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दिसंबर 14, 2016

औरतें मेकअप क्यों करतीं (मन का गुबार )

सीधा सा सवाल फेसबुक पर पूछा था हमने! औरतें मेकअप क्यों करतीं हैं ?? कइयों ने बड़े रोचक जबाब दिए| कईयों की कुंठा दिखी जबाब में|

हर किसी के द्वारा सवाल पूछने का कारण अलग अलग होता है। और जबाब भी आदमी अपने मनःस्थिति के अनुसार देता है| सवाल-जबाब करते वक्त आदमी के मन में क्या चल रहा हैं यह कोई न जान सकता! ख़ासकर सवाल के सन्दर्भ में | हाँ उत्तर कई मजे में देतें, कई गंभीर होकर| कईयों को ऐसे वैसे सवाल पर गुस्सा आता तो वो धो भी देते| उत्तर पढ़ते ही समझ आ जाता क्या कहना चाह रहा कहने वाला| किन्तु प्रश्न का प्रयोजन प्रायः नहीं समझ आता|
जैसे हमने देखा इसी सवाल के साथ किसी दुसरे की पोस्ट को | वहां अलग तरह के आंसर थे|
फ़िलहाल हम सोचे थे  अपनी फेसबुक फ्रेंड लिस्ट वालो का मंतव्य जाने इस सवाल से। 😊इसी लिए लिखे भी कि ओन रिश्क पर जबाब दें | पर शायद कई ओन रिश्क लिखने का मतलब न समझे, या फिर उसे ध्यान से न पढ़े! लापरवाही अक्सर घातक होती है! यही हुआ यहाँ भी |

कइयो ने जबाब दिया कि पुरुषों को लुभाने के लिए करती हैं | बड़ी अजीब बात लगी, क्रोध भी खूब  आया | जबाब  पढ़  के लगा आदमी ने अपनी सोच न बदली, जमाना भले इतना बदल गया | वह खुद घंटो मेकअप करने लगा| पार्लर में जाकर संवरने भी लगा| लाली लिपस्टिक भी पाए तो लगाने से चुके न | पर औरतें सजे तो वह लुभाने के लिए या सिर्फ पति के लिए सजे | वरना पागल जैसी टहले !!
भई वाह ! कंघी करके सलीके से कपड़े भी पहन ले तो सजना समझ बैठते लोग| फिर वह व्यूटी पार्लर में भारीभरकम मेकअप को क्या कहेंगे ?
हमें तो लगता है आदमी जलता है कि औरतों के लिए इतने सारी प्रसाधन सामग्री आखिर क्यों बनी? इतने सारी वैराइटी कपड़ों की क्यों है| उसके लिए नाममात्र की ही  क्यों?

...सोचे थे ऐसे माथा ठनकाने वाले जबाब वालों को उड़ा देंगे| फिर सोचे सब का अपना अपना दिमाग, अपनी अपनी सोच |
सच, और मन की बात बोलने के लिए क्यों हटाये किसी को| हो सकता है जो ऐसा न बोले हों, पर सोच ऐसी ही हो उनकी भी तब !! कपड़े और मेकअप पर आदमी की सोच अक्सर औरतों की सोच से टकरा जाती ही है|
औरतें सज ले, मुस्करा दें, छज्जे पर खड़ी हो जाये तो आदमी को खल जाता क्यों भई ? क्या वह जीव न, क्या उन्हें बंद घर में घुटन न होती? क्या  उन्हें  आपकी  तरह स्वछन्द  न सही  पर  स्वतन्त्र  रहने  की आजादी न !

भगवान के लिए ऐसी मानसिकता से बाहर निकले| यदि आप लुभाने क लिए सजते हैं तो आप हम औरतों के लिए भी सोच सकते हैं , क्योकि सब कुछ बदला जा सकता पर सोच अचानक से किसी की न बदली जा सकती|

वो जमाना गया जब दो साड़ी में दादी, ताई, चाची की जिन्दगी बीत जाती थी| अब जमाना अलग है अब औरतें घर के बाहर निकल रहीं और पागल की तरह बाहर नहीं निकल सकतीं | उनसे उनकी सुन्दरता के आयाम छिनने से अच्छा है आप अपनी कुंठित सोच अपने मन व दिलो-दिमाग से छीन लीजिए| सविता

नवंबर 19, 2016

लक्ष्मीबाई के जन्मदिन पर मन की बात

आत्मा सुकून पायेगी ...:)
सभी नारियों और बच्चियों को झाँसी की रानी बनने-बनाने का आह्वाहन!
कभी अंग्रेज सत्ता काबिज करने को लड़ते थे| पर आज के अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम हम भारतीय नारियों पर ही कुदृष्टि डाल रहें हैं| एक गुलाम दूजे को गुलाम बनाने पर तुला| हास्यास्पद हैं यह तो ...| खुद जियो और औरों को भी जीने दो चैन से |
नारियों गुलामी का सख्त विरोध करो मिलकर| तलवार न सही किताबें थामों हाथो में और अपना परचम लहराओं| टूटपुजियें छक्के-छिछोरे, जो हर वक्त ताड़ते हैं आपको , भद्दी टिप्पड़ी करते हैं, मुहं तोड़ जबाब दो उनका .....|
हार्दिक शुभकामना सभी को ...|

और ......
लक्ष्मीबाई की जन्मदिन पर भी हार्दिक बधाई .....| दस स्त्री भी हर जन्मदिन पर उनकी तरह बनना चाहेगी तो उनकी रूह सच में सुकून पायेगी|....सविता

सेवा का फल

Dinesh Tripathi भैया आपकी बात का जबाब ......:)

सेवा का फल-

बड़ी शिद्त्तो के बाद
पति पर शासन कर पाते
ना जाने कितने सालों के
सेवा का फल हम पाते|
चंद दिनों में हम पतिदेव को
अपना आदेश कैसे दे पाते
सालों-साल तपस्या करके
हुक्म फिर हम उनपर चलाते|
शुरू-शुरू में तो डरे सहमे से
एक कोने में खड़े हो जाते थे
जो आदेश मिलता वह
इमानदारी से निभाते थे |
नहीं थे पहले अपने यह तेवर
डर-डर ही जीते थे हम भी
अपमान का घूंट रह-रहकर
कभी-कभी पीते थे हम भी|
अब मुद्दतों बाद
सेवा कर-करके
यह स्तिथि है आई
हुक्म चलाने की नौबत
बड़ी मुश्किल से है पाई|

