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सितंबर 30, 2016

~तकनीकि के जाल में फँसता साहित्य~



साहित्य तकनीकि के जाल में फंस रहा है, इससे हम बिलकुल भी सहमत नहीं है | बल्कि तकनिकी माध्यम से तरह तरह के फूलों वाले बगीचें में गुंथा हुआ है साहित्य |
जिस तरह का साहित्य आपको चाहिए , एक क्लिक करते ही उपलब्ध हो जाता है|

आप जितना चाहे, जैसा चाहे, उस तरह का साहित्य पढ़ सकते है | तकनीकीकरण ने तो साहित्य को और भी सुलभ बना दिया हमारे लिए | कहाँ साहित्य के कद्रदान ही साहित्य के बारे में जानते थे परन्तु अब ऐसा नहीं है | हर कोई जानता है अब साहित्य के विषय में | बल्कि हम यह कहें कि अंजान व्यक्ति को भी साहित्य को पढ़ने और लिखने का भी माध्यम मिल रहा है तो अतिश्योक्ति न होगी |

कक्षा में जो विषयांतर पढ़ाया जाता था हम उन्हीं साहित्यकारों को बस जानते थे | जानते क्या मज़बूरी में रट लिया करते थे | यदि तकनीकी से दूर रहने वालों से उन साहित्यकारों की तस्वीरें दिखा, आप पूछिये कौन है ये ? तो हमें पूरी उम्मीद है दस में से शायद ही एक बता पायेगा |

लेकिन जो तकनीकी से कदम से कदम मिला चल रहे है उन्हें ज्यादातर साहित्यकारों के बारे में तकनीकि ने ही जानकारियाँ उपलब्ध कराई है | साहित्य तकनीकि में फंस नहीं रहा बल्कि तकनीकि ने तो साहित्य के लिए पतवार का काम किया है | और शायद नैया पार भी लगा ही रहा है धीरे-धीरे |


हिन्दी साहित्य तो जैसे डूबने के कगार पर था | अंग्रेजी साहित्य की स्थिति तो ठीकठाक है | आधी आबादी तो इससे बहुत दूर हो गई थी| परन्तु अब देखिये यही आधी आबादी घर-गृहस्थी को सम्भालते हुए लेखन में भी जोर आजमाइश कर रही है | यहाँ तक की कई नौकरी पेशा माहिलायें भी घर की जिम्मेदारी के साथ साथ लेखन की ज़िम्मेदारी बखूबी निभा रही है |


तकनीकि न होती तो कहाँ ऐसे समय निकलता कि हम एक दूजे से सीख सकतें | एक के पास समय होता तो दुसरे के पास नहीं | पर तकनीकि ने लाखों- हजारों को एक दूजे से जोड़कर रखा हुआ है | जिससे एक दुसरे को सिखने-सिखाने और पढ़ने-का क्रम भी बदस्तूर जारी है |

तकनीकि के जाल में तो फँसता हुआ हमें कहीं भी नहीं दिख रहा साहित्य | बल्कि उबर रहा है | सब के जरिये सब तक पहुँच रहा है | बड़े बड़े लेखकों को पढ़ने का मौका दे रहा है |

हम यह बेखटक कह सकते है कि तकनीकि के जाल में साहित्य नहीं बल्कि साहित्य के जाल में हम सब फँसते चले जा रहें है |

निराला, दिनकर, अज्ञेय, राहुल सांकृत्यायन, रामचंद्र शुक्ल, नागार्जुन, महादेवी, रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्राकुमारी चौहान आदि इत्यादि बड़े बड़े साहित्यकार जो सिर्फ विषय के अंतर्गत पढ़े गए थें, उनके सिवा हमें किसी के बारे में कोई जानकारी नहीं थीं | तकनीकि ने तो बहुत सारे साहित्यकारों से हमारा परिचित ही नहीं कराया बल्कि सरलता से उनका लिखा हुआ हमें उपलब्ध भी कराया |


अभिव्यक्ति, अनुभूति, हिन्दी कोष, हिन्दी साहित्य नामक अनेकानेक ऐसे साइट है जिन पर साहित्यदर्शन का लाभ ये नेत्र उठा सकते हैं | और पढ़ कर रोमांचित भी हो सकते है | साहित्य से जुड़े लोगों की फेसबुक वाल और कई ग्रुप भी हमारी साहित्य की तुष्टि करते ही है| हमें उम्मीद है आप तकनीकि माध्यम से साहित्य के जाल में फँस मकड़ी की तरह सुकून पाएंगें |

जिनकी रूचि जैसी हो वह वैसा साहित्य खोजे और पढ़े | यहाँ तक की गृहणियों के लिए भी पकवान से लेकर कढ़ाई -बुनाई तथा बागवानी से लेकर गृह सज्जा का भी साहित्य तकनीकि उपलब्ध करा रहा है| तकनीकि के जाल में प्रवेश कर अभिभूति हुए बिना नहीं रह पाएंगे |
अतः यह कहना सर्वथा अनुचित है कि तकनीकि के जाल में साहित्य फँसता जा रहा | तकनीकि तो अंधकार के जाल में फंसे हुए साहित्य को उबार रहा है | प्रकाशमान कर रहा हैं|..सविता मिश्रा

