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सितंबर 01, 2014

शिक्षा प्रेम की- यूँ ही मन की बात


१..शिक्षा प्रेम की पर नफरत बढ़ती रही
जिन्दा थी कभी अब लाश होती रही |
२..बेइज्जत नारी की भरे बाजार कर दी
कोफ़्त उस कामी के प्रति जगती रही |
३..हिम्मत दिखाती तो बचा लेती शायद
दिन रात बस यही सोच सोच कुढ़ती रही |
४..अहम् मार सर झुकाए खड़ी चौराहें पर
बुद्धू कह हम पर ही उँगलियाँ उठती रही |
५..स्नेह का आँचल फैला दिया था अम्बर तक
मासूमियत ही अपनी खता बनती रही |
६...कलियों को मसल फेंक दिया अँधेरे में
दरिंदगी के पाश में कई जकड़ती रही |
७..शैतान के अन्दर का जाग उठा इंसान
हैवानियत फिर भी अपार होती रही |
८...दोजख का भी डर काफूर होता गया
दुनिया बढ़-चढ़ कर पाप करती रही |
९...जींस टाप पहन रहती माँएं फिगर बनाए
ऐसी नार पुरुषों की नजर में चुभती रही |
१०..दूध का कर्ज चुकाना हुआ मुहाल अब
पिलाया क्या दुनिया कुतर्की होती रही |
११.. क्या हाल तूने अपना बना डाला सविता
मजलूम कोई तू खुद को ही कोसती रही |
--००--

उफ़ गर्मी बहुत है रे

उफ़ ! गर्मी बहुत है रे..
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !
रह-रह के हैसियत दिखलाए
पास खड़ी कितना इतराए 
महंगी-महंगी साड़ी पहने 
तन पर लादे हीरों के गहने 

उफ़ गर्मी बहुत है रे ....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !

निशदिन मंहगे पार्लर को जाए
ख़ुद पर लीपा-पोती करवाए
बालों पर कालिख पुतवाए
नाखूनों पर सान चढ़वाए
दाँत भी डाक्टर से चमकवाए
अपनी हर कुरूपता छुपाए
कृत्रिम सुन्दरता पर भी इतराए

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !
पति की चाकरी पर इठलाए
उसको आला अफसर बतलाए
पति न देता हो चाहे कुछ भाव 
कहे जमीन पर रखने न दे पाँव 
कहती फूलों की सेज पर सोए
पति के दुलार में सुध-बुध खोए
उसके प्यार की क़समें खाए
प्रेम की झूठी तस्वीरें दिखलाए

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !

बच्चो की बड़ाई करते नहीं अघाए 
उनकी कमायाबी की कथा सुनाए
फेल हुए को भी पास बताए
उनकी नौकरी पर भी इतराए 
बिगड़ैलों को संस्कारी जतलाए
अच्छे-खासे रिश्तों को ठुकराए

उफ़ गर्मी बहुत है रे .....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !

सास ससुर ठीक से खाना न पाए
ख़ुद चुप्पे-चुप्पे रबड़ी-मेवा उड़ाए
झूठी सेवा के यश-गान गाए
पीठ पीछे सास को गुच्चि आए
पति के सामने भोली बन जाए
त्रिया चरित्र के रंग-ढंग दिखलाए

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !


सविता मिश्रा 'अक्षजा'

अगस्त 27, 2014

~कुछ यूँ ही ~

१....
वो थे कुछ और दिखाते कुछ और ही रहें
खौफ नहीं उन्हें छुपाते कुछ और ही रहें
चेहरे की भावभंगिमा से समझना मुश्किल
दुःख था मगर लुटाते कुछ और ही रहें|  सविता