आज की नवयुवती 
जाते ही ससुराल 
शासन करना चाहती
बन के सास की काल |

वृक्ष को ही जड़ से झकझोर देती 
पति के दिल को भी वह तोड़ देती 
पिज्ज़ा बर्गर सा झट बनता समझ लेती  पकवान 
बीरबल की खिचड़ी बनाने का होता नहीं उसे भान |

जल्दीबाजी की होती उसे होड़  
घर प्यारा अपना देती वह तोड़ |

अकेले रहकर सारा जीवन अपना काट देती 
या फिर रिश्ते को ही टुकड़ों में वह बाँट देती |..
क्षुधा शांत करनी हो गर तो बीरबल सा रखो सब्र 
वरना फिर खोद लो अपने ही मुहब्बत की कब्र |

हर पत्नी की दशा और दिशा ...:) सविता मिश्रा
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12 March 2013 at 18:15 · Like · 1

नवंबर 18, 2016

भुक्तभोगी हैं क्या ...:)


गुरुत्वाकर्षण का नियम कहिये या मंथरा जैसे लोगों की उपलब्धी .....!! बुराई जहाँ, जिससे शुरू होती हैं, घूम फिर के फिर वहीं आ जाती है ....!! बस उसमें नमक मिर्च और हाँ खटाई भी लग जाती है ......!!
उदाहरण बताते चले ...!
जैसे आपने कहा 'यार शर्माइन बड़ी कंजूस हैं, इतने घटिया कपड़ें या चीजें उपहार देती है कि जी करता है कि किसी को दे दे! पहनने लायक होते ही नहीं ....!!
यह बात दुसरे के पास फिर तीसरे के पास पहुंची .......! तीसरे से फिर शर्माइन के पास और शर्माइन फिर गुस्से में तमतमा आपसे आकर बोलेगी कि "तुमने कहा कि हम (शर्माइन) बड़ी कंजूस हैं, इतने घटिया कपड़ें या चीजें उपहार देते हैं कि तुम्हारा जी करता है कि मुहं पर हमारे ही फेंक दो .... ! हम लेने को चाहते है कि कोई हजारों की दे और खुद सौ की भी देने में माई मरती हैं हमारी ....! कैसे कहा ऐसा तुमने ....?"
हिदायत :) कोई शर्माइन मुहँ न फुलाना ....जो कोई शर्मा शर्माइन हो यहाँ :) सविता

नवंबर 15, 2016

जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई (आलेख)


दुनिया में न जाने कितने प्रकार के दर्द हैं। इनमें से जब एक भी प्रकार का दर्द खुद पर पड़ता है, तभी पता चलता कि दर्द में कितना दर्द होता है।
दर्द को भोगे बगैर कोई कैसे जान पाएगा दर्द की इन्साइक्लोपीडिया| उसको जानना हैं तो दर्द तो भोगना ही पड़ेगा| वैसे भी इस जहान में ऐसा कोई नहीं जिसे दर्द से रूबरू न होना पड़ा हो| इधर कोई जिस प्रकार के दर्द से रूबरू हुआ उधर उसको उस दर्द से पीड़ितों का दर्द समझ में आया| 'जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई' कहा ही गया है।
किसी हथियार, या फिर गिरने-पड़ने से तो चोट लगती रहती है| पर इन चोटों के घाव जल्दी भर जाते हैं। लेकिन बातों से जो घाव लगते हैं वे कभी नहीं भरते| हम सब यह सुनते ही रहते हैं कई बार।
बातों की चोट तभी लगती है जब हम मन से घायल होते है| जब हम मन से स्वस्थ होते तो यह बातें महज़ शब्दबाण की तरह दिखती हैं | जिसे हम स्वयं भी दूसरों पर बेफ़िक्री से छोड़ते रहते हैं| परन्तु जैसे ही ये बातें हमारे घायल मन पर पड़ती है तो ये सामान्य सी बातें भी व्यंग्य बाण बनकर सीधे हृदय के विच्छेदन की क्षमता रखती हैं| हमारे अंदर का कोई सूखा हुआ घाव भी हरा हो जाता है, ऐसे व्यंग्यात्मक बाणों से| तभी हमें "जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई" कहावत का अर्थ समझ में आता है|
ऐसा लगता है, कुछ तो ऐसा असामान्य नहीं कहा गया, परन्तु जब तक खुद को न लगे वह शब्द बाण, अपने सूखे जख्म, हृदय के किसी कोने में सुषुप्तावस्था से जागृत नहीं हो जाते, हम नहीं समझ पाते।
बातों की चोट पर एक बात याद आई जो कहावत से ही सम्बन्धित है| कहावत का मतलब तो सामान्य सा ही होता है, पर यदि वह कहावत किसी ऐसे व्यक्ति के सामने कही जाये जिसपर यह कहावत चरितार्थ होती हो, तो उन्हें अवश्य चोट लगतीं है|
वह कहावत है- 'बाँझ बियाय न बियाय देय'। अक्सर आप सभी ने भी सुना ही होगा इस कहावत को, अपने गाँव के अंचल में| कोई जब न खुद कोई काम करे न किसी को कुछ करने दे, ऐसी स्थिति में अक्सर यह कहावत कही जाती हैं गाँवों में। यह कहावत तब तक सामान्य सी लगती थी जब तक हम इसे ऐसो के सामने न कहें जहाँ कोई बाँझ स्त्री हो|
एक बाँझ(गर्भधारण में असक्षम) औरत के सामने इस कहावत को कहते ही आप खुद देखेंगे कि इस कहावत को सुनकर कोई भी बाँझ स्त्री बेइंतहा पीड़ा से भर सकती है। आपको उसकी पीड़ा उसके चेहरे पर उभरती हुई दिख जाएगी| फिर महसूस करिये उसकी पीड़ा!! यदि आप दिल से उस पीड़ा को महसूस करेंगे तो आपको लगेगा कि आप को जैसे किसी जलती अंगीठी पर बैठा दिया गया हो।

यदि दूसरों के दर्द को हम महसूस नहीं कर पाते हैं तो हममें संवेदना का आभाव कहा जा सकता है| किन्तु जिन्दगी के किसी भी मोड़ पर ऐसी कोई बात तो हर इंसान के साथ हो ही सकती है जो उसे दर्द पहुँचाती है| या हर इंसान की दु:खती रग होती है कोई न कोई बात। बस उस दुखती रग पर कभी हाथ रखिये, फिर देखिये। वह आहत होते ही कराहकर कह उठेगा कि जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई!!!