सितंबर 29, 2016

कुछ मन की ...:) सर्जिकल आपरेशन पर


कल फेसबुक पर ध्रुव भैया की पोस्ट पढ़े थे कि आज विश्व ह्रदय दिवस हैं |
और आज यदि यह विश्व ह्रदय दिवस है |तो ह्रदय बीमारी से ग्रस्त और पस्त तथा स्वस्थ लोग सभी खुश हो जाइए ...अब तक इस दिल पर साँप लोट रहा था | पर आज उस कष्ट से जरा सी मुक्ति मिली पूरी मुक्ति की उम्मीद है |
क्योकि दिल के बीमार जब डाक्टर के पास जाते है तो पूरी तरह से उस बीमारी से मुक्ति चाहते है | वैसे ऐसे ही सर्जिकल आपरेशन चलता रहा तो पूर्ण मुक्ति की सम्भावना बढ़ जाती है | देखिये न नाम भी कितना मैच करता डाक्टरों के कार्य से | बिलकुल सटीक बैठ रहा दिल दिवस पर दिल का सही इलाज यह | अपने भारतीयों का दिल खूब सुकून पाया और पाने की आशा भी जगी |
भारतीय सैनिकों के कटे सिर आज भी आँखों के सामने डोल जाते है | उनकी शहीद होने पर परिवार की पीड़ा असहनीय हो जाती है | दिल मसोस कर रह जाता इंसान क्योकि करने को क्या कर सकता | बोल सकता दुखी हो सकता बस |
आज दिल खुश और आप भी अपना विश्व ह्रदय दिवस पर दिल खुश करिए ..बीमारियों से दूर रहेंगे | फालतू में हर सही कार्यवाही का विरोध कर दिल को तकलीफ में डाल क्यों दुखी करना | दिली बीमारी से बचने का सटीक उपाय | जो कष्ट पहुँचायें उसका सफाया |
आज जिनके हृदय पर अब तक साँप लोट रहें थे वह मुक्ति पाए पर बहुतों के दिल पर लोटने लगे होंगे आज |
एक काम से एक को ख़ुशी तो दुसरे को दुःख यह तो रिवाज ही है| कोई न आप सब भी अपना अपना दिली इलाज खोज ही लीजिए | ...जय हिन्द जय भारत

सितंबर 10, 2016

~~आँसू बहा रही हूँ~~

जख्म जो हरे हैं
उन पर मिट्टी डाल रही हूँ
पुराने जख्मों को याद कर
आँसू बहा रही हूँ |
नये जख्म अभी अभी हुए हैं
अतः दर्द थोड़ा कम है
जब थोड़ा समय की परत पड़ेगी
कोई ऐसी घटना घटेगी
तब यही जख्म पुनः याद आयेंगे
तब हम इसी जख्म पर
फिर से आँसू बहायेंगे |
अभी जो आँसू निकल रहे हैं
वह महज आँखों से बह रहे हैं
कुछ समय पश्चात् इसी जख्म पर
दिल से अश्रु निकलेंगे
उनमें वेदना, बेचैनी, अकुलाहट होगी
फिर तो बरबस ही अश्रु छलक जायेंगे |
अभी तो बस लोगो की सहानुभूति का असर है
जो दिल नहीं मेरी आँखों से बह रहा है | ..........सविता मिश्रा

सितंबर 09, 2016

~आत्मा जाग रही बस इंसानियत सो रही ~ (कुछ मन की)


फेसबुक पर घूमते-घूमते खूब हो हल्ला सुने तस्वीरें भी देखी दाना मांझी की | पर न जाने क्यों अपनी सम्वेदना न जगी| शायद हम संवेदनहीन हो गए है, या लोगों की सम्वेदनशीलता पर सवाल खड़ा करना चाहते है | दैनिक जागरण में एक लेख भी पढ़े | परन्तु सोयी रही अपनी सम्वेदनशीलता कहीं कोने में| क्या करें! हर रोज कुछ न कुछ ऐसा देखने की आदत पड़ गयी है |

आज न जाने कैसे किसकी वाल पर एक वीडियो भी दिखी दाना मांझी की | वीडियो देख कई सवाल उठे मन में| सब प्रायोजित सा लगा| आप भी ध्यान से वीडियो देखेंगे तो पाएंगे कि जैसे कहा गया हो, 'हाँ ओके टेक टू वीडियो!' वो जैसे फिल्म बनाने वाले करते हैं | और मांझी ने उठा ली हो फिर से अपनी बीबी की लाश अपने कन्धो पे | क्या fb पर लाइक कमेन्ट के हम इतने ज्यादा भूखे हो गए कि हमें इंसानियत की रत्ती भर भी भूख न रहीं |

मिडिया जैसे किसी घटना को सिर्फ टीआरपी के चक्कर में बढ़ा चढ़ा दिखाता है? वैसे ही हम भी लाइक के चक्कर में घिर गए है ? क्या मार्क जुकरबर्ग ने हमारी सम्वेदनशीलता को छीन लिया है ? या यहाँ भी हम एक दूजे से ज्यादा सम्वेदनशील होने के चक्कर में माझी के चित्र को लेने वाले को मशहुर कर दिए है ? क्या ऐसे माझियों की कमी है अपने देश में ? इस खबर के दुसरे-तीसरे दिन ही क्या एक और दर्दनाक चीख न सुनी किसी ने ? एक लाश की खबर, जिसके कमर से शरीर के दो टुकड़े कर दिए गए ! सवाल कई उठते हैं ! कई चीजों को देखकर पर जबाब में शून्य ही हाथ लगता अपने |

गिद्ध को बालक पर झपटते हुए जिसने तस्वीरें ली थी उनकी आत्मा ने तो उन्हें धित्कार दिया था | उन्होंने आत्महत्या कर ली थी | हम यह बिलकुल नहीं कह रहे कि यह चित्र और वीडियो लेने वाले केविन कार्टर बने | लेकिन इतनी गुजारिज जरुर है कि कैमरे का दुरूपयोग यदि करें भी तो इंसानियत का भी ख्याल रखे | हो सकता है उन्होंने यह वीडियो बनाने के बाद इंसानियत दिखाई भी हो! पर समाचारों से तो ऐसा प्रतीत होता हुआ न दिखा | क्योकि समाचार तो यही कहता कि माझी किसी प्राइवेट गाड़ी से अपने गाँव नहीं गए | बल्कि सरकारी एम्बुलेंस 10 किलोमीटर बाद मुहैया कराई गयी | काश यह पहले ही कर देते तो इतनी छीछालेदर न होती | लेकिन इसकी भी एक सच्चाई है , शायद वह किसी को न दिखी! कभी भी सरकारी एम्बुलेंस लाश ढ़ोने के लिए प्रयोग नहीं की जाती| उसके लिए एक अलग गाड़ी होती है जिसे शववाहन कहते|

फेसबुक पर भी कईयों की सम्वेदनाएँ उफ़ान मार रहीं है | क्या हम जिन्दा लाशों को जब सड़क पर घिसटता देखते है तो हमारी सम्वेदना जागती है | नहीं न ! हम नाक बंद कर आगे बढ़ जाते हैं| पुलिस को फोन घुमाने की भी जहमत न उठाते | न ही और कोई ऐसी व्योस्था करते जिससे उस लाश को हटाया जा सकें |

