ी सी कड़वाहट की
परत पड़ जायेगी
हा शायद कुछ ऐसा ही होगा
क्योकि खोया हुआ प्यार
फिर मिल तो जाता है
पर ये प्यार वो प्यार
नहीं रह जाता है
इस प्यार को प्यार नहीं
समझौते का नाम दे दिया जाता है |
||सविता मिश्रा ||

अक्टूबर 02, 2014

तीन सीख (गाँधी के तीन बंदर)


गाँधी जी ने
हमारा भविष्य ताड़ लिया था
तभी तो
तीन बंदरों का उदाहरण दिया था |
कुछ भी गलत होता हुआ देखो
पहले बन्दर को याद रखो
गलत देखकर भी अनदेखा कर
धीरे से चलते बनो |

तुम्हारे किसी भी कार्य पर
कोई कुछ प्रतिक्रिया करे
तो दूसरे बन्दर को याद करो
सुनकर भी अनसुनी कर
चुपके से वहां से खिसक लो |

यदि कोई क्रोध में भर
गालियाँ तुम्हें दे तो
 शांत हो
तीसरे बन्दर को याद करो
ना बोलने में ही भलाई है
यह भाव रखो
ठिठको नहीं!
आगे की ओर कदम भरो |

यदि अपने जीवन में
यह तीन सीख ले ली
तो समझो!
तुमसे ज्यादा ज्ञानी,
सहनशील एवं प्रगतिशील
कोई भी नहीं |

सविता मिश्रा
२४ जनवरी २०१२ से भी पहले लिखी होगी 

~ सोनचिरैया ~

सभी को श्री लाल बहादुर शास्त्री जी
के जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनायें!!
वे देश पर कुछ साल शासन करें होते तो शायद किसानो की हालत यह ना होती ..!!

जय जवान जय किसान नारा देने वाला आज आँसू बहा रहा होगा स्वर्ग में बैठा ...
तहेदिल से श्रद्धांजली उनको .. !!

Savita Mishra

बार बार तू!
हमको करता रहे तबाह

हताश हो!
भरने वाला नहीं हूँ मैं आह

हार मान लू!
ऐसा नहीं हूँ मैं किसान

बूढी हड्डियों में!|
अब भी हैं बाकी जान |

इस खेत में सोना उगा कर
दिखालाउँगा तुझको

कितना भी कष्ट पहुँचा
हरा नहीं पायेगा मुझको|

तू क्या सोचता है
 अपने मन की
तू कर लेगा
अनचाही बरसात-सुखा
इन प्राकृतिक आपदाओं से डरा देगा|


धरती का सीना चीर उगायेंगे
हम तनिक सोना
नहीं हैं अब हमको अपनी
पहचान यह खोना
कृषि प्रधान देश है यह
परचम हम ही लहरायेंगे

सोनचिरैया भारत ही हैं
विदेशियों से ही कहलवायेंगे!!

हताश हो बेच दी
चंद किसानों ने जो जमीनें

हममें जब तक हैं दम
हम न ऐसा होने देंगे

धरती को अपनी मेहनत से
मजबूर कर
देंगे!!

तुम हमको केहि विधि
ना हताश कर पाओंगे

कैसे भी हमें इसी मिट्टी में
मेहनत करते
पाओंगे!

बरसो या ना बरसो
हम कुछ जुगाड़ कर जायेंगे

इसी बंजर भूमि पर हम
फिर से सोना उगा
येंगे |
...सविता मिश्रा

अक्टूबर 01, 2014

फर्क पड़ता है ~

औरतों पर भी -
बहुत फर्क पड़ता है
देश के आर्थिक,राजनीतिक
कूटनीतिक हलचलों का
और सामाजिक व्यवस्था का!

देश में हो रहे
हर उथल पुथल का
उनपर भी तो
बहुत फर्क पड़ता है!

धूप सेंकती भी वो
इसी ऊहापोह में होतीं हैं
क्या आदमी गया जो घर से
लौट आएगा शाम को
बिना किसी मार-पीट के
बिना किसी की जिल्लत सहे!

कहीं कोई दंगा ना हो जाये
फंस जाये जान आफत में
जब तक आतें नहीं घर
पति-बच्चें और रिश्तेदार
तब तक जान होती है हलक में !!

पर समझाए किसे
नहीं समझने को तैयार
समाज के ठेकेदार
कि औरतें भी सोचतीं हैं
समझ सकतीं हैं देश के हालत
  वो वीरांगना हैं 
रानी लक्ष्मी बाई सरीखी
वो रीढ़ हैं देश की !!

