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फ़रवरी 04, 2021

सविता उवाच

 अपने को साहित्य में प्रायोजित नहीं करिए, बल्कि साहित्य आपको प्रायोजित करे, इतना उसे समय दीजिए। 'अक्षजा' का घनघोर उवाच 4/2/2021

सुप्रभात

फ़रवरी 03, 2021

सविता उवाच

 शब्द तीर है, कोई भी किसी के खिलाफ चला सकता है। लेकिन यह भी ध्यान रहें, कि हवा में न चलाइए , वरना अपने ऊपर ही आ गिरेगा! अक्षजा

शब्द निष्ठा ग्रुप में 3/2/2021  को

फ़रवरी 02, 2021

26 जनवरी का वह काला दिन


सबसे दुखद वाकया इस दंगे में 350/400 के करीब खाकी वाले घायल हुए।

लेकिन  किसानी का पताका फहराने वाले पोस्टकर्ता जिनके पास सिर्फ गमलों में खेती उगती है वो अपने को किसान कहते हुए तथाकथित किसानों के आवभगत में लगें हैं।जो व्यक्ति भौकार फाड़कर संवेदना का कार्ड खेल रहा। जिसे खुद खेती नहीं व्यापार से प्यार है, उसके लिए मार-काट, गाली-गलौज पर उतर आ रहे हैं। सिर्फ और इसलिए कि विरोध करने का धर्म निभाना है।

कमाल है!! नहीं क्या!!

सबकी ही संवेदना खाकी के प्रति सोई रहती हैं, क्यों वो मानुष नहीं हैं क्या!! अब कील या तार के द्वारा अपनी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर रहें हैं तो सबको मिर्ची लग रही!! ये दोगली नीति अच्छी नहीं है भई! जागो बन्धु जागो सिर्फ किसी की बुराई करने हेतु उन्मादी भीड़ के संग मत भागो वरना कहावत एक बार फिर चरितार्थ होने लगेगी कि कान न टौवे कव्वा खदेड़े।

ये तथाकथित किसान बन्धु सड़क छेंककर सुख सुविधा भोगने वाले तो बोले थे कि पुलिस वाले हमारे भाई हैं, हम पर वार नहीं करेंगे। खाकी ने बखूबी भैय्पन्न निभाया  लेकिन आप किसानों ने पीठ में छुरा घोंप दिया। इतना दबदबा दिखाया कि बेचारे अपनी जान बचाने के लिए दनादन खाई में कूदने लगे। आप सब खालिस्तानियों और तथाकथित किसानों ने तो जलियांवाला बाग हत्याकांड की यादें ताजा करवा दीं बन्धुओं! तब भी आप सब शोशल मीडिया धारी बन्धुओं उन तथाकथित किसान के इस कार्ड-प्ले पर घोर चुप्पी साधे बैठे रहें। क्यों!! क्योंकि आपको सरकार का येनकेन प्रकारेण सरकार का विरोध करना है और खाकी से तो आप सबकी जलन जग जाहिर है। आप लूटमार मचाओ तो ठीक और खाकी वाले ड्यूटी देते भी दिखे तो आपकी भाषा होती हैं कि साला घूस खाने के लिए मुस्तैदी से डटा है। अपनी पूर्वाग्रही मानसिकता आप त्याग भी नहीं सकते क्योंकि ये मानसिकता आपको घुट्टी के साथ ही पिलाई गयी होती है। उन ख़ाकीधरियों के साथ इतनी अमानवीयता हुई फिर भी वो अगन्द पांव से जमे रहे। उन लोगों ने न लट्ठ बजाया क्योंकि उनका बस वही अस्त्र-शस्त्र है भले उस अस्त्र के सामने कोई शस्त्र लेकर आ जाए। न ही अपनी अटकी जान को बचाने के लिए रिवॉल्वर चलाई । वैसे भी अक्सर रिवॉल्वर चलाने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ लटकाने के लिए दी जाती है। उनकी जान पर भी बन आए वो उसका प्रयोग तब तक नहीं कर सकते जब तक सामने वाला पहुँचा हुआ क्रिमिनल न हो। वो भी उतना ही प्रयोग कर सकते जितना कि एक गृहणी नमक का करती है किसी व्यंजन में। यानी सीधे गोली नहीं मार सकते जिससे कि उनकी अपनी जान बचे बल्कि अपराधी के पैर में मारने का अधिकार है। तो उसकी इस मजबूरी का भरपूर फायदा भाई कहने वाली उन्मादी भीड़ ने बखूबी उठाया। क्योंकि वो सब भले उन्मादी थे लेकिन थे तो सबकी नजरों में बेचारे किसान, देशप्रेमी किसान। जो देश की संपत्ति को भले तहस नहस ही क्यों न कर डालें। ख़ाकीधरियों को पीटना ,उनसे तू तड़ाक करना, मोबाईल का वीडियो बटन दबा कर खुले आम उनकी इज्जत की धज्जियां उड़ाना तो आजकल युवाओं का खेल तमाशा सा हो गया है। उस