अभी कुछ दिन पहले रविवार को हम आगरा-दिल्ली एक्सप्रेस-वे से गुजर रहें थे; सड़क पर किसी कुत्ते के बच्चे की लाश सी दिखी | स्पीड में होने के वजह से साफ़ साफ़ न देख पाए | बेटे से कहें कि "क्या सफाई नहीं की जाती सड़को की|
क्यों क्या हुआ उसने कहा तो बोले देखो सड़क पर लाश पड़ी किसी जानवर की , अब रात होते ही न जाने कितनी गाड़ियाँ इस पर से गुजर जाएँगी | टोल पर पहुँचने पर लगा बहुत भीड़ चल रही सड़क पर | शायद रविवार का दिन होने से सब मथुरा की सैर करने निकले होंगे | भगवान के घर जा रहें उनके प्रति अपनी सम्वेदना जगाने या फिर अपने प्रति | पर एक जीव जो निर्जीव सा हो गया है उसके प्रति हमारी सम्वेदना सोयी पड़ी है|

बेटे ने कहा नम्बर होता है कम्प्लेन करने का , हमने कहा मिलाओ नम्बर कम्प्लेन कर दो | झट वह बोला नम्बर न पता | क्या नेताओ की प्रचार होर्डिंग के बजाय ऐसे सहायता या कम्प्लेन करने के लिए जगह जगह बड़े बड़े होर्डिंग लगा उन सबके मोबाईल नम्बर न देने चाहिए? जिससे यदि किसी को ऐसी अव्योस्था दिखाई पड़े या समस्या हो तो फोन कर सूचित तो कर सकें | प्रचार के तो होर्डिंग थे लगे | सवाल कई उठते कई चीजों को देखकर पर जबाब में शून्य ही हाथ लगता |

खैर कहाँ भटक गए हम | यह मन भी न जाने कितने सवालों से भरा है एक टॉपिक पर टिकता ही न !
घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही रस्ते में न जाने कितने सम्वेदना को जगाते दृश्य मिल जाते है| पर हमें अपनी मंजिल की ओर दौड़ लगानी होती अतः हम उस सम्वेदना को थपकी देकर सुला देते है | शायद मन कहता सो जा बेटा वरना खामाखां परेशानियों में उलझ जायेगा | और अपनी मंजिल पर लेट जाएगा तो वह तुझसे छुट जाएगी | आत्मा सोयी पड़ी है अतः हमें कचोटती नहीं है वह भी | क्यों ऐसा ही होता न !

यदि सही मायने में सम्वेदना जागी है किसी के मन में तो, घर में, घर से बाहर देखिए कई ऐसे अवसर है जो इंसानियत को ललकारते मिलेंगे | इंसानियत को जगा इन्सान की मदद कीजिए {मतलब प्राणीमात्र से}| वैसे कहना आसान है करना मुश्किल क्योकि इस राह में बड़े खतरे भी है और अपनी विवशता भी | फिर भी जिन्दगी के मोड़ पर किसी एक भी मदद कर पाए तो बड़ी बात होगी मेरे लिए भी और आप सबसे भी यही कहना|
हमें तो अपने घर के सामने खड़ा कनेर का पौधा रोज हमारे सम्वेदनहीन होने का प्रमाण देता है| और हम मेयर को कोसते हुए रोज अपनी सम्वेदना प्रकट करती रहती| सविता मिश्रा

सितंबर 05, 2016

शिक्षक दिवस और गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई|..:) :)

फ्रेंडशिप डे और नागपंचमी इस साल एक दिन थी | पिछले साल जन्माष्टमी और टीचर्स डे एक दिन |
इस बार गणेश चतुर्थी और टीचर्स डे एक साथ है | कुछ तो इशारा है |

गणेश भगवान बड़े ज्ञानी थे पर शिक्षक ..? कुकुरमुत्तो से उगते स्कूल-कॉलेज और अंधी गली से विचरण करते आते शिक्षक | सरकारी मेवा खा रहे, प्राइवेट मेवा पा नहीं रहे | सब का अपना अपना रोना |


कुम्हार गीली मिटटी को हाथ से सहारा देकर ठोक कर दिल से,प्यार से,स्नेह से खूबसूरत मूर्ति बना देता है.....बहुत खोजा दिल से पर ऐसे किसी शिक्षक का नाम अपने दिमाक में न आया| खैर आज डा.राधाकृष्णन जी का जन्मदिवस हैं ... | जो शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता हैं | ऐसे बहुत से शिक्षक होंगे जो अपना प्रोफेशन समझ नहीं बल्कि दिल से बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करतें होगें|

जब बच्चे कुछ बन निकल जाए तो माँ-बाप के साथ शिक्षक भी कह पड़ता मेरा पढ़ाया छात्र , कितना पढ़ाया यह तो छात्र ही बखूबी जानता | पढ़ाते तो माता- पिता दोहरी मार क्यों झेलते (ट्यूशन की)|
लेकिन जब बच्चा गलत राह पर चलता पकड़ा जाए तो माँ-बाप की तो मज़बूरी पर क्या कोई शिक्षक तब आके खड़ा हो कह पाता कि हमने पढ़ाया | नहीं ,कदापि नहीं कहता | उससे उसकी प्रतिष्ठा धूमिल होती हैं | अपनी प्रतिष्ठा अपना स्वार्थ हर किसी को दीखता क्या शिक्षक और क्या छात्र |
शिक्षकों से अपील नींव का पत्थर न बनना चाहे न सही पर लोना लगी ईंट न बनियें| शिष्यों से भी गुजारिस है एकलव्य न बन पाए न सही पर दुर्योधन और दुश्सासन जैसे शिष्य न बने |