बड़ी बिडंबना है कि हम कोई भी बात तब तक बड़े सामान्य होकर बोल लेते हैं , जब तक उस बात से खुद न आहत होते हो। खुद के आहत होते ही हमें पता चलता है कि हम कितना गलत बोल गए..! फिर लाख माफ़ी मांगकर भी व्यंग बाण से हुए दिल के घाव नहीं भर सकते हैं..! भले ही कितनी भी कोशिश क्यों न करें।

कई कहावतें ऐसी हैं जिनका अर्थ बड़ा सीधा और सरल सा है| पर कहावत बड़े टेढ़े अंदाज में कही गयी है| जैसे कि 'भैंस के आगे बीन बजायें, भैंस खड़ी पगुराय', 'अंधे के आगे रोये, अपने दीदे खोये, 'या फिर '
कुत्ते भौंकते रहते हैं, हाथी चलती रहती अपनी राह' |
बड़े बड़े घाव किये है ऐसी ऐसी कहावतों ने| और ऐसी कहावतें यह कहने को भी मजबूर करती हैं कि जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई|
--सविता मिश्रा

नवंबर 10, 2016

सामयिक घटनाक्रम पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी-(नोट की चोट)

मोदी भैया यहाँ दो दिन सब की ढ़ोल बजाने के बाद टोक्यो में बड़ी ख़ुशी से ड्रम बजा रहे हैं | देख के लगा कि उन्हें इस तरह बड़ा मजा आ रहा है| और यहाँ विरोधी से लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले तक...अरे इस बात से याद आया कि कहाँ हैं हमारे अन्ना चाचा .. बहुत दिनों से दिखे नहीं ..? हम तो समाचार घंटो देखे |

देश में इतनी उथल-पुथल हो गयी| और वह बाल्मीकि की तरह बिलकुल शांत हैं| तपस्या रत हैं लगता है| जो शांत थे वह दुर्वाषा रूप में दिख रहें हैं | दो दिन में न जाने कितनी गृहणियां दुर्वाषा बनकर मोदी भाई पर अपने मुख से अग्निवाण बरसा चुकी हैं| एक जन विश्वामित्र बनने की कोशिश में थे दो दिनों से, लेकिन आज वह भी मुखर हुए| कह रहे थे कि उन्हें समझ ही नहीं आया कि 2000 के नोट चलाकर भ्रष्टाचार कैसे रोका जा सकता है|

सबकी राजनीतिक बहनजी कह रही हैं कि श्री मोदी जी अपने 100 साल के खर्चे के लिए पैसे विदेश में छुपा आए| हमें भी अफ़सोस है। मोदी भैया को ख्याल रखना चाहिए अपने भाई बन्धुओं का भी|

हम जनता का क्या है, किसी न किसी तरह तोड़-मोड़कर अपनी जुगाडू राह निकाल ही लेंगे| परन्तु चुनाव आ रहें| आप अपने खर्च का इंतजाम तथाकथित ही सही, कर लिए और सब अपने संगी-साथियों को मौका ही न दिए| इतनी बड़ी नाइंसाफ़ी कर कैसे सकते भई आप !

हम सोच रहें है और विनती भी कर रहें प्रभु से, सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं आप सभी के लिए भी कि वहीं टोक्यो में ही बजा लीजिए। अरे बाबा ड्रम, फालतू ही न सोच लिया करें आप सभी | अधूरी लाइन पढ़ना सोच के लिए घातक हो सकती है|

मतलब जितना मन करे, उतना ड्रम जोश से वहीं बजाइए। फिर आकर अपने देश में मत बजा डालियेगा सबकी| बड़ी मुश्किल से लोग तोड़ निकाल रहें हैं आपके सुर-संगीत की| भ्रष्टाचार से उबरने के आपके इस अभियान में कितनी बेतुकी राहें अपनाए हैं लोग, आप न जानेंगे| अपने ही करारे नोटों को घाटे में देकर तुड़े-मुड़े से सौ-पचास के नोट लेकर अपने लाकर में रखने का दर्द आप क्या जानें| समचार पढ़-सुनकर आप जान भी गए होंगे, पर समझेगें नहीं|

दो हजार के नोट के रूप में मंजिल तो आपने सबकी तय कर दी है एक महीने समय देकर| अब तो मंजिल पर पहुँचना मज़बूरी है सबकी| रास्ते में ही अटक भी गए यदि मंजिल समझ, तो वह रद्दी बन कर रह जाएगी ३० दिसम्बर तक | अतः सब भले ही संकरे, छोटे, कांटे भरे रास्ते चुनें लेकिन मिलेंगे आपकी बनाई मंजिल पर ही| उसके लिए अपनी ब्लैक में से व्हाईट के लिए जरा कुर्बानी भी देंगे ही|

आपने स्वच्छ भारत का सपना नोटों के लिए भी साकार कर ही दिया हैं | यकीन करिए, जनता हर हाल में चाहती है कि यह स्वछता कायम रहें | जनता से अलग हटकर जैसे ही आदमी कुरता पायजामा पहनकर नेता बन जाता है, वह स्वछता भूलकर ब्लैक होने लग जाता है| उसके काले होते ही उसकी परछाई जिस जिस पर पड़ती है वह भी उन्ही के रंग में रंगता जाता है| जबकि सब देशवासियों का दिल कहता है कि रे नेता, न कर, न कर, गंदा तन-मन-धन! पर दिमाग़ है कि इस भ्रष्टाचार के खेल में रंगता हुआ देश की धरती को अस्वच्छ कर देता है | #सविता