२.....
मेरी तन्हाईयाँ आज पूछती है मुझसे

कुछ तो कमी थी जो दूर हुए तुम मुझसे|
क्षण भर ही सही पलट कर फिर आ जाओ

भूल सब गले से लिपट रो लुंगी मैं तुझसे|
सविता

अगस्त 23, 2014

दिल की सच्चाई

हे प्रभु, सुन !
कर दें अँधेरा
चारों तरफ.. .
उजाले काटते हैं / छलते है !
लगता है अब डर
उजालें से
दिखती हैं जब
अपनी ही परछाई -
छोटी से बड़ी
बड़ी से विशालकाय होती हुई.
भयभीत हो जाती हूँ !
मेरी ही परछाई मुझे डंस न ले,
ख़त्म कर दे मेरा अस्तित्व !
जब होगा अँधेरा चारों ओर
नहीं दिखेगा
आदमी को आदमी !
यहाँ तक कि हाथ को हाथ भी.
फिर तो मन की आँखें
स्वतः खुल जाएँगी !
देख सकेंगे फिर सभी...
/ और मैं भी /
दिल की सच्चाई !


सविता मिश्रा

अगस्त 15, 2014

बलिदान / शहादत / त्याग

माना होते हैं फौजी शहीद
जब विदेशियों से युद्ध होता हैं

हम अपनों से ही लड़ शहीद हुए
क्यों नहीं कोई कभी भी रोता हैं

बाल बच्चें सब दूर रहते हमसे
याद करके दिल बेबस सा होता हैं

दूजों की करते रक्षा रात दिन हम
अपनों की फिक्र में दिल तड़पता है

जर्जर मकानों में रह परिवार अपना
अब गिरे तब गिरे चिंता मन ढोता हैं

बात भी कभी-कभी कर नहीं पातें बीबी बच्चों से
याद में दिल अपना कभी-कभी खूब रोता हैं

ऐसे पढ़ते ऐसे खेलते होंगे बच्चें
ख्यालों में बस सोचा करते हैं

नहीं देता कोई भी अपनापन हमें
हेय दृष्टि से देखा जाता हैं हर पल

अपने बच्चें भी नहीं किसी से संभाले जाते
गुनाह हम पर ही फट से थोप जाते  हैं

हमारी त्याग तपस्या नहीं समझते कोई
कीचड़ उछालने लगते हैं देखो हर कोई

फौजी भी करते बारी-बारी रक्षा देश की
यहाँ एक पर ही सारा का सारा बोझा होता हैं

कितने हाथ पैर हो हर दूजा अपराधी हैं यहाँ
हर कोई समझ के भी नासमझ हो जाता हैं

मदद करने को कोई जल्दी बढ़ता नहीं कभी
अपराधी पकड़ा जाय जल्दी बस चाहता यही

पुलिस के पास तो हैं जैसे कोई जादुई छड़ी
घुमाये झट और हाजिर मुजरिम कर दे यही

अपराध होते भी देख अनदेखी कर देते सभी
पुलिस पर ही बस दोशारोपड़ करते जाते हैं

खुद चाहे सर से नख तक हो भ्रष्टाचार में डूबा
पुलिस पर तानाकसी ना करे तो यह आठवाँ अजूबा| ...सविता मिश्रा