के प्रति इन सभी नकारात्मक अफवाहों का संज्ञान लेते हुए ही शायद किसानों ने ताबड़तोड़ उनपर हमला किया और बाद में अपने को दूध का धुला साबित करने के लिए हास्य के साथ विवादित वीडियो बनाई और उन ख़ाकीधरियों के खिलाफ  शोशल मीडिया में फैलाकर बेखौफ इस्तेमाल किया।

 किसी की भी सहनशीलता की इतनी बार परीक्षा!! असहनीय होनी चाहिए  भई ये सभी व्यक्ति के लिए। लेकिन नहीं, ज्यादातर ने अपनी भड़ास निकाली और खाकी पर दे मारी जिससे खाकी और बदरंग हो गयी।

नेता न बनो बन्धुओं,न किसी के पिछलग्गू। गलत को गलत बोलो। यदि सरकार गलत है , आपकी नजर में पुलिस वाले भी गलत हैं तो तथाकथित किसान भी दूध के धुले नहीं हैं। तलवार भांजना, तिरंगे का अपमान करना, लाल किला जो ऐतिहासिक और देशभक्ति का परिचयक है उसको हानि पहुंचाना, ये सब किसानी के लक्षण तो नहीं!

अपनी ड्यूटी करने वाले ख़ाकीधरियों को पीटकर किला जीत लिए तो हाँ भई, आप सब किला तो जीती लिए। क्योंकि समाचार चैनलों के मुताबिक आपने 350 से 400 ख़ाकीधरियों को अस्पताल पहुंचा दिए।

 दंगे में लाल किला  तबाह हुआ, उसपर धार्मिक झंडे लगाए गए। जैसे कि देश का लाल किला न हो किसी की बपौती हो। रेलगाड़ी के एसी कम्पार्टमेंट से तौलिया या चादर चुराने वाले, होटल से चीजें गायब कर देने वाले हम भारतीयों की नीयत अपने देश से भी घात करने से बाज़ नहीं आयी। वहां भी ये उठाईगीर मानसिकता के लोगों ने लाल किले का ताजपोशी-सा किए उन दो कलशों पर हाथ फेर दिया। उनकी धार्मिकता के पीछे छुपी उनकी उठाईगिरी फितरत ने अपना रंग दिखाया। 

और फिर मेन सड़क पर धरना देने बैठ गए पूरी सुख-सुविधा इकट्ठी करके। सुख सुविधाएं खत्म होते ही तथाकथित नेता का बयान को आप सब सरकार के खिलाफ लिखने वालें शोशल मीडिया वालों ने नजरअंदाज कर दिया कि "न बिजली न पानी, बिना सुख सुविधा के अब आंदोलन कैसे हो पायेगा"। जबकि सबसे बड़ा प्वाइंट यही था जिसे नोटिस किया जाना चाहिए था।

अच्छा सबको मारिए गोली, बस एक बार सोचिए कि अभी ये सभी तथाकथित किसान आपके घर के सामने धरना देने बैठ जाएं तो!! वहीं आपके घर के पास बहती सरकारी नाली में लोटा लेकर बैठे तो !! शराब के दौर न भी चले तो भी आप 100 नम्बर डायल कर-करके नाक में दम कर देंगे। जबकि वो सरकारी सम्पत्ति को ही अधिकार से प्रयोग कर रहें होंगे लेकिन वह आपके घर का सामना है अतः आप फट पड़ेंगे । एड़ी चोटी का जोर लगाएंगे उन्हें वहां से बेदखल करने के लिए। फिर ये किसान जिस बीच सड़क पर धरना दिए बैठे हैं उसके आसपास रहने वालों के विषय में सोचिए जरा!! खुद को उनकी जगह रखेंगे तो आप सबको उनकी भी तकलीफें पता चलेगी! सबको भक्तों, चमचा, अंधभक्त और न जाने क्या क्या कहने वाले लोगों जरा अपनी ओर भी निहारिए प्लीज। आप क्या अंधभक्त चमचे नहीं नज़र आ रहें! आप करो तो सच का साथ और जो दूसरें लोग करें वो निराधर्म! भई मानना पड़ेगा कि आप किसी खास चक्की का आटा खाते हैं।