न शिक्षक गुरु योग्य रह गए न छात्र शिष्य योग्य | अब तो दोनों एक दूजे से सामंजस्य बैठा के चलते हैं |
ज्यादा बोलना अच्छा न बस आज इतना ही| आखिर शिक्षा का प्रसाद तो हमने भी ग्रहण किया है अपने शिक्षकों से और यहाँ fb पर उपस्थित ज्ञानियों से | मात-पिता,भाई-बन्धुओं से |सखियों से यहाँ तक कि नन्हें-मुन्हें बच्चों भी |
जीवन के सफ़र में जो भी शिक्षा देने वाला मिले शिष्य बन शिक्षा ग्रहण कर दिल से शुक्रिया करते चलें |
आजकल  द्रोनाचार्यो जैसे विद्वान् शिक्षकों की कमी भले हो परन्तु हैं ही नहीं ऐसा नहीं है | और न ही एकलव्य एवं  अर्जुन जैसे शिष्यों का अकाल है  | बस रमने और गुनने की बात है | #सविता मिश्रा
शिक्षक तुम में रम गया तो कोयला से हीरा बना देंगा और शिष्य रम गया तो निर्बुद्धि का होकर भी बुद्धिमान बन जायेगा |
अतः आभार सहित सभी आदर्श शिक्षकों को नमन| आप सभी को शिक्षक दिवस और गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई|..:) :)

अगस्त 15, 2016

~कैसी आजादी ~

लगभग चौदह साल की बाली उम्र पार हो चुके आजकल के बच्चों को अपने माँ -बाप से आजादी चाहिए ! माँ-बाप्प को अपने माँ-बाप से आजादी चाहिए ! और उनके माँ-बाप को इस जिन्दगी के बंधन से आजादी चाहिए !

सरकारी नौकर को अपने अधिकारीयों के खिलाफ खुलकर बोलने की आजादी चाहिए तो अधिकारीयों को अधिनस्तों पर मनमानी और नेताओं के हस्तक्षेप से आजादी चाहिए |
नेताओं को मनमाने ढंग से काम करने और धनपशु बनने की आजादी चाहिए तो वोटर को अपने नेताओं को कुछ भी भला बुरा बोलने की आजादी चाहिए |

पत्रकारों को खुरपैची करने की आजादी चाहिए तो सम्पादक को उसकी पूंछ पकड़ मुरेड़े रहने की आजादी चाहिए |
पुलिसकर्मियों को जनता पर तानाशाही  करने की आजादी चाहिए तो जनता को उसे हर वक्त गालियाँ देने की आजादी चाहिए |

कवि-लेखकों को मनमाने ढंग से लिखने की आजादी चाहिए तो आलोचकों को येन केन प्रकारेण उनकी टांग खींचते रहने की आजादी चाहिए |
वकीलों को झूठ-सांच को अपने हिसाब से परोसने की आजादी चाहिए तो जजों को अपनी कलम की ताकत दिखाने की आजादी चाहिए |
शिक्षको को छुट्टियों पर कुंडली मारने की आजादी चाहिए तो शिष्यों को शिक्षकों से ही आजादी चाहिए |

लड़कियों को भय मुक्त माहौल में पढ़ने-लिखने, रहने की आजादी चाहिए तो लड़को को एक अदद नौकरी के जुगाड़ होने के लिए आरक्षण से आजादी चाहिए |
सत्ताच्युत पार्टी को सांप्रदायिक दंगे कराते रहने की आजादी चाहिए तो सत्ताधारी को वोटरों को लालीपाप चटाते रहने की आजादी चाहिए |

कुल मिला के सब को अपने अपने मतलब की आजादी चाहिए ही चाहिए | पर हम यह सोच सोच परेशान है कि जो गोरे अंग्रेजो से भारत की आजादी छीन काले भारतीयों के नाम लिख गुमनाम हो गए शहीद किसके लिए आजादी दिला गए; वो उनके मतलब की थी ? मतलब साफ़ है वो मतलबी न थे जुनूनी थे अपने खून से भारतीय धरती पर वन्देमातरम लिख गए |

उनकी रूहें संतुष्ट रहें इसके लिए जरुरी है कम से कम तिरंगे का तो कद्र करें हम सब |
अपनी आजादी को समझते हुए दुसरे की आजादी का भी ख्याल रखिए, मान रखिए |

संस्कारो की नींव कहाँ खोखली हो रही उसके लिए दो लाइनें ...:)
चार लड्डू, फिर दो, फिर आइसक्रीम,अब चाँकलेट हो गयी,
अमर शहीदों की दी हुई आजादी तो न जाने किधर खो गयी |


डरते थे गद्दारों से कभी
अब अपनों से डरते है
यूँ ही आजादी का जश्न
हम हर वर्ष करते है |
||सविता मिश्रा ||



सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई ....भले ही हम पूर्ण स्वतन्त्र नहीं है फिर भी बहुत बहुत शुभकामनायें ................

~हर दिल में हो देश के प्रति प्यार भरा ~~

देश की तरफ आँख उठा कर देखे दुश्मन जो कोई ,
जा पड़े आँख में हम शोला बन उसकी शामत आई।
अब तो हो चुके शहीद भारत पर क्या करें हम में से कोई
जो जिन्दा है आज उनकी तो जैसे देशभक्ति ही है खोई |

भरा है प्यार का दहकता अंगार दिल में हमारे ,

स्वदेश के प्रति सम्मान भरा अधिकार दिल में हमारे |

देश के लिए मर मिटने का जूनून था कभी दिल में हमारे ,
आज स्वप्रेम के मोह में देशप्रेम हो गया है एक किनारे |

आज देश की देख यह हालत गर्व के बजाय अफ़सोस है ,
जिसके लिए मर मिटे हम भूलकर हमें ही वह मदहोश है |

जिस देश के लिए हँसते हँसते खाई हमने अपने सीने पर गोलियां,
उसी मेरे प्यारे देश को बेच रही हैं यहाँ अराजक तत्वों की टोलियां|

खोखला कर स्वदेश को अपना ही घर माल से भर रहें हैं ये नेता
क्यों देश-भक्ति के बजाय भर गयी हैं इनमें इतनी अधिक लोलुपता |

चूमकर झूल गए थे फांसी के फंदे पर कुछ भी न निकली बोलियाँ,
उदास बहुत ये मन बढ़ता हुआ देख देश में गरीबों की खोलियां|

प्यार के बजाय दिल में धधक रही है अब ज्वाला समझो
कहीं ऐसा ना हो कि कब्र से उठकर जला दे हम तुमको | सविता मिश्रा


सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई ....भले ही हम पूर्ण स्वतन्त्र नहीं है फिर भी बहुत बहुत शुभकामनायें ................|:) :)




जुलाई 20, 2016

जाने दे-

रुक थोड़ा सा मुझको संभल जाने दे
मुझमें भी जरा सी तो समझ आने दे
मैं भी कलम पकड़ कुछ लिख सकूँ
मुझे इतनी कलमकारी तो सीख जाने दे


हुनर सिखने में लगेगी तनिक देर अभी
गजल के 
भी कुछ नियम सीख जाने दे

प्रयास हैं बहुत पर थोड़ा वक्त है अभी
बुद्धि में हमारी भी  पैठ ise बनाने दे
कलम अपनी जब चल  पड़ी idhr को
तो उसे भी कुछ गजल कह 
ही जाने दे|...सविता.....