अगस्त 12, 2014

~रहा है कौन~


गम को मुस्करा कर कौन छुपा रहा
रो के अपनी कमजोरी कौन बता रहा
सुख के समुन्दर में ना कोई गोते लगा रहा
उथले पानी में ना कोई उतरा ही रहा
प्यार के समुंदर में ना कोई नहा रहा
नफ़रत का ही दिया ना कोई जला रहा
वादें जो निभा ना सकें वह कौन कर रहा
हर वादा भी अब कौन यहाँ निभा रहा
मुस्कराहट पर किसी के कौन अपनी जान लुटा रहा
अपनी थाली का भोजन कौन किसको बाँट रहा
दुसरे के मुहं से निवाले ही तो छीन रहा
कौन किसके लिए यहाँ अब मर मिट रहा
किसी के गम में अब कौन आंसू बहा रहा
दुसरे की ख़ुशी में इंसान है रो रहा
जानवर सा हर इंसान यहाँ बन रहा
जानवर भी देख शर्मसार है यहाँ
इंसान वह हर कर्म है कर रहा |...सविता मिश्रा
दूसरा रूप यह हैं .......
२ ....
गम को मुस्करा कर कौन छुपा रहा,
रो के अपनी कमजोरी कौन बता रहा|
सुख के समुन्दर में ना कोई गोते लगा रहा,
उथले पानी में ना कोई उतरा ही रहा|
प्यार के दरिया में ना कोई नहा रहा,
ना कोई नफ़रत का ही दिया जला रहा|
वादें जो निभा ना सकें वह कौन कर रहा,
हर वादा भी अब यहाँ कौन निभा रहा|
मुस्कराहट पर किसी के कौन अपनी जान लुटा रहा,
दूसरे की आँखों में आंसू ही तो बाँट रहा|
दुसरे के मुहं से तो छीन रहा हैं निवाले,
अपनी थाली का भोजन कोई क्यों किसी से बाँट ले|
कौन किसके लिए यहाँ अब मर मिट रहा,
बल्कि मार-काट पर ही तो आमदा हो रहा|
किसी के गम में अब कौन आंसू बहा रहा,
दुजे की ख़ुशी देख इंसान है बस रो रहा|
जानवर सा हर इंसा अब तो यहाँ बन रहा,
जानवर भी देख यह सब शर्मसार हो रहा|
इंसान अब हर वह गलत कर्म है कर रहा,
जिससे उसमे इंसानियत का तो ह्रास हो रहा|...सविता मिश्रा


फिर तीसरी बार रोशन भैया द्वारा मार्गदर्शन करने के पश्चात्
३.....

गम को हंस कर छुपा रहा है कौन
रो के कमजोरियां बता रहा है कौन|

उथले पानी में ना कोई उतरा है,
सुख के दरिया में नहा रहा है कौन|

अब यकीं आता नहीं वादों पर,
वादा भी अब निभा रहा है कौन|

आंसू ही बांटता है आँखों में,
मुस्कराहट पर जान लुटा रहा है कौन|

दुसरे के मुख से छीन रहा हैं निवाले,
अपनी थाली का भोजन बाँट रहा हैं कौन|

हर कोई मार-काट पर आमदा हुआ,
किसी के लिए मर मिट रहा हैं अब कौन|

दूजे की ख़ुशी देख इंसा है बस रो रहा,
किसी के गम में अब आंसू बहा रहा हैं कौन|

जानवर सा हर इंसा बन रहा हैं अब यहाँ,
इंसा बनने की जहमत अब उठा रहा कौन|

हर किसी में इंसानियत का ह्रास हो रहा,
इंसा जैसा बन्दा मिल रहा हैं अब कौन| सविता मिश्रा

हमारी भावनायें (सविता मिश्रा)

अगस्त 10, 2014

राखी भेजा है

रक्षा सूत्र में पिरोकर अपना प्यार भेजा है
भैया तुझे मैंने स्व रक्षार्थ का भार भेजा है|


माना मन में तेरे राखी का सम्मान नहीं
बड़े मान से हमने अपना दुलार भेजा है|


रिश्ता भाई बहन का हैं एक अटूट बंधन
होता जार जार जो सब जोरजार भेजा है|


ढुलक गया मोती जो मेरी नम आँखों से
पिरोकर मोती हमने उपहार भेजा है|


गिले शिकवे भूल सारे फिर एक बार
सहेज कर यादें लिफ़ाफ़े में मधुर भेजा है|


राखी दो पैसे की हो या हजारों की भैया
चंद धागों में लिपटा प्यार बेशुमार भेजा है|


मतलब के हो गये सारे ही रिश्तें नाते
हो मधुर रिश्तें सन्देश दें मधुकर भेजा है|


माना होता प्रगाढ़ बहुत खून का रिश्ता
स्नेह अपार निहित राखी का तार भेजा है|


क्रांति चेहरे की भैया हो ना फीकी कभी
हरने सारे गम माँ का प्यार विधर भेजा है|

.सविता मिश्रा

जुलाई 31, 2014

कष्ट हर एक सरलता से सहे जा रहे है-

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कोमलांगी सुकोमल थे बहुत मगर
कष्ट हर एक सरलता से सहे जा रहे है|