कोई परिचित  या बच्चे जब नोयडा गाजियाबाद जाते हैं तो जान हलक में अटकी रहती है। लेकिन हे दिल्ली वाले समर्थकों! आप क्योंकर समझेंगे! रोड बंद होने से भी इंसान को कितना घूमकर अपने गंतव्य तक पहुँचना पड़ रहा, शायद ही आप सब समझेंगे। वो कहावत है न, जाके फटे न बिवाई, उ क्या जाने पीर पराई।

थोड़ी इंसानियत बरतिए और दिखाइए भी। और हां इस शगूफे को अब गोली मारियेगा। क्योंकि पोस्ट पढ़-पढ़कर कोफ्त होने लगी है। बबूल का पेड़ न बनिए बन्धुओं!

हमें भी लिखना न था, लेकिन इन दिनों इतनी अधिक पोस्ट दिखी किन्तु एक भी पोस्ट ने खाकी वालों की चिंता नहीं की...केजरी साहब भी मोफलर पहनकर किसानों को पानी पिला आएं, जबकि उनकी तरफ से साफ साफ बयान आया था कि भाजपा और आप पार्टी वाले शामिल हैं लाल किले पर हंगामा करने के लिए। हम किसान उस घटना से खुद को अलग करते हैं और अब देखिए उन्हीं को जेल से छुड़ाने की शर्त रख रहें। लेकिन ख़ाकीधरियों से तो केजरीवाल भाई जी का छतीस का आंकड़ा है।  खाकी को भी पानी चाहिए, जरा उन्हें भी पानी पिलाइए और हर कदम पर उनकी पानी- पानी करने से गुरेज करिए।

सब मजे में रहिए लेकिन व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ ही बस न रहिए । कभी-कभी खिलाफत करते हुए अच्छाइयां भी पोस्ट करके अपने अंदर की कड़वाहट हटाते रहिए। सबके संग रहना है तो मैल क्यों रखना भई, नेता तो नहीं हैं न फिर क्योंकर किसी से भी अंधभक्ति!  एक तरफा पोस्ट जब करते ही रहते हैं तो ...खैर !!बकिया सब ठीकी-ठाक है! 

'अक्षजा'

2/2/2021

भवनाएं में बहकर बहुत बड़ा सा लेख टाइप हो जाएगा या कहिए हो ही गया। इसलिए अब द एंड😁

हम कुछ कहे का!! कछु तो नाही!इसलिए टेक इट इजी😃

एक भारीभरकम किसान

सविता मिश्रा 'अक्षजा'

🙈🙊

मार्च 29, 2019

आसपास के लोग (कहानी संग्रह) समीक्षा

(पुस्तक के विषय में )
लेखक : कृष्ण मनु
आसपास के लोग (कहानी संग्रह)
सम्पर्क नम्बर : ९९३९३१५९२५
प्रकाशक : विश्व साहित्य परिषद
आसपास के लोग (कहानी संग्रह )
मेरे मन की बात कहानी पढ़ते हुए...😊

23 फरवरी को मिली हमें, कहानी संग्रह 'आसपास के लोग'
पढ़ी एक, थाली धरी सामने तो जरुरी हो जैसे लगाना भोग |
उठायी दूसरे दिन भी लिया आत्मकथ्य का पेज झाँक
पढ़ी कहानी भी एक दो फिर उसे धर दी हमने ताक |
मार्च में रही व्यस्तता पर लगा रहा शर्त का खटका
रह रहकर लिया हाथ फिर साइड में सहेज रखा |
शर्त क्या थी भूल गए हम भुलक्कड़ी से था अपना तो नाता
फिर से उठाई किताब हमने दो कहानी को दीमक सी चाटा |

‘आसपास के लोग’ की कहानियां बहुत ही भायीं
‘गफूर भाई’ ने तो दिल में ज्यादा ही जगह बनायी |