जुलाई 16, 2016

~बदलते संस्कार~

इस कविता के साथ हम उपस्थित थे हिंदी भवन में | १७/9/२०१६ को १०० कदम के साँझा संग्रह के विमोचन में ..:)


परदादा कहते थे कि
राह चलते व्यक्ति को
बुलाते थे घर अपने
भोजन कराते थे प्यार से
व्यक्ति थका-हारा होता था
दो-चार दिन ठहर कर
फिर जाता था,
जाते जाते ढेरों दुआएं दे जाता था |

फिर दादा कहते थे कि
राह चलता व्यक्ति थक कर
बैठ जाता था पगडंडी पर
हम उसे घर ले आते थे
प्यार से भोजन-पानी देते
एकाध दिन अपनी थकान
मिटाता था रुक कर
फिर दुआएं देकर
चला जाता था |

पापा कहते थे कि
राह चलते व्यक्ति मिलता था
थोड़ी पहचान होती थी और
घर में बुला कर बैठाते थे
प्यार से चाय-पानी कराते थे
दो-चार घंटे आराम कर
दुआ देकर हमको
चला जाता था अपने गंतव्य को |

अब हम कहतें हैं बच्चों से
राह चलता कोई मिले
बिना पहचान वाला हो तो
बात मत करना उससे
कुछ दे तो कभी मत लेना
और घर तो बिलकुल भी
मत बुलाना उसे
रास्ते में आते-जाते लोग
पता नहीं अच्छे है या बुरे
अतः बेटा घर का
रास्ता भी ना दिखाना
रात को आकर लूट लेगा
अतः दूरी बनाए रखना |

पहचान का हो तो भी
कोशिश करना
घर ना ले आना पड़े
यदि लाना पड़े तो फिर
प्यार से बैठाना
चाय-पानी कराना
और जल्दी से जल्दी
विदा कर देना उसे
दुआ तो दूर यदि
बद्दुआएं न दे तो शुक्र मनाना |

बेटा बड़ा हो गया है अब
वह राह चलते व्यक्ति से
नजरें भी नहीं मिलाता
अपने रिश्तेंदार भी मिलें तो
नजरें चुरा लेता है
देखा ही नहीं उसने ऐसा
आभास कराता है
घर आएं मेहमान को भी
चाय-नाश्ता तो दूर रहा
पानी भी नहीं पूछता है
कोशिश रहती है उसकी
बाहर से ही विदा हो जाये |

गलती शायद उसकी नहीं है
हमारी ही है
हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदलते गयें
अपनी मानवता को ही
शनैः शनैः दफन करते गयें
भावनाएं अब मर गयी हैं
हम मशीन हो गयें हैं
दूसरों की परवाह नहीं
आगे बढ़ने की होड़ में
जानवर से भी गये-गुजरे हो गयें हैं
दुआएं लोगों की छोड़िए
बद्दुआएँ लेने लग गयें हैं | +सविता मिश्रा +