कैसे यह पुरुष समाज
उन्हें अलग थलग कर
अक्सर ही देखता है|
फर्क पड़ता है उन्हें भी
समाज की हर
जायज-नाजायज
गतिविधियों से !!

नहीं एडियां रगड़तीं
नहीं गपियातीं अब
गर्मियों की दोपहरी में
नहीं बस निंदा रस पान करतीं
फुर्सत में वो भी सोचतीं हैं
कैसे फांसी पर चढ़े कसाब
कैसे देश का हो दिनोंदिन उद्धार
कौन कर रहा देश की फिज़ा खराब !!

भ्रष्टाचार तो उनके घर का
बजट ही गड़बड़ा देता है
तो कैसे ना फर्क पड़े
 वो अब मुगालते में नहीं जीतीं हैं !

बल्कि हर पल, हर क्षण
देश, समाज के भी
कल्याण की सोचतीं हैं
पर नहीं समझेगा यह समाज
वह गलतफ़हमी है कि
औरतें अब भी कमजोर
और चिंतन-हीन हैं |
++सविता मिश्रा ++



सितंबर 28, 2014

~कृपा बरसा जाना ~


धर्म विरुद्ध ना चले कभी हम
 मार्गदर्शन मैया तू सदा करती रहना ...
 हम तो तेरी ही संतान है
करम सदा हम पर बनाये रखना ..
माना मानुष तन में रह हम खुद पर
 गर्व कर बैठते कभी
 
कभी इतरा जाते है ..

तू तो सर्वव्यापी, सर्वशक्तिशाली हो तुम
जगतजननी और पालन हारी भी हो मैया ....
नादां-सा बालक समझ तू 
 क्षमा कर हमको अपना बना लेना ....
भटक गये जो हम सत्कर्मों से अपने
 सच्ची राह हमें अवश्य ही दिखा जाना ...
मैया तू  कृपा अपनी हम सब पर
इस नवरात्रे अवश्य ही बरसा जाना ......सविता मिश्रा

जय माता दी ...........आप सभी को नवरात्री की हार्दिक बधाईयां .....

===दिल की गहराइयों से === : ++त्यौहार क्यों मनातें हो ++

===दिल की गहराइयों से === : ++त्यौहार क्यों मनातें हो ++: त्यौहार तो अब हम क्या कैसे मना यें सब दिन तो सूखी नमक रोटी खा यें | फिर किसी तरह त्यौहार के खातिर पैसा जुटा यें थैला ले जरा बाजार हो अपना ...

सितंबर 26, 2014

===दिल की गहराइयों से === : ~प्राणवान दुर्गा~

===दिल की गहराइयों से === : ~प्राणवान दुर्गा~: स्कूल के प्रांगण में ही कोलकत्ता से कलाकार आते थे माँ दुर्गा की मूर्ति बनाने| सब बच्चें चोरी-छिपे बड़े गौर से देखते माँ को बनते| ऋचा को तो उ...

सितंबर 18, 2014

गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ~


गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी
जिह्वा भी गुस्से की ही भेंट चढ़ गयी
एक गुस्से में बोले एक तो दूजा चार बोलता
जिह्वा बेचारी सबके सामने शर्मसार हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ............

गालिया बकते एक दूजे को अचानक
आपस में ही मारामार हो गयी
एक ने चलाया हाथ दूजा करे पैर से वार
देखते देखते कुटमकाट हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........

एक ने सर फोड़ा तो दूजे ने हाथ तोड़ा
आपस में ही काटम काट हो गयी
एक ने लाठी उठाई तो दूजे ने पत्थर चलाये
देखते ही देखते खून की नदिया बह गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........

जब तक आपस में लड़ थक कर चूर ना हुए
धुल धरती की चाटने को मजबूर ना हुए
तब तक एक दूजे के खून के प्यासे रहे बने
मानवता यहाँ शर्मसार हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........

होश आया तो शर्म से आंखे झुक गयी
अपनी करनी पर पश्चाताप बहुत हुआ
गाली गलौज कब हाथापाई पर ख़त्म हुई
गुस्से पर गुस्सा प्रभावी ना जाने कब हुआ
गुस्से से गुस्से की तकरार जब हुई
गुस्से से गुस्से की तकरार हुई
तकरार हुई ....................
+++ सविता मिश्रा +++