अक्टूबर 31, 2016

धनतेरस की हार्दिक बधाई

धन, धन की ओर झुकने को बेताब हैं | सही बात है कि जहाँ लक्ष्मी होतीं हैं पहले से लक्ष्मीजी भी वहीं जाने को बेताब रहती हैं| कुटियाँ वाले को मिठाई कौन भेंट करने पहुँच रहा|
उपहारों में बड़े बड़े गिफ्ट देने निकले लोगो को शायद यह नहीं पता कि जो गिफ्ट उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से खरीदकर दुसरों पर लुटाने जा रहे हैं उनकी कीमत वह समझता ही नहीं है | या पता है पर वह इसे नकारते हुए उपहार भेंट कर रहा उसे, जिसको इसकी जरूरत ही नहीं |
घर के किसी कोने में पड़ा रहता हैं वह उपहार उपेक्षित होकर | या फिर उपहार स्वरूप ही किसी और के घर की शोभा बन जाता हैं जाकर |....इससे अच्छा गरीबों को दे वह खुश भी और लाखों दुआए भी|
 पर हाय रे इंसान तू कभी ना सुधरा ......| अब क्या सुधरेगा ....| धन की बर्बादी और व्यापारियों की आबादी पर दुखी आत्मा ..| सविता

आप सभी को धनतेरस की हार्दिक बधाई|  कल किसी पर तो धन वर्षा होगी ही ..:)

कलयुगी भगवान् भी ना जाने कैसे कैसो पर मेहरबान हैं आजकल :) :)

अक्टूबर 21, 2016

~~मन को जो भाये वो करिए~~मन की बात या फिर कहें गुबार :)


जो मन भाये वो करिए, बस मर्यादा में रहिये|
तोड़ने की जिद न हो, हों सकें तो जोड़ते रहिये|

कोई भी व्रत-उपवास अच्छा ख़राब नहीं होता है| न हमारी रीतियाँ- परम्पराएँ अच्छी -ख़राब है!! हाँ इसे न मानने वाले खराब और मानने वाले अच्छा कहते रहतें हैं गाहे-बगाहे|
फेसबुक पर हुई व्रतों की निंदा- और गुणगान साबित करते है कि सब तरह की सोच वाले हर कहीं पर हैं | घर हो, समाज हो, चाहे यह मायावी दुनिया|
करवाचौथ और तीज दोनों ही व्रत अपने आप में महत्वपूर्ण है| तीज जहाँ बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश में ज्यादा मान्य है वही करवाचौध टीवी के कारण पुरे भारतवर्ष में प्रचलित हैं| तीज जैसा महत्वपूर्ण व्रत पश्चिम की तरफ किसी को पता ही न शायद|
कितने सारे व्रत बच्चों और पति के सुख,समृद्धि, आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य के लिए रखे जाते हैं| कई व्रत प्रचार-प्रसार के अभाव में न जाने किस घुप्प कुँए में जा फंसे हैं|
अतः ऐसा लगता है कि महिमामंडन पर सब निर्भर| जिन्दगी से जुड़ी चीजें हो या समाज से जुड़ी, प्रचार मायने तो रखता हैं!! जिसके बारे में कोई बतायेगा नहीं , जागरूक नहीं करेंगा, कोई नहीं जान पाएंगा | बुराई- हो या गुणगान दोनों ही प्रचार का हिस्सा बनते है, न कि किसी रीति-कुरूति पर रोक लगाते है| नास्तिक टाइप के लोगों को भी किसी के विश्वास पर कुठाराघात कभी नहीं करना चाहिए| क्योंकि जिसका विश्वास जिस किसी में है, वह करने में बुराई है ही न| चाहे वह तथाकथित पाखंड ही क्यों न हो|
व्रत तो हमारे जीवन में रंग भरते| व्रत रहे न रहे कोई परन्तु आडम्बर का नाम न दे इसे ...| बहुत दुःख होता है, यह सुन -देखकर..| यह बात सही हैं कि सारे व्रत पहले भी रखे जाते रहें हैं, आज बस इनका महिमामंडन हो गया है| अच्छा है न आजकल की नयी पीढ़ी सहर्ष स्वविकार कर रहीं हैं| कितना भी हम कहें कि नयी पीढ़ी परम्पराओं से दूर भाग रही, परन्तु न जाने क्यों ऐसा लगता नहीं है| मंदिरों में भीड़, बजारवाद के कारण ही सही बाजारों में त्यौहार -व्रत के दिन भीड़ साबित करती है कि नयी पढ़ी और ज्यादा अधीरता से हमारी पुरानी परम्परा की नींव को मजबूत कर रहीं हैं|
अभी बीते समय में यहाँ फेसबुक पर पितृपक्ष को लेकर जब जंग सी छिड़ी थी| माता-पिता का तिरस्कार करके, उनके मरने के बाद श्राध को आडम्बर कहके औचित्य पर सवाल उठाया रहा था| जरुरी थोड़े जो अपमान कर रहें थे, वह यह आडम्बर करते हैं | श्रद्धा से जो अपने माँ-बाप का श्राध कर रहा है, जाहिर है उसे बहुत बुरा लगता होगा ऐसा कुछ पढ़कर,सुनकर|
सवाल था कि जो आदमी जीते जी सुख शांति न दिया वह मरने पर क्या करेगा शन्ति के लिए| लेकिन शायद अपने माता-पिता का तिस्कार करने वाले लोग भी डर से करते कि कहीं माँ बाप भूत बन न आए...| सब दिखावा होता या डर या मन की सन्तुष्टि!! राम जाने!! पर यह उनकी अपनी इच्छा हैं| वैसे भी भय बिन प्रीत हुई कब है!! वह जिन्दा रहते हो या मरने के बाद, परोक्ष रूप से तो भय ही छुपा होता हैं न | चाहे समाज का भय या फिर मान्यताओं का|
हर धर्म के लोगों में श्रद्धा होती है अपनी-अपनी ढंग की | हिन्दू धर्म में भी वही श्रद्धा परम्परा चली आ रही है!! फिर हिन्दुओं में आपस में ही इतना विरोध क्यों? यह सच है कि कई लोग कई परम्पराओं, रीतियों ( कुरीतियों नहीं कहेंगे) को नहीं मानते, पर मानने वालों का विरोध भी नहीं करना चाहिए| हाँ तरीके से यानि मर्यादा विरुद्ध हो तो टिप्पड़ी जरुर करें परन्तु उनका विरोध हरगिस नहीं करियें !!
माना कई चीजें अन्धविश्वास है.हमारी नजर में , दूसरों की नजर में हो सकता है वह विश्वास हो| हम जिस चीज पर विश्वास कर रहे हो सकता है दुसरा हमें अन्धविश्वासी मान रहा हो| कुल मिला के अपनी राय रखना अलग बात है, परन्तु किसी के विश्वास को कटु शब्दों में अन्धविश्वास कह देना अलग बात|
मन की शांति के लिए उस अन्धविश्वास में यदि कोई विश्वास जमाये है, तो बुरा क्या हैं ..? उससे आपको कोई तकलीफ तो है न| मन के संतोष के लिए ही तो आदमी इतनी भागादौड़ी करता है| किसी को अपनी परम्पराएँ अपनी रीति को निभाने से संतोष मिल रहा, तो बुराई भी न| उनके संतोष में आपको बुराई भले नजर आयें पर यह उनके लिए शायद बड़े पुण्य का काम हो| अतः जब तक किसी भी परम्परा से किसी दुसरे को शारीरिक तकलीफ न हो, उसे करने से रोकने का हक किसी को भी नहीं है|
ऐसे तो पितृपक्ष पर सवाल उठाने वाले मरने के बाद क्रियाकर्म जो होता, फिर जो १३ दिन का पूरा कार्यक्रम होता है, उस पर भी सवाल उठा सकते हैं| सवाल उठाने के लिए तो हिन्दूधर्म क्या, सभी धर्मो में हजार मुद्दे है| यहाँ हमारी युवा पीढ़ी अवश्य भटक गयी है ! शायद उसका कारण है समय की कमी| वह हर काम फटाफट चाहती है, पर यह तेरही तक का शोक कार्यक्रम जल्दी तो नहीं ही निपट सकता| हां साल भर के झंझट से वह मुक्त होना चाहती है| फिर भी ठीक है, जितना श्रधा से हो जाये अच्छा है| यह उसकी भी श्रधा की बात हैं न|
सब चीजो पर सवाल उठाने सवाल वाले उठा सकते है..!! व्याह हो, मुंडन हो, जनेऊ हो, व्रत हो, पूजा हो सब में दिखावा भारी पड़ रहा| शादी व्याह में होने वाले पांच -छ फंक्शन!! ..सब आडम्बर ही तो है ..| किन्तु सबका प्रतिकार तो नहीं होना चाहिए न | आपके लिए आडम्बर परन्तु दुसरे के लिए वह पल ख़ुशी, सौहार्द के पल होते हैं|
पूजा पाठ ...के लिए 'रैदास तो कह गयें हैं कि मन चंगा तो कठौती में गंगा ..' लेकिन फिर भी सभी धर्म के धर्म स्थलों पर इतनी भीड़ क्यों होती फिर ..?? सब विश्वास और भावनाओं के कारण ही न|
ग़रीब तो सबसे बड़े आडम्बरी ही होते...| ऐसा स्वांग रचते जैसे बड़े बीमार और निहायत ही गरीब हैं, पर लाखों के मालिक होते कई, फिर भी भीख मांगते फिरते ...| ऐसे मुहँ बना के सामने हाथ पसार खड़े हो जाते कि आदमी अपनी हाड-पसीने की कमाई उन्हें मुफ्त में खिला दे..| कभी कभी लगता है क्यों खिलाये मुफ्त, इन हट्टे-कट्टो को ..| फिर भी आडम्बर है जहान में ..| परम्परा भी है गरीबों को भोज कराने की| कई शिद्दत से निभाते है इसे भी ..| इसी कारण शायद आजकल हर दूसरा आदमी एनजीओ खोल के व्यापार करने लग पड़ा है ....| दान देने वाले उन्हें दान देकर पुण्य कमा रहे हैं |
व्यक्ति और परिस्थिति के अनुसार आडम्बर, श्रद्धा और श्रद्धा आडम्बर कहलाता रहता| फ़िलहाल हमारी परम्पराएँ कुछ तो कहती ही है..राज गहरा है, विरोधी लोग क्या समझे, जब समर्थक भी सही से समझ न पाए अब तक| परम्पराओं को अन्धविश्वास, आडम्बर कहने की दौड़ में हम शायद मूल को भूल, शूल की राह तैयार कर रहे| मर्यादा में रह परम्पराएँ निभ रहीं हैं तो निभाने दीजिए न|
'जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तीन तैसी' ! लोग हर बात पर यह घिसापिटा राग अलापते हैं! आज हम अलाप रहें हैं, अपने इस लेख में| आपको जहाँ भी लगे हम गलत है इस कहावत को हम पर थोपते जाइए |