‘जंग’ का ‘राकेश’ ‘करमा के करम’ का क्या कहें
मेरे ही तो आसपास के ये सभी किरदार लगें |
अग्रेंजी हिंदी मिक्स ने करी कुछ चटपटी चाट तैयार
पढ़ते हुए 'पुराना चश्मा' हमें लगा लेखक होना है भार |

'अव्यक्त संवेदना' में व्यक्त दर्द घायल मेरे दिल को कर गया
'सरिता मंइयां साब' की किरदार ने अंत में संवेदना भर गया |
फिर बढ़ी आगे, ‘पथराई आंखों की भाषा’ बहुत कुछ कह गई
कुछ पढ़ कहानी मनन करने लगी, कुछ ने आंखों में लगाई झड़ी |

'एक बार फिर' में मजदूर की मज़बूरी
 तो 'शिनाख्त' में मधुर गृहस्थी की गुंथन
एक में दारु में सब दर्द पी जाना
तो दूजे में सूरत से ज्यादा सीरत की जतन |

ज्यादातर कहानी के किरदार के हाथों में
घातक सिगरेट मुई जलवाई गयी
'कोहरा छटने के बाद' भी मजदूरों के
 शोषण पर हमारी सुई अटक ही गयी |

'ताले पर ताला' शीर्षक ने हमें उलझाया
और अंदर क्या लिखा जानने को भी उकसाया
पढ़ते हुए कमरा आवंटन का भ्रष्टाचार समझ आया
और साथ ही चौथे ताले ने खूब हंसाया |

'भुगतान' में कर्तव्य-परायणता को दिलाया लेखक ने सम्मान
दुआ हमारी, ऐसी कहानी करें साहित्य में स्थापित कीर्तिमान |
मजहब के खातिर मैं अपनी ज़िन्दगी को तबाह नहीं करूँगा
'भविष्य की झलक' में इस कथन ने विद्रोह का भान कराया |

सहज सरल भाषा में लिखी कहानी संग्रह की हमें भेंट
मनु भैया आप करना क्षमा जो मेरी प्रतिक्रिया हुई लेट |
लिखकर आपने किया मुकाम हासिल, और भी आगे बढ़ें
हम जैस नवांकुरों के लिए आप यूँ ही मार्ग प्रशस्त करें |

व्यक्त करते हैं आभार, जो आप अपनी कहानी पढ़ने लायक हमें समझे
यूं ही समाज उद्धारक बढ़िया लिखकर, आप हमारे प्रेरणा स्रोत हमेशा बनें |

---००---
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा, ९४११४१८६२१
2012.savita.mishra@gmail.com

फ़रवरी 14, 2019

शहीदों को नमन

दिल मेरा मौन हुआ, ठाड़ा दिमाग मौन
उनके परिजनो को अब धीरज धराये कौन
हो गए शहीद पहलगाम में जवान पचास
उनकी माँ के आँसूओं को अब सुखाए कौन । sm 😢😢
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
14/2/2019

फ़रवरी 07, 2019

खूबसूरत सा गुलाब


आज 7/2/2019 को रोज डे पर एक कविता 
कोई मुझे भी तो  एक पकड़ाओं यारा गुलाब 
देखे बहुत दिन हो गए मुझे एक न्यारा गुलाब
मचलता गुलाब डे भी देखो आज आ गया इधर
न शरमाओं तुम दे दो मुझे भी एक प्यारा गुलाब

हूँ मिज़ाज से गर्म लेकिन ये दिल है कोमल बड़ा
दिल मचलता है मेरा भी लेने को सुनहरा गुलाब
लाल हो या हो पिंक सा फिर चाहे काला ही दे दो
मुझे भी रोज डे पर दो तुम आज ढेर सारा गुलाब 

पचास की ही होने को हूँ सठियाई नहीं हूँ जनाब 
मचल जाऊँ देखकर मैं भी खूबसूरत सा गुलाब |
सविता मिश्रा 'अक्षजा'

अगस्त 31, 2018

‘हिन्दी हाइकु’ वेबसाइट में छपे हमारे हायकु

1

माक़ूल नहीं, 

पिशाच हर कहीं 

सँभल नारी ।

2

दोष खुद का

छिद्रान्वेषी मानव

भीड़ बने हैं।

-0-
https://hindihaiku.wordpress.com/2014/03/23/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9F%E0%A5%87/