जुलाई 12, 2016

~प्रतिरोध की संस्कृति~

प्रतिरोध यानि विरोध की संस्कृति| जब से जीव-मात्र ने जीवन पाया है, यह प्रवृत्ति अपने आप ही जन्मानुगत ही उसमे पायी जाती है| इंसान क्या जानवर भी विरोध की संस्कृति से बखूबी परिचित है|
खैर हम तो इंसानों की बस बात करेंगे | प्रतिरोध करना इंसानो का मुलभूत स्वभाव है |
बच्चा जन्म लेते ही प्रतिरोध करना सीख जाता है| उसके मन मुताबिक चीज न हो तो वह रोकर अपना प्रतिरोध दर्ज कराता है | जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है वह क्रोध कर ,रोकर ,चीख-चिल्लाकर प्रतिरोध करता है |
प्रतिरोध ऐसी ताकत है जिससे हम सामने वाले को उसकी गलती का अहसास दिला सकते है | पर इसका उग्र रूप बहुत ही घातक होता है | उग्रता में हम अपनी सीमा भूल जाते है | सीमा का उलंघन होते ही हमारा दिमाक भी प्रतिकार करता है, पर हम क्रोध में अंधे हो चुके होते है | भावहीन हो जातें हैं, जिससे दिमाक का वह प्रतिकार हम महसूस ही नहीं पाते|
शान्तिमय प्रतिरोध में बहुत ताकत है | पर यह एक होम्योपैथी इलाज की तरह है ,जो समय लेता है, सामने वाले को उसकी गलती का अहसास कराने के लिए | पर यह समय ही तो हैं जो हममें से किसी के पास होता कहाँ है | हमारी जल्दी सुनी जाये अतः हम आक्रामक प्रतिरोध की संस्कृति अपनाते है, जो एलोपैथी जैसा काम करती है| पर लोगों की नजर में हमें  उद्दण्ड भी बना देती है |
आजकल आदमी की सहनशक्ति ख़त्म सी हो रही है| अतः वह आक्रामक हो प्रतिकार करता है | हर गली -मोहल्ले में ,हर बात पर | उसका यह आक्रामक प्रतिकार, प्रतिरोध की संस्कृति के प्रतिकूल हो जाता है |जिससे वह असर नहीं होता जो होना चाहिए |
सड़क पर प्रतिरोध करते लोग आम जन से भिड़ते ही रहते है यह आम बात है | सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा कर प्रतिरोध दर्ज करना, कौन सी बहादुरी का काम है | संसद घेरना ,चीखना -चिल्लाना ,आगजनी , मार-पीट करना ये सब तो स्वस्थ प्रतिरोध की संस्कृति नहीं है,फिर भी ज्यादातर लोग ऐसे ही कर रहें हैं |
'संयत रहिये तो ही स्वस्थ रहेंगे ' प्रतिरोध करने वालों को यह युक्ति अपनानी चाहिए |
पांच -छः साल से ये वेलेंटाइन डे क्यों इतना महत्व पा रहा है, क्योंकि हम इसका जबरदस्त विरोध कर रहें है| हम इसे दबाने में प्रतिरोध कर रहें तो इसके समर्थक इसे उभारने में प्रतिकार | दोनों ही प्रतिकार अमर्यादित है, जिसके कारण फायदा के बजाय नुकसान हो रहा हैं | दोनों ही तरफ से प्रतिरोध की संस्कृति अपनाने के कारण आज सभी बच्चे -बूढ़े नर- नारी के जुबान पर यह डे हैं | वर्ना कौन जानता था कि ये किस चिड़िया का नाम है | अमर्यादित डे को हर युवा अपनाकर भारतीय संस्कृति को कुटिलता से कुचल रहा है| इसका प्रतिरोध करना हम भारतीयों की ही जिम्मेदारी है | पर सकारात्मक रूप से, वर्ना यह लाइलाज बीमारी की तरह फैलती जाएगी | फिर भविष्य को देने के लिय हमारे पास अपनी संस्कृति बचेगी ही नहीं |
प्रतिरोध की संस्कृति जो हमारी ताकत है ,उसे हमारी कमजोरी बनाकर फ़िल्मवाले भी इस्तेमाल कर रहे है, और हम अन्जान होने के कारण इस्तेमाल हो रहें है | कोई न कोई विवादित क्षण मूवी में डालो, जनता प्रतिकार कर अपने आप प्रचार कर देंगी| उनकी इस सोच पर हमें सोचना होगा कहीं हम महज कठपुतली तो नहीं बन रहें |
भीड़ में प्रतिरोध करते किसी भी व्यक्ति से यदि सवाल किया जायें कि आप प्रतिरोध किस चीज का कर रहें है? तो शायद ही २० में से आठ ही यह बता पाएँ कि मूल कारण क्या है, जिसका हम प्रतिरोध कर रहें हैं| बस देखा-देखी पाप ,देखा-देखी पुण्य की राह पर चल पड़ते है अंधे -बहरे-गूंगे बनकर | जो अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिरोध की संस्कृति को क्षति पहुंचाता है |
अब इसका मतलब यह तो कदापि नहीं कि आपके घर के सामने कोई लाकर ठीक दरवाज़े पर गाड़ी खड़ी कर दें, पर आप दबते-दबाते किसी तरह निकल जाये प्रतिकार करें ही न | या आपके दरवाजे पर कोई पान थूंक जाये, पर आप मूक दर्शक बने रहें | प्रतिकार करना हमेशा मुलभूत अधिकार है | बस उसका दायरा कहाँ, कब शुरू होता है और कहाँ, कैसे ख़त्म यह समझने की बात है |
आज की युवा पीढ़ी ना जाने किस ओर भाग रहीं है | रोकने-टोंकने पर इसी ' प्रतिरोध ' को हथियार बना लेती है | न जाने कैसी आजादी चाहिए ? कोई उनसे कहें तो कि बेटा आजाद तो तुम जन्म से पहले भी न थे, जन्म के बाद भी नहीं हो | कोख में माँ ने तुम्हारी एक सीमा तय कर रखी थी और शैशवावस्था में भी | हाँ प्रतिकार होता था पर वो प्रतिकार सही दिशा में है या नहीं यह निश्चित माँ-बाप ही करते थे |
आज वैश्विक व्यवसायिक हवा में झूलते जिस झूले में बैठ लोग, आसमान का सफ़र करना अपना अधिकार बता रहें है| वह झूला दरअसल एक कमजोर डोरी से बना है, जो उनके थोड़ा सा ऊपर जाते ही टूट जाता है |और वो फिर इसी धरातल पर आ गिरते है, जो उनकी अपनी भारतीय संस्कृति है | आज जो भारतीय संस्कृति को हेय दृष्टि से देख प्रतिरोध कर रहे है , कल इसी की गोद में आराम करना पसंद करेंगे| जैसे बच्चा कितना भी उछल-कूद, शरारत कर ले पर अंततः माँ की गोद में सर रखकर ही सुकून पाता है | क्लब में थिरकना ,शराब -अफ़ीम-गांजा का सेवन करना, बेहूदे कपड़े पहनना ये सब अपनाने के लिए सभी छटपटाते है| हर चमकती हुई चीज को सोना समझ युवा द्रिगभ्रमित हो अपना लेता है, पर कुछ समय पश्चात् मोह भंग होतें ही  इनसे बाहर आना चाहतें है| अँधेरी गुफा में जाने का रास्ता तो बहुत सरल हैं परन्तु निकलने का उतना ही कठिन|
हरें -भरें फल -फूल से लदें राजनीतिक वृक्ष पर भी लोग प्रतिरोध कर- कर के चढ़े जा रहे है |  चढ़ते ही संयमित प्रतिरोध किस चिड़िया का नाम है भूल,असंयमित हो मशगूल हो जातें  हैं, खूबसूरत फल-फूल अपनी झोली में डालने में |
गलती उनकी कहाँ ,गलती तो हमारी है| जो हर उल्टा-सीधा ढंग से प्रतिरोध करने वाले को हम युग पुरुष समझते है| क्योकि हमारे अंतस के कोने में बैठे प्रतिरोध के राक्षस को वह आवाज दे रहा है | विरोध का राक्षस तो अपने भी अंतस में तांडव कर रहा है, पर हमें  अपनी सीमा पता है उस सीमा से बाहर निकल उदण्ड रूप से प्रतिरोध करना हमारी मर्यादा के खिलाफ है |