अक्टूबर 03, 2016

~~ मेरी कलम~~

मैं तो कुछ भी ना थी,
तूने ही तो हमें

कुछ बना दिया।
जो छुपे थे भाव
दिल की गहराइयों में,
तूने ही उन्हें
सार्थक शब्दों से बूना।

भावों को मेरे शब्द दिया,
मूक भावना को मेरे
उनका अर्थ दिया।
स्वयं भी थी मूक
पर कागज पर आते ही,
विद्रोही,पीड़ित बनी
एवं हमें भी तूने
कुछ यूँ ही बना दिया।
तूने मुझे ताकत दी हिम्मत दी,
करूँ कैसे धन्यवाद तेरा
ओ मेरी लेखनी!

कलम थी एक आम
तू भी मेरी तरह,
पर तूने ही हमें
आम से खास बना दिया
तू भी अब मेरे लिए
बहुत ही है खास |
क्योंकि तेरे ही तो
सहारे मैं अल्पज्ञ से,
सर्वज्ञ्य की ओर
बढ़ने की कोशिश में हूँ।

तू भी मेरा साथ देना
ओ मेरी कलम !
मेरी मूक भावना को
आवाज देना ओ मेरी कलम !
मैं तो कुछ भी ना थी,
तूने ही हमें सब कुछ बना दिया।

८/५/२०१२

~जरा चैन से जीने दो~


धरा पर नहीं जीने देते
हमें इन्सान!!
गिद्धों के हवाले है यहाँ सारा आसमान!
धरती पर शैतानो का है बोलबाला
तुम आसमान से आँख दिखाते हो!!
जायें तो जायें कहाँ ?
हमारे पूछने पर
नरक की राह हमें बताते हो!
तुम जब जी सकते हो
तब हमको क्यों नहीं जीने देते हो!
हमसे तुम हो ! तुमसे हम नहीं!
फिर भी जहर का घूंट क्यों पीने देते हो !!