सितंबर 09, 2014

~फूल की चीख~

गुड्डी दौड़ी दौड़ी झट फूल तोड़ लाई
माली को भी अपने पीछे पीछे भगाई|

गुड्डी नन्हें नन्हें पाँव से हारी
माली पड़ गया उस पर भारी|

गुड्डी का पकड़ कान उमेठा ही कि
दर्द से गुड्डी खूब तेज चीखी चिल्लाई|

माली बोला देख इतना दर्द तुझे हो आई
सिर्फ कान पकड़ने भर से तू इतना चिल्लाई|

फूल की सोच जिसको तूने बेदर्दी से तोड़ा
डाल से तोड़, यूँ रौंद करके उसको छोड़ा|

गुड्डी ने मानी गलती और बोली
आगे से कभी फूल नहीं तोडूगी|

अब तो दूजो को भी दूंगी यह सीख
फूल तोड़ उसकी निकालो ना चीख|....सविता मिश्रा

सितंबर 03, 2014

अतीत की दस्तक

दरवाजे पर कितने भी
ताले लगा बंद कर दो
पर अतीत आ ही जाता है
ना जाने कैसे
दरवाजे की दस्तक
कितनी भी अनसुनी करो
पर अतीत की दस्तक
झकझोर देती है पट
एक-एक कर यादों के जरिये 
आती जाती है
मन मस्तिक पर पुनः
वही अकुलाहट, हंसी
एक क्षण में आंसू
दूसरे ही क्षण ख़ुशी
बिखेर जाती है
हमारे आसपास
देखने वाला
पागल समझता है
उसे क्या मालुम
हम अतीत के
विशाल समुन्दर में
गोते लगा रहे है
वर्तमान की
छिछली नदी को छोड़|..सविता

सितंबर 01, 2014

शिक्षा प्रेम की- यूँ ही मन की बात


१..शिक्षा प्रेम की पर नफरत बढ़ती रही
जिन्दा थी कभी अब लाश होती रही |
२..बेइज्जत नारी की भरे बाजार कर दी
कोफ़्त उस कामी के प्रति जगती रही |
३..हिम्मत दिखाती तो बचा लेती शायद
दिन रात बस यही सोच सोच कुढ़ती रही |
४..अहम् मार सर झुकाए खड़ी चौराहें पर
बुद्धू कह हम पर ही उँगलियाँ उठती रही |
५..स्नेह का आँचल फैला दिया था अम्बर तक
मासूमियत ही अपनी खता बनती रही |
६...कलियों को मसल फेंक दिया अँधेरे में
दरिंदगी के पाश में कई जकड़ती रही |
७..शैतान के अन्दर का जाग उठा इंसान
हैवानियत फिर भी अपार होती रही |
८...दोजख का भी डर काफूर होता गया
दुनिया बढ़-चढ़ कर पाप करती रही |
९...जींस टाप पहन रहती माँएं फिगर बनाए
ऐसी नार पुरुषों की नजर में चुभती रही |
१०..दूध का कर्ज चुकाना हुआ मुहाल अब
पिलाया क्या दुनिया कुतर्की होती रही |
११.. क्या हाल तूने अपना बना डाला सविता
मजलूम कोई तू खुद को ही कोसती रही |
--००--

उफ़ गर्मी बहुत है रे

उफ़ ! गर्मी बहुत है रे..
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !
रह-रह के हैसियत दिखलाए
पास खड़ी कितना इतराए 
महंगी-महंगी साड़ी पहने 
तन पर लादे हीरों के गहने 

उफ़ गर्मी बहुत है रे ....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !

निशदिन मंहगे पार्लर को जाए
ख़ुद पर लीपा-पोती करवाए
बालों पर कालिख पुतवाए
नाखूनों पर सान चढ़वाए
दाँत भी डाक्टर से चमकवाए
अपनी हर कुरूपता छुपाए
कृत्रिम सुन्दरता पर भी इतराए

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !
पति की चाकरी पर इठलाए
उसको आला अफसर बतलाए
पति न देता हो चाहे कुछ भाव 
कहे जमीन पर रखने न दे पाँव 
कहती फूलों की सेज पर सोए
पति के दुलार में सुध-बुध खोए
उसके प्यार की क़समें खाए
प्रेम की झूठी तस्वीरें दिखलाए

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !

बच्चो की बड़ाई करते नहीं अघाए 
उनकी कमायाबी की कथा सुनाए
फेल हुए को भी पास बताए
उनकी नौकरी पर भी इतराए 
बिगड़ैलों को संस्कारी जतलाए
अच्छे-खासे रिश्तों को ठुकराए

उफ़ गर्मी बहुत है रे .....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !

सास ससुर ठीक से खाना न पाए
ख़ुद चुप्पे-चुप्पे रबड़ी-मेवा उड़ाए
झूठी सेवा के यश-गान गाए
पीठ पीछे सास को गुच्चि आए
पति के सामने भोली बन जाए
त्रिया चरित्र के रंग-ढंग दिखलाए

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !


सविता मिश्रा 'अक्षजा'