अब तो प्रतिरोध भी शायद प्रतिकार करने लागा है कि..
मुझे वीभत्स मत बनाओं
संयत रूप में ढ़ल जाओं
बदल डरावना रूप अपना
भारतीयता को तुम अपनावों|
एक गीला कपड़ा आग के पास भी लाओं, तो वो तब तक नहीं जलता जब तक गीला रहता है | ज्यादा समय सानिध्य में रखने पर सूखते ही झट आग पकड़ लेता है | उस समय पानी डालकर बुझाना हमारी जिम्मेदारी हैं | आज यदि हम इस ज़िम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से नहीं निभाते तो कल सब कुछ जलकर ख़ाक हो जाएगा | फिर तो आग के ढेर पर बैठकर रोने के सिवा कुछ नहीं मिलेगा |
प्रतिरोध की संस्कृति के जरिये हमें भारतीय संस्कृति को बचाने का प्रयास करना चाहिये | हाँ एक दायरे में हो यह नहीं की एक मर्यादा बनाये रखने के लिए, दूसरी मर्यादा तोड़ी जायें |
' प्रतिरोध की संस्कृति ' को संस्कृति के ही रूप में अपनायें , तो वह दिन दूर नहीं जब सभी इस संस्कृति के पक्षधर होंगे | आखिर मर्यादित रहना हमारी संस्कृति है और मर्यादा में रहकर विरोध करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार |
चीख-चीख कर, कर रहा जो तू प्रतिकार
उदण्ड मवाली कह, आवाज़ दबा देंगी सरकार
अत्याचार एवं वैश्विकता का, मर्यादा में रह कर विरोध
कन्धें से कन्धा मिला तब, चलने वालों की होगीं भरमार | सविता मिश्रा

जुलाई 08, 2016

!!!बबूल का कांटा!!!

समझे तो सही! नहीं समझेंगे तो सुनेंगे!
बस एक सलाह - माने तो 
ठीक न माने तो भी खास फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन बस आप फ्रेंड लिस्ट से विदा हो जाएंगे। हमारी ही नहीं किसी भी स्त्री की फ्रेंड लिस्ट से। बबूल का कांटा किसे सुहायेगा भला, वैसे भी हम स्त्रियां कोमल स्वभाव की स्वामिनी तो हम सबको तो नहीं ही सुहायेगा। अतः बबूल का कांटा न बनिए!

हे फेशबुक वासियों! आप लोग जैसे दूसरे की फोटो कॉपी करके, मैंसेज में भेजते हैं या उसका दुरूपयोग करते हैैं, वैसे ही आपके माँ -बहन क़ी फोटो कोई  और ऐरा-गैरा कॉपी करके आपको या किसी और के मैसेज बॉक्स में या 
किसी की वाल पर या अपनी ही वाल पर चिपकाए तो कैसा लगेगा! और कुछ उटपटांग से लिख भी दे, तो फिर..! कैसा लगेंगा? शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते भई!
मेहरबानी करके दूसरे की माँ-बहन की भी इज्जत करियें ! यदि अपनों की चाह रहे हैं तो। आप दूसरे के लिए यदि कुँआ खोद रहे हैं तो खाई आपके लिए भी कहीं न कहीं खुद ही रही होगी!!
ये भी तो एक प्रकार का क्राइम है...।..वकील बहुत हैं यहाँ फेसबुक पे..पर धारा कौन सी लागू होगी, शायद न बताएँ।   😊 क्योंकि पढ़ेंगे आकर या नहीं, कोई गारण्टी नहीं|अब  सब पोस्ट सबको दिखे ही, जरूरी तो नहीं।      😊😊
हम सब महिलाएँ तो आप कितने भी स्मार्ट हों, अच्छे से ड्रेसअप हों, या फिर और कोई और कारण हो! आपकी कोई भी तस्वीर शेयर नहीं करते हैं...। न ही मैंसेज बॉक्स में जाकर आपकी ही तस्वीर आपको भेजते हैं...!! आपकी तस्वीर पर ही कमेंट करके आते हैं। पर आपको शायद शर्म आती है महिलाओं की फोटो पर बोलने में। फोटो तो फोटो, पोस्ट पर भी बोलने में कातरते हैं, है न ?? पोस्ट को देखकर भी अनदेखा करना और मैसेज में जाकर बोलना 'बहुत अच्छा लिखती हैं आप....' क्या मतलब है इसका?हमें नहीं पता क्या! हम कितनी स्याही खराब करते हैं और कितने पेपर! हो सकें तो पोस्ट पर बोलें , राय दें, तो समझ आये! 
दौड़कर गुपचुप बॉक्स में मत पहुँचिए। औरतों की पोस्ट पर दो शब्द बोलने से आपकी इज्ज़त नहीं कम हो जाएगी!

मायावी फेेेसबुुुक की भूल-भुल्लया में
बड़ी मुश्किल से भरोसा करके आप सब को जोड़ने की हिम्मत जुटाते हैं हम, कृपया उस भरोसे को कायम रखिए। वैसे जब हम जैसे सामान्य लोगों के मैसेज में आप एक्का दुक्की ऐसे सिरफिरे टपक पड़ते हो, तो वे लोग कितना परेशान होते होंगे जो व्यूटी क्वीन हैं!! उन्हें तो आप सब जीने ही 
नहीं देंते होंगे!
जियो और जीनो दो भई! हम सब भी हाड़- मांस के पुतले हैैं आप सबकी ही तरह। आपके अहम् को ठेस पहुँचती है तो क्या अपना आत्मसम्मान नहीं है क्या कोई!
तस्वीर हमारे व्यक्तित्व की पहचान हैं । इस पहचान को कायम रखने के लिए तस्वीर लगाते हैं। आप सब से तारीफ पाने के लिए नहीं...। और यदि तारीफ पाना भी चाहेें तो इसमें बुरा भी क्या है! हम तस्वीर बदलें तो बुरा हुआ। आप बदलो तो भला! ये कैसा दोगलापन! जैसे कलम हमारे स्वभाव और लिखने की क्षमता की परिचायक ! उसी तरह तस्वीर  हमारे व्यक्तित्व की पहचान है। इसके जरिये हम अपनी पहचान कायम रखना चाहते हैं ! कोई लिखने वाला कहीं मिले तो पहचान सकें। हम भी कई को तस्वीर से ही पहचानते हैं, नाम तो एक से हो सकते न, पर तस्वीरें तो एक सी नहीं हो सकती।
तस्वीर पर यदि आप सब खूबसूरत कहते हैंं भी तो यक़ीन मानिये बहुत आड फील होता है! समय के साथ अब आदत पड़ गयी है। उ क्या है न कि हम स्त्रियाँ तारीफ अवश्य सुनना चाहती हैं पर अपने परिवार वालों से दूसरों  से सुनने में बड़ा अटपटा सा लगता है। यहाँ भले सुन ले रहे हैं ! क्योोंकि किकिकिकिकि धन्यवाद भी ज्ञापित कर रहें ! पर सामने कोई बोले तो बोलती बंद रहती !!!
वैसे भी आप सबने ध्यान दिया हो तो, हमारी तस्वीर पर सामान्य कमेंट के अलावा महत्वपूर्ण रूप से आशीष ही होता हैं बड़ो का!!! प्लीज मेहरबानी होगी आप सभी क़ी कि ऐसी हरकत न करें जिससे हम स्त्रियोँ को परेशानी हो!!!ये मत समझिये कि आप में कई हमारे लिए बबूल का कांटा बनते रहेंगे और हम स्त्रियाँ उस कांटे का दंश झेलते रहेंगी | बदले में हम भी काँटा बन सकतें, पर हम नीचे गिर कर, नीचे गिरें हुए को ऊपर उठाने में कोई रूचि न रखते |
Fb पर लेखन उद्देश्य से जुड़े है हम वहीं  करने दीजिए शांति से!!!!!खुद सभ्यता से जीये और हमें भी चैन से जीने दें!!!हम्बल रिकवेस्ट है आप सब ऐसों -वैसों से !!!!
कई कहते औरतों  को तस्वीर ही नहीं डालनी चाहिए!!!क्यों भई गलत करो आप और भुगते हम!!!आप में तो यह भी सोचतें  कि औरतों को घर से बाहर ही न निकलना चाहिए....नियत हो आपकी खोटी और औरतें  रहें कैद में ये कैसा न्याय!!!!न्याय पर पट्टी अवश्य बन्धी , जानता समझता वह भी है!!!!