हम नारि
याँ नहीं रहेंगी तो तुम कैसे आओगे
सोचो जरा, कुछ तुम भी विचार करो
ना यूँ दर्द दो हमें धरा और आसमान से
नहीं रह पाएँगी हम इस सृष्टि में
बिना प्यार के इस जहान में
जब तक जिओगे, सर दीवारों से फोड़ोगे
पछाताओगे बहुत, खून के आंसू बहाओगे !

न घर होगा, न होगा घाट कहीं भी
रहना होगा तुमको कहीं वीराने में !
अतः मान लो 'सविता' की बात तुम
खुद जियो चैन से और औरों को भी
जरा चैन से तुम जीने दो
अत्याचार कर नारियों को
यूँ तुम कभी मजबूर मत करो!

वरना होगा बांस और
न बजेगी कभी बांसुरी !
एक-एक कर नारियाँ तुमको ही
जन्म नहीं लेने देंगी कभी भी
फिर हाथ मलते रह जाओंगे
भूले से भी नारियों का संसार न पाओगे!!
सुना ही होगा बुजुर्गो से कभी
नारियाँ जब बदला लेने की ठानती हैं
फिर वह आगा-पीछा नहीं निहारती हैं |...सविता मिश्रा

तोल मोल के बोल

तोल मोल के बोल
शब्द हैं बड़े अनमोल
दुखे दिल किसी का
मुख से ऐसा कुछ न बोल |

वाणी में अपने अमृत घोल
कड़वा तू कभी न बोल |

शब्द ऐसे न बोल कभी
जो घाव कर जाए
अन्दर ही अन्दर दिल में
जो नासूर कर जाए |

निकाले न मुख से वह शब्द जिससे
किसी के भी मन में मलाल आए
शब्द बाण से वह विचलित हो जाए
और उसके नयन छलछला
 जाए |

शब्द नेक बढाएं मान सदा
कुटिल शब्द अपमान करा जाए |

तीर तलवार के घाव भर जाते हैं
शब्दों के घाव नासूर बन जाते हैं
सोच-समझ के ही तू बोल जरा
कम बोलने वाले ही सबको भाते हैं |

उटपटांग बोल
समय-समय पर
दिल को उद्धेलित करते है
घृणा-ईर्ष्या, बदले की आग को
सदा प्रज्जवलित करते हैं |

शब्द कहो नहीं ऐसे, जिससे
किसी को तुमसे घृणा हो जावे
कानों में पड़ते ही शब्द तुम्हारे
उसका ह्रदय तार-तार हो जावे |


बोलो ऐसे शब्द जो कर्ण प्रिय हो
हृदय भी शब्द-सार से प्रफुल्लित हो |

तोल मोल के बोल
शब्द बड़े हैं अनमोल
प्यार के मीठे दो बोल से
दिल के दरवाजे तू खोल
जरा तोल मोल के बोल...||

.~हम बच्चे हैं~


हम बच्चे है, इतिहास पढ़ने में कच्चे है|
पर सदा ही अपनी बात के पक्के है|
इतिहास हैं कि बढ़ता ही जाता है
रोकेंगे हम इसे बढ़ने से
कभी वीर लड़े थे स्वंत्रता को
हम बच्चे इतिहास से लड़ेंगे|

लड़ेंगे भी लेकिन कैसे
लड़ने से इतिहास बढेगा
हमारी लड़ाई भी उसमें
लिख दी जाएगी विस्तार से
रोकेंगे हम फिर कैसे और
बचेंगे इसके हम बोझिल विस्तार से |

यह बढ़ता ही जा रहा
एक परिवार की तरह
हम न लड़ेंगे और
न ही लड़ने देंगे किसी को|

बस इसी तरह रोकेंगे
बढ़ने से इतिहास को|
देंगे अगली पीढ़ी को हम
इतिहास की पुस्तकें पतली|
हम बच्चे हैं इतिहास पढ़ने में कच्चे है|
पर सदा ही अपनी बात के पक्के है| सविता मिश्रा

~छन्नपकैया~


छन्नपकैया छन्नपकैया देखो तो तितली आई
भैया तुम दौड़ो, पकड़ो न उसे वह डर जाई|

छन्नपकैया छन्नपकैया देखो सुनो बंदर तुम भाई
हमसे क्या दुश्मनी, हमसे छीनकर क्यों रोटी खाई|

छन्नपकैया छन्नपकैया क्यों करते चूहें तुम धमाचौकड़ी
बिल्ली मौसी पालूँगा, फिर भूल जाओगे तुम यह हेकड़ी|

छन्नपकैया छन्नपकैया छछूंदर जीजी क्यों इधर आई
मैं डरता हूँ तुमसे, मेरी माँ कितना तुमको समझाई|

छन्नपकैया छन्नपकैया भैया कुत्ते तुम जल्दी घर आना
दिनभर खेलना मुझसे नहीं तुम तनिक भी सुस्ताना |

छन्नपकैया छन्नपकैया रानी मछली जल की
मुझे छोड़ अकेला, तुम अकड़ कहाँ चल दी |

छन्नपकैया छन्नपकैया शेरो की हो तुम मौसी बिल्ली
डरता  देख मुझे तुम उड़ाती हो हमेशा मेरी खिल्ली |

छन्नपकैया छन्नपकैया मेरे प्यारे मिट्ठू तोता भाई
तुम्हारें फायदें सुनकर ही मम्मी तुम्हें घर ले आई |

छन्नपकैया छन्नपकैया खूब दो जानवरों और panक्षी को प्यार
मम्मी पापा कहते मेरे , बदले में तुम्हें भी मिलेगा स्नेह अपार| सविता मिश्रा

अक्टूबर 01, 2016

~नियम कानून में फंसा साहित्य ~कुछ मन की



तकनीकि के जाल में फँसता साहित्य उचित है भी और नहीं भी | उचित उनके लिए जो लिखने की इस तकनीकि को जानते समझते है | अनुचित हम जैसे फक्कड़ो के लिए | हर चीज लिखने का एक नियम होता है| सत्य बात है यह और उसी नियम के कसौटी पर कसा हुआ साहित्य को ही साहित्यकार साहित्य कहते है, और मानते भी है | बाकी को कूड़ा कह वो एक सिरे से नकार देते हैं |

पर हमारा मानना है कि जो दिल से लिखा जाय और दिल तक पहुँच जाय वह सच्चा साहित्य है | भले उसमें तकनीकि खामियाँ क्यों न हो | इससे फर्क नहीं पड़ता है | पर मठाधीश साहित्यकारों को कौन समझाए भला |