रहम ही करके पाला पोसा है आपको
होके खड़े यूँ तभी आप बोल पा रहे है|

ढहाए हम पर ना जाने कितने ही सितम
क्षमा कर आपको हम मुस्कराते आ रहे है|

नहीं है मलाल ना कोई कडवाहट ही है
भूल सब कुछ सम्मान दिए जा रहे है|

करते नहीं कीमत आप जरा सी हमारी
सर-आँखों पर हम बैठाते आ रहे है|

उड़ाते हो मखौल सदैव कह कमजोर
हम तो गाथा आपकी सुनते आ रहे है|

कही बेबस नहीं थे कभी भी तनिक भी
सर्वोपरि आप ही को मानते आ रहे है|

आइने की तरह रही साफ़ नियत हमारी
आप ही हमें बदनीयती से देखते आ रहे है|

सदियों से समझते रहे अहमक आप हमें
हर रूप में हम आपको आदर देते आ रहे है|


सविता मिश्रा

जून 22, 2014

====तांका ====

१..निष्ठुर नारी
तिक्त हरी मिर्च सी
बाते उसकी
जब भी बोलती वो
चोटिल ही करती|

२...जर्द पत्तिया
बेसहाय सी बिखरी
डाल से टूट
डाल पर थी हरी
हवा में बलखाती|

३..पूत लाडला
 मिट्टी में लोटकर
मटमैला हो
मस्ती में कैसे डूबा
दादा की छत्र छाया|

४....
.लाल स्याही से
हस्ताक्षर कर दे
परीक्षक जो
चढ़ जाता नम्बर
उम्र भर के लिए| .
.सविता मिश्रा