सुबह-सुबह मेसेज में फिर एक बार अपनी तस्वीर देख सनक गया दिमाग.....|देखिए आप में कुछ के कारण कितना समय बर्बाद हुआ हमारा खामख़ाह!!!!क्योंकि मालूम है आप सब के सर पर जूं भी न रेंगेगी!!!!आप सब पत्थर के बने, न,न पत्थर भी न, क्योंकि उसको गढ़ खूबसूरत मूर्ति बनाई जा सकती है!!पर आपको न क्योंकि कुछेक लोना लगे पत्थर (मानसिक रोगी) है, जिन्हें तराशा नहीं जा सकता !!मेहरबानी करके बबूल कांटा न बनिए| नाम कमाने का अच्छा प्लेटफार्म मिला हैं सभी को उसका सदुपयोग कीजिए | दुरूपयोग कर अपना नाम,संस्कार और संस्कृति मिट्टी में न मिलाइए |
माना तस्वीर शेयर कर आपने ऐसा कुछ न कहाँ कि हमारा खून उबले पर फिर भी आप बिना तस्वीर मेसेज में या वाल शेयर कर भी बात कह सकते थें !!!!!ख्याल रहें इज्जत देंगे तो ही पायेंगे!!! ...........सविता 'एक दुखित आत्मा'

अक्टूबर 07, 2015

विरोध-

पुरुष खड़ा है
विरोध में
पुरुष के ही !

फैला 
रहा भरम जाल
 और
फंसी रही स्त्री।

स्त्री के आस-पास
हर अनजान पुरुष
दुश्मन होता क्यों ?
स्त्री के अपने
जाने पहचाने
पुरुष का ही !!

सोचो तो एक बार
दिख जायेंगी
सच्चाई भी
जो छुपाई गयी है
स्त्री ही स्त्री की दुश्मन
सगूफ़े की आड़ में !

हे पुरुष !
अब तो जागो
मकड़जाल में फांस
स्त्रियों को यूँ
अब तो न उलझाओ !

तुम्हारी ही बनाई
परिधि से निकल रही है
स्त्री भी अब जग रही है !!!

वर्चश्व-

वर्चश्व~
स्त्री ही नहीं
कोई भी
विरोधी हो सकता है !

कभी भी
कहीं भी
कैसे भी
विरोध कर सकता है !

आखिर प्राणी ही तो हैं
अपना दबदबा
रहें बना
इसके लिए
करता रहता है मंथन !

अपने ही
अपने को
काटते रहते हैं
कि वर्चश्व
डिगे न कभी !

पर भूल जाते हैं
हमारी ही तरह
दूसरा भी
करना चाहता है
अपना ही वर्चश्व कायम !

भले ही दबाना पड़े उसे
अपनी ही जाति को
धर्म को
राज्य को
समाज को
या फिर परिवार को !

इस वर्चश्व की
लड़ाई में सब शामिल !

क्याँ नर
क्या नारी !
क्याँ जानवर
और
क्याँ पेड़ पौधे !

सब के सब
दूजे को दबा
उठा लेते हैं खुद को !

बस समझने की बात है
आँख की पट्टी को खोल।।sm

सितंबर 16, 2015

बधाई सन्देश

भोर से कल भोर तक जल भी ग्रहण न होगा....ऐसा त्याग ,ढाढ़स बस एक पत्नी ही रख सकती प्रेमिका नहीं....सभी धर्मनिष्ठ पत्नियो को तीज की हार्दिक बधाई......प्रेमिका या टाइमपास खोजते मूर्खो को भी तीज की बधाई !!!!इस लिये नही कि वो मूर्खता कर रहें इस लिये कि किसी जन्म में तो बहुत पूण्य किये होंगे जो सुधड़ ,संस्कारी पत्नी मिली जो ऐसो को जानते हुये भी भूखी प्यासी रह भगवान से अपने सुहाग की रक्षा का वर मांगती हैं.....सविता☺☺☺☺

अगस्त 22, 2015

स्त्री को जो मिला पढ़ने का अधिकार--


स्त्री को जो मिला
पढ़ने का अधिकार
कुछ ज्यादा ही पढ़ लिया
पुरुषो से
बढ़कर |

किया जब एम.ए. और एल.एल.बी.
बन गयी जब पुरुषों की बीबी |

गयी  दुल्हन बनकर जब ससुराल
झाड़ा ससुर-सास पर
अपनी गिटपिट बनकर दलाल
पति को भी नहीं छोड़ा
 बना लिया गुलाम
पति ने किया
खड़े होकर पत्नी को सलाम |

स्त्री कुछ ज्यादा ही बढ़ी
लेकर बेलन हुई खड़ी
स्त्री को जो मिला
पढ़ने का अधिकार
कुछ ज्यादा ही पढ़ लिया
पुरुषो को पिछड़ा कर |

||सविता मिश्रा ||
१/१९८७