दिल से लिखी कविता जब दिल तक पहुँचती है तो उसका शोर फेसबुक पर भी साफ़ साफ़ दीखता है | लोग पसंदगी के साथ शेयर भी करते है | हमें कोई यह बता दें कि क्या किसी साहित्यकार की कविता सामान्यजन ने इतनी ज्यादा पढ़ी और शेयर की है | नहीं बिलकुल नहीं क्योंकि वह कविता शब्दों के खेल में दिमाग का इस्तेमाल कर तैयार की गयी है और सामान्यजन दिमागी खेल नहीं खेलता| वह दिल को भाने वाली कविता , कहानी और कथा पढ़ता और सुनता है |

दिल के खेल में दिमाग कभी ठहरा है क्या भला ! दिल से लिखिए दिल तक पहुँचिये | दिमाग से तो बस दिमाग वालों तक ही पहुँच पाएंगे आप | दिमाग वाले उसमें भी दिमाग लगा आपका छंद विच्छेदन कर देंगे |

माना नियमों को तोड़ना अच्छी बता नहीं है | पर नियम यदि गला घोंटने पर आमादा हों जाये तो तोड़ ही देना चाहिए | आज के साहित्यकार अपनी बात कहने के लिए दिनकर जी की बात करते है पर वह निराला जी को कैसे भूल जाते है भला |

निराला जी ने साहित्य को छंद से मुक्त कर दिया था | विरोध उनका भी खूब हुआ था | लेकिन वह प्रतिष्ठित साहित्यकार है और सदियों तक रहेंगे | यानि आज जो छन्दमुक्त लिख रहें हैं वह कोई नई विधा नहीं लिख रहें बल्कि अपने पूर्वजों की दिखाई राह पर ही चल रहें हैं |

यानि छन्दमुक्त एक ऐसी विधा भी है साहित्य की जिसमें ज्यादातर लोग अपने भाव व्यक्त करते है | भले ही इस विधा को आज के साहित्यकार लोग मानने से इंकार कर दें | आज छन्दमुक्त लिखने वालों की संख्या अधिक हुई है क्योंकि इसे लिखने में भाव की जरूरत होती है और हमारे ख्याल से भाव सभी के पास है | खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदल लेता है, बिलकुल ऐसा ही देखने को मिल रहा है | फेसबुक पर देखा-देखी कई लोग साहित्य की दुनिया में विचरण करने लगे है बेखौफ होकर | बस उस भाव को एक लय में बांधना आना चाहिए | यदि लय- तालसब सही है और लोगों के दिल में जगह बना पाने में सक्षम है आपके शब्द, तो बिलकुल वह कविता ही है | अपना मानना तो यहीं हैं |

राह में कोई फूल बिछाता है कोई काँटा | हमें चाहिए कि काँटों को फूल समझ अपनी राह चलते चले | उचित और अनुचित का प्रश्न ही नहीं उठता है | जो बात छन्दमुक्त लिखने वाले के लिए उचित है वही बात छंदबद्ध लिखने वालों के लिए अनुचित हो सकती है |


जैसा की लोग गुटबाजी कर शोर कर रहें है कि कूड़ा लिखा जा रहा आजकल | तो भैये कूड़ा यदि लिख भी रहें लोग (स्त्रियाँ जैसा कि कुछ बददिमाग साहित्य के रखवाले कह रहें आजकल ), छप रहें है तो न पढ़े कोई उन्हें | हमें तो लगता हमारा छन्दमुक्त नामक कूड़ा ही रिसाइकिल कर कविगण छंदबद्ध कर लेते है | कोई शक आप सबको ! नहीं न ! हमें भी नहीं है कोई शक| क्योंकि इन तकनीकि के ज्ञाताओं को हमने उसे छन्दबद्ध कर शान से पोस्ट करतें देखा है |
फिर छंदमुक्त भी कूड़ा नहीं होता | जो ऐसा कहते है वह निराला जी को श्रद्धा से याद कर लें जरा |
इन दंभ भरने वाले साहित्यकारों के आगे यदि दिनकर जी की भी पंक्तियाँ हम जैसे लोग रख दें तो वह उनमें भी कई कमियाँ निकाल देंगे | अतः अपना मानना है मस्त हों लिखना चाहिए| जितना जैसा समझ आए | निरंतर सीखिए, सीखने की राह में किसी को बाधक न बनाइए |

बिन भाव के नियमों में बंध साहित्य भले लिख लिया जाता हों | पर दिल छूने वाला साहित्य कभी नहीं कोई लिख सकता | यानि भाव बिन नहीं लिखा जा सकता है लेकिन साहित्यिक नियमों के बिन लिखा जा सकता है |
यानि आप खुद समझ सकते कि क्या ज्यादा जरुरी है |

बस तारतम्य अव्यवस्थित नहीं होना चाहिए किसी भी तरह के लेखन में | यह भी न हो कि आप कहें अपने लिखे हुए को गज़ल या दोहा परन्तु वह उनके नियमों से परे हो | मुक्त हो लिख रहें है तो मुक्त ही कहिये फिर उसे|

अपने लेखन में गुणवत्ता का ध्यान हर व्यक्ति अपने हिसाब से रखता ही है | कभी वह लिखने के लिए लिखता है और कभी भावों को शब्द देने के लिए| जरुरी न कि सभी लिखने वाले साहित्यक दौड़ में शामिल ही है| फिर इतना हाय तौबा क्यों ?