मई 05, 2014

आरक्षण रक्षण किसका भक्षण सबका

आरक्षण ऐसा लगता है कि रक्षण करने के बजाय भक्षण कर रहा है
एक का रक्षण हुआ या नहीं पर दूजे पूर्ण रूप से इस आरक्षण रूपी राक्षस का शिकार हो गये| एक को दबाना दूजे को उठाना क्या गलत नहीं है, क्या हम अपनी दो या चार औलादों में भेदभाव करते है| हम सभी को एक सी शिक्षा, प्रेम, धन, मकान देने में कहा भेद करते है, पर अपना देश अपनी औलादों में कर रहा है| हो सकता है छोटा प्रिय हो (अक्सर कहा जाता है) बड़ा थोड़ा अप्रिय, फिर भी हम बड़े के हाथ पैर काट उसकी उचांई तो नहीं कम करते न, बड़ा बड़ा ही रहेगा हा छोटे को थोड़ा ज्यादा उचांई तक पहुँचने का साधन (मोटिवेट) दे सकते है, उचांई नहीं| परन्तु हमारे देश में आरक्षण के नाम से कुछ ऐसा ही हो रहा है| हम (आरक्षण)एक का हाथ पैर काट दूसरे को गद्दी आरूढ़ कर रहें है, यह नहीं समझ रहे है हम कि बिना नींव मजबूत किये जो मंजिल किसी भी तरह खड़ी भी कर दी जा जाये, एक ना एक दिन धराशायी हो ही जाती है| पद में भी आरक्षण देना कुछ ऐसा ही है|
यदि काबिल बनाना ही चाहते है तो उनकी नींव मजबूत बनाएं वह भी धर्म के आधार पर क्यों गरीबी के आधार पर क्यों नहीं| जो बुद्धि होते भी शिक्षा गरीबी के कारण नहीं ग्रहण कर पाते, उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का मौका देना चाहिए| जिसका काम उसी को साजे दूजा करे तो डंडा बाजे सही कहा है हमारे बुजुर्गो ने, जो जिस लायक है ही नहीं आरक्षण के द्वारा उसे वह पद दे देना कहा कि बुद्धिमता है| यह तो अपने को (देश)ही कमजोर करना हुआ जो लायक है, वह दर दर भटके नाइंसाफी ही तो है यह| आखिर कब जागेगें हम जब बिलकुल बर्बाद हो चुके होगे तब |
हमे तो लगता है आरक्षण की बैशाखी बांटनी बंद कर देनी चाहिए ,बाँटना हो तो शिक्षा बांटे जो सब के काम आये सभी को अपने लक्ष्य को निर्धारित करने का हुनर पढाओ, उस लायक बनाओ, बिना भेदभाव के जैसे कि वे देश के लिए कुछ कर सकें| देश के सभी बच्चे लायक होगे तो देश तरक्की करेगा मजबूत होगा| उसके सभी स्तम्भ मजबूत होगे तो किसी दुश्मन की अपने देश पर कुदृष्टि डालने की हिम्मत ना होगी |बिना मेहनत और काबिलियत के पायी हुई चीज की कद्र नहीं होती| जो व्यक्ति अपने पद का कद्र ही नहीं करेगा तो क्या होगा देश का, आप सब खुद ही समझ सकते है|
आरक्षण के नाम से जो जहर फ़ैल रहा है वह भी ख़त्म हो जाएगा| जगह जगह हो रहे जातीय संघर्ष समाप्त हो जायेगें| सब मिल-जुल अपने देश की तरक्की में हाथ बटाएगें और सपनों का भारत बनाने में सहयोग करेगें| सविता मिश्रा

अप्रैल 28, 2014

खुद्दारी भूल जा-

नौकरी करने यदि चला है, तब तो खुद्दारी भूल जा
किसी तरह कनिष्ठों के लगड़ी फंसा खुद्दारी भूल जा |

काना फूसी कर-करके मैनेजर को तू पटा के रख
नमक मिर्च लगा खबर को पेशकर खुद्दारी भूल जा |

इंसानियत छोड़ हमेशा के लिए, रख दें ताक पर अब
बनना है यदि किसी का ख़ासम-ख़ास खुद्दारी भूल जा |

चमचमाती कार से उतरने से पहले ही खोल दरवाजा
तू चमचागिरी की कर सब हदें पार खुद्दारी भूल जा |

साहब के हर हाँ में हाँ मिलाकर खूब कर चमचागिरी
समझ के नासमझ बन बंद रख के मुँह खुद्दारी भूल जा |

आँख-कान लगाये रह हरदम अपने अधिनस्तों पर
बॉस के आते ही भर कान उसका खुद्दारी भूल जा |

हर वक्त जी हुजूरी में अपना सर झुकाए रह खड़ा
घर पर भी बॉस निगाहें उठाये तो खुद्दारी भूल जा |

हदों से भी हद तक गुजरता चला चल मन को मार
राह तरक्की की बढ़ना है गर तो खुद्दारी भूल जा |

जब घृणा से भरा दिल तेरा ही कभी धित्कारे तुझको
आँसुओ को पीकर तू हँसता चल खुद्दारी भूल जा |

गिरगिट की तरह रंग बदलना बना फितरत अपनी
अपनी ही धुन में मस्त चलता चल खुद्दारी भूल जा |

हँस रहा है गर कोई तुझ पर निकल जा कर उसे अनदेखा
लड़खड़ा गिरा गर उठ फिर चल संभल के खुद्दारी भूल जा |

खुद्धारी भी लगे सर उठाने जब खुद्दारी भूल जा
तू दिल पर रख पत्थर अपने और खुद्दारी भूल जा | 
==००==सविता मिश्रा 'अक्षजा'

मन में आता गया लिखते गये शायद फिर बड़ी हो गयी ज्यादा ही ...:D

अप्रैल 09, 2014

हाँ अहिल्या तो हूँ -


हाँ अहिल्या
ही तो हूँ
प्रस्तर सरीखी
पर हमें नहीं किसी
राम की तलाश
खुद ही हरिवाली पाने की
भरपूर कर रही हूँ चेष्टा !
या खोज रही हूँ
घर बाहर

अपनी निष्ठां लगन से एक सुन्दर बगिया
बसाने की जद्दोजहद करती
कोई मेहनत कस महिला |
वह आकर अपने
खून पसीने से
भर जाएगी नया जीवन
और मैं प्रस्तर से
हरीभरी कन्दरा हो जाऊंगी |
राम नहीं सीता
की हैं आज हमें
तलाश जो चुपचाप
बिना किसी शोर शाराबे के
कर जाती है
ना जाने
कितने नेक काम | सविता

मार्च 31, 2014

सदैव तो चुप ही रही-

जीवन की आपा धापी में नारी
अपना ही जीवन जीना भूल गयी |

कभी बेटी-बहन, पत्नी-माँ बनकर जिया
अपने ही जीवन को तूल देना भूल गयी |

मानव जीवन में नारी की कोई कद्र नहीं
अग्रणी समाज में भी नारी स्वतन्त्र नहीं |

वसूलों की जंजीरों में हुई जकड़ी
दुखित हुई जो तनिक भी अकड़ी |

खुशियाँ सारी दूजो पर लुटाती फिरती
गम को अपने सीने से लगा दफ़न करती |

सुख-सम्पदा सब दूजों में ही बाँट देती
दुसरे की कमियों को अपना बता लेती |

ऐसे ही तो नारी जीवन यापन कर रही
जीवन के झंझावतों को सहती जी रही |

सब कुछ सह-सुनकर भी
सदैव तो चुप ही रह रही|
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
---------------------०० ---------------------

मार्च 25, 2014

कुछ मन की भड़ास

न डर डर
न थर थर
डरा डरा
थरथरा रहा
हो गया जब थेथर
तो हर हर का
मुद्दा उठा लिया
खुद के हार का
डर लेकर .
..कैसी रही .....वैसे क्यों हम सब इन चक्करों में पड रहे है क्या देगें हमें सिर्फ महगाई बढाने के सिवा ......एक बार देखने का मन है मोदी जी को पर होगा वही जो होता आया है कोई बदलाव नहीं होने वाला ...हमारा मानना है कोहू नृप होए हमें तो हानि ही हानि |

वोट की चोट
करारी और भारी
एक ही बारी| savita


सब के सब कुर्सी की दौड़ में है नहीं मिले तो कोई आंसू बहा रहा कोई बगावत कर रहा कोई दल बदल अपनी कुर्सी पक्की कर रहा ..फेवीकाल के  जोड़ जैसा है कुर्सी और नेता का नाता सभी को कुर्सी ही तो है भाता ..भाये भी क्यों ना यह कुर्सी सात पुश्तों तक ठाठ बाट जो बना देती है ..भैये किसी को भी मिले कुर्सी का मोह कोई क्यों कर छोड़े ...हमें मिलती तो क्या छोड़ते :P

दलबदलू
खूब मौज इनकी
चुनाव मध्य ..सविता


मन तो है बसपा सपा को भी देखने का ....:D
पर वही धाक के तीन पात इनकी कोई नहीं है जात ..थाली का बैगन है सब जिधर भार देखेगे पलट जायेगें अपना और अपनो के लिए ही फायदा उठायेगें हमें बेसहारा यूँ अपनी गलियों में छोड़ जायेगें बनने के बाद पांच साल फिर नजर नहीं आयेगें |


दीपक लेके ढूढने से भी नहीं मिलते
सच्चे लोग अब कही भी नहीं मिलते
खोजते रह जाओ सूरज के भी उजाले में
 किसी भी चोले में
भले लोग नहीं मिलते| सविता :) :D

बिकते लोग
जैसे चाहा हुआ क्या
निराश मन| savita

मार्च 08, 2014

++एक दिन ही सही ++ (कौन सा ! कैसा महिला दिवस ! )


लो !!