भरसक प्रयास करियें नियम में बन्ध लिख सकें और उसे साहित्यधारा में दृढ़ता पूर्वक जोड़ सकें | पर साहित्यकारों से गुजारिस यह जरुर है कि छन्दमुक्त को अनुचित कह अपमान न करें  किसी छन्दमुक्त लिखने वाले का |

यह तो रही मात्राओं की गिनती वाले साहित्य की बात | अब आते है गद्य साहित्य पर |
गद्य साहित्य पर भी तमाम बंदिशे लगा रखी हैं साहित्यकारों ने | हम जैसे लोग तोड़े तो अपराधी जैसा बर्ताव परन्तु यही कोई प्रतिष्ठित साहित्यकार नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर लिखता है तो एक नया नियम बन जाता है |

कथ्य, कथानक,शैली नामक बला भूत सा पीछे पीछे लगा रहता है | कभी कभी लगता कि सिर पर कोई नियम का भार रखा हों तो कोई साहित्य रचना कैसे हो सकती है | रचना तो तब होती है जब हम मन से जुड़े हो लेखन में | कलम पर हमारे कोई भार न हो न ही दिमाग पर | हैं की नहीं !! लेकिन नियम विरुद्ध होते ही आलोचना होने लगती है|


हमारा तो मन करता है कि काव्य की मुई काव्यकता और नियमों को मुआ ही डाले | और लघुकथा के कालखंड को खंड खंड कर डाले | कहानियों में अपने भाव का उन्माद भर डाले |

आलोचना की परवाह नहीं तो दिल को खुली छुट दे दीजिये और परवाह है तो दिमाग को सतर्क करिए |
उदण्ड बनने की सलाह हरगिस नहीं दे रहें हम पर साहित्य रचनाओं को तकनीकि के जाल में न उलझाइये | उचित अनुचित के डर से बाहर निकल अपने भावों को तारतम्यता में ढ़ाल व्यक्त करते रहिये | ..सविता मिश्रा

सितंबर 30, 2016

~तकनीकि के जाल में फँसता साहित्य~



साहित्य तकनीकि के जाल में फंस रहा है, इससे हम बिलकुल भी सहमत नहीं है | बल्कि तकनिकी माध्यम से तरह तरह के फूलों वाले बगीचें में गुंथा हुआ है साहित्य |
जिस तरह का साहित्य आपको चाहिए , एक क्लिक करते ही उपलब्ध हो जाता है|

आप जितना चाहे, जैसा चाहे, उस तरह का साहित्य पढ़ सकते है | तकनीकीकरण ने तो साहित्य को और भी सुलभ बना दिया हमारे लिए | कहाँ साहित्य के कद्रदान ही साहित्य के बारे में जानते थे परन्तु अब ऐसा नहीं है | हर कोई जानता है अब साहित्य के विषय में | बल्कि हम यह कहें कि अंजान व्यक्ति को भी साहित्य को पढ़ने और लिखने का भी माध्यम मिल रहा है तो अतिश्योक्ति न होगी |

कक्षा में जो विषयांतर पढ़ाया जाता था हम उन्हीं साहित्यकारों को बस जानते थे | जानते क्या मज़बूरी में रट लिया करते थे | यदि तकनीकी से दूर रहने वालों से उन साहित्यकारों की तस्वीरें दिखा, आप पूछिये कौन है ये ? तो हमें पूरी उम्मीद है दस में से शायद ही एक बता पायेगा |

लेकिन जो तकनीकी से कदम से कदम मिला चल रहे है उन्हें ज्यादातर साहित्यकारों के बारे में तकनीकि ने ही जानकारियाँ उपलब्ध कराई है | साहित्य तकनीकि में फंस नहीं रहा बल्कि तकनीकि ने तो साहित्य के लिए पतवार का काम किया है | और शायद नैया पार भी लगा ही रहा है धीरे-धीरे |


हिन्दी साहित्य तो जैसे डूबने के कगार पर था | अंग्रेजी साहित्य की स्थिति तो ठीकठाक है | आधी आबादी तो इससे बहुत दूर हो गई थी| परन्तु अब देखिये यही आधी आबादी घर-गृहस्थी को सम्भालते हुए लेखन में भी जोर आजमाइश कर रही है | यहाँ तक की कई नौकरी पेशा माहिलायें भी घर की जिम्मेदारी के साथ साथ लेखन की ज़िम्मेदारी बखूबी निभा रही है |


तकनीकि न होती तो कहाँ ऐसे समय निकलता कि हम एक दूजे से सीख सकतें | एक के पास समय होता तो दुसरे के पास नहीं | पर तकनीकि ने लाखों- हजारों को एक दूजे से जोड़कर रखा हुआ है | जिससे एक दुसरे को सिखने-सिखाने और पढ़ने-का क्रम भी बदस्तूर जारी है |

तकनीकि के जाल में तो फँसता हुआ हमें कहीं भी नहीं दिख रहा साहित्य | बल्कि उबर रहा है | सब के जरिये सब तक पहुँच रहा है | बड़े बड़े लेखकों को पढ़ने का मौका दे रहा है |

हम यह बेखटक कह सकते है कि तकनीकि के जाल में साहित्य नहीं बल्कि साहित्य के जाल में हम सब फँसते चले जा रहें है |

निराला, दिनकर, अज्ञेय, राहुल सांकृत्यायन, रामचंद्र शुक्ल, नागार्जुन, महादेवी, रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्राकुमारी चौहान आदि इत्यादि बड़े बड़े साहित्यकार जो सिर्फ विषय के अंतर्गत पढ़े गए थें, उनके सिवा हमें किसी के बारे में कोई जानकारी नहीं थीं | तकनीकि ने तो बहुत सारे साहित्यकारों से हमारा परिचित ही नहीं कराया बल्कि सरलता से उनका लिखा हुआ हमें उपलब्ध भी कराया |


अभिव्यक्ति, अनुभूति, हिन्दी कोष, हिन्दी साहित्य नामक अनेकानेक ऐसे साइट है जिन पर साहित्यदर्शन का लाभ ये नेत्र उठा सकते हैं | और पढ़ कर रोमांचित भी हो सकते है | साहित्य से जुड़े लोगों की फेसबुक वाल और कई ग्रुप भी हमारी साहित्य की तुष्टि करते ही है| हमें उम्मीद है आप तकनीकि माध्यम से साहित्य के जाल में फँस मकड़ी की तरह सुकून पाएंगें |

जिनकी रूचि जैसी हो वह वैसा साहित्य खोजे और पढ़े | यहाँ तक की गृहणियों के लिए भी पकवान से लेकर कढ़ाई -बुनाई तथा बागवानी से लेकर गृह सज्जा का भी साहित्य तकनीकि उपलब्ध करा रहा है| तकनीकि के जाल में प्रवेश कर अभिभूति हुए बिना नहीं रह पाएंगे |
अतः यह कहना सर्वथा अनुचित है कि तकनीकि के जाल में साहित्य फँसता जा रहा | तकनीकि तो अंधकार के जाल में फंसे हुए साहित्य को उबार रहा है | प्रकाशमान कर रहा हैं|..सविता मिश्रा