पुनः आ गया नामाकूल 'महिलादिवस'
मनाओ ख़ुशी से या फिर रोकर
जैसे भी मनाना हो|
उपेक्षितों के लिए ....
निर्धारित है एक दिन
विशेष एक दिन देकर
कुछ उसे खुश कर देते हैं
और कुछ खुद भी खुश हो लेते हैं|

सिर्फ औपचारिकता और
दिखावे के लिए ही सही
इस पुरुष-प्रधान समाज में
हे नारी ! तुझे एक दिन मिला तो सही|
पुरुष वर्ग जानता है कि तू
थोड़े से ही खुश हो जाती हैं, अतः
तेरे लिए यह तिलस्मी-जादुई दिन
बना रक्खा हैं उसने |

अपने लिए उसने एक भी दिन नहीं रक्खा ..
देखा ना !!!
कितना महान हैं वह
जानता हैं सब दिन तो उसका ही हैं|
अतः नारी महान हैं !
यह कह..
आज यह दिन सभी मनाएंगे
वह भी जो इज्जत करते हैं
और वह भी जो रोज गालियाँ देते हैं|

मन में राम बगल में छुरी रखने वाले बहुत दिख जाएगें
नारी को पैर की जूती कहने वाले भी बढ़चढ़ कर मनाएगें|

खूब हर्षौल्लास से मनाओं सभी
क्योंकि पता नहीं फिर
मौका मिले या ना मिले!

अगले वर्ष शायद ...
तुम कही किसी कोने में सिसकियाँ लेती मिलो
या किसी के घर की बहू बन प्रताड़ित होती रहो
दुःख सहती हुई अपना मानसिक संतुलन खो दो
या किसी पागल खाने में अपना दिन काटती दिखो
या फिर अपने पति के इशारे पर कठपुतली बन फिरो
या जला दी जाओ सास-ससुर के द्वारा दहेज़ की बलि-वेदी पर
या नोंच ले तुम्हारे हाड़-मांस के शरीर को कोई दरिंदा
या तुम खुद तंग आ छोड़ जाओ इस बेदर्द दुनिया को
या एसिड से जला दिया जाए तुम्हारा गुलाब सा चेहरा
या बिना किसी गलती के भी तुम्हें मिलती रहें सजा
या खौफ़जदा हो तुम ना आ सको दुनिया के सामने
या गली मुहल्ले में बदनाम कर दी जाओ समाज के ठेकेदारों द्वारा
या गलती न होने पर भी मुहं छुपाती फिरो इस समाज से

कमजोर नहीं हो तुम किसी से...
पर साबित हो जाओ तुम कमजोर|
ऐसा माहौल हो जाए तैयार
तुम्हारे ही आस पास कि
तुम बिन बैसाखी के सहारे
बढ़ना ना चाहो आगे कभी
हर पगडंडी पर तुम्हें
घूरते दिख जाए कुछ भेंडियें|
तुम्हारा जीना हो जाए दुश्वार
इससे पहले ही मना लो इस दिवस को
कल किसने देखी हैं अतः
आज मना लो ख़ुशी से इस दिन को|
चलो हम भी मना ही लेते हैं इस एक दिन को
इसी लिए कहते हैं मुबारक हो महिला दिवस आप सभी को|....सविता मिश्रा



या देवी सर्व भूतेषु मात्रृ रूपेण संस्थिता1
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः !
जय माता दी .........