टहनी नग्न

पतझर की ऋतु

शाखें वीरान।

2

शाख से टूटे

चुर-मुर का शोर

जर्द पत्तियाँ ।

3

ठूँठ मुस्काया

देख पेड़ की दशा

डाह प्रगाढ़।

4

जीवन- चक्र

पतझर के बाद

सृजन हुआ।

5

नीड़ सघन

मधुमास के पहले

गेह वीरान।

6

असंगत है

पतझर-वसंत

फिर भी साथ।

7

वृक्ष सलोना

हर नोक थी सूनी

कोंपल फूटी।

8

शिशिर बीता

नन्ही-नन्ही कोपल

मुस्करा उठी।

9

जर्द हो पत्ते

पतझर की घड़ी

गाछ लज्जित।

-0-
https://hindihaiku.wordpress.com/2014/04/11/%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AD%E0%A4%81%E0%A4%B5%E0%A4%B0/


1

वृक्ष कटान

हताहत धरती

क्रूर इंसान।

2

सलिल लुप्त

सुबकती धरती

वीरुध -शून्य।

3

धरती पुत्र

नीलाम की अस्मिता

धन बटोर।

4

हृदय–घाव

दिखलाती धरती

खुलीं दरारें।

5

आहत आज

ये वसुमती धरा

दुखित हुई।

6

जेवर वृक्ष

धरती हरी-भरी

गर्व करती।

7

भू-गर्भ-जल

कराहती धरती

अति दोहन।

8

नेह अपार

धरती गदराई

सुधा बरसे।

-0-

( वीरुध= पेड़-पौधे , वनस्पति)
https://hindihaiku.wordpress.com/2014/06/27/%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AC%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80/

1

हृदय -शूल

बनते जीवन के

कुटिल शब्द ।
https://hindihaiku.wordpress.com/2014/07/04/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%87%E0%A4%95%E0%A5%81-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D/


3-सविता मिश्रा

1

मेघ विप्लव

झमाझम बरस

भू त्राहि- त्राहि।

2

चूनर हरी

बूढ़ी  धरा युवा-सी

ओढ़ के चली।

3

सावन आया

मही जवान हुई

मेघ मिलाप।

4

धरा रसीली

सावन लगते ही

उन्मुक्त सृष्टि ।

-0-
https://hindihaiku.wordpress.com/2014/07/18/7532/


-सविता मिश्रा

1

बहन बिना

अँखियाँ अश्रु- भरी

राखी त्योहार   

2

गर्व से फूली

बाँध सैनिक हाथ

बहना प्यार 

3

प्रेम बंधन

बाँधी भाई कलाई

अमोल राखी

4    

बहन प्यार

कच्चा नहीं, फौलादी

रक्षाबंधन

-0-
https://hindihaiku.wordpress.com/2014/08/10/7616/

जुलाई 27, 2018

दोमुँहे-

"मन की"

दोमुँहों से रहना सदा बच के
चलो जरा संभल-संभल के

निंदक तक तो सब ठीक हैं
दुरी उनसे ,जो करते पीक हैं

दोमुँहें  होते हैं घातक बेहद
बचना उनसे मुश्किल है शायद

सामने मुँह पर लल्लो-चप्पो करते हैं
पीठ पीछे वही जहर उगलते फिरते हैं

सांप- छुछुंदर तो हैं आपस में दुश्मन
दोमुँहें तो आपके अपने बन छलते हैं

अतः चलना जरा उनसे संभल-संभल के
वर्ना हाथ मलते रहोगें खड़े हक्के-बक्के । 
सविता मिश्रा
 यूँ ही फालतू बकवास
हो कुछ हास-परिहास😊
:)

पुरानी कविता कमेंट में पड़ी हुई आज किसी के लाइक करने पर मिला💁
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1150622668309320&id=100000847946357

गुरु नमन

हर तरफ तो हैं गुरु बिखरें
किसको-किसको नमन करें
सीख देने वाले  मिलें जहां बहुत
ओ फेसबुक हम नमन तुझे  करें! #सवितामिश्रा

जुलाई 24, 2018

लुटेरे-


समाज में और फेसबुक पर भी कई लुटेरे बैठें हैं।
पैसा हो या आपकी रचना, फटाफट से लूट लेतें हैं।
सब्ज़बाग सपनों का दिखा, करके मीठी-मीठी बात
आपकी मेहनत का फल लेकें धीरे से फूट लेतें हैं। #अक्षजा
24/7/2018

अप्रैल 16, 2018

रहना सीखो-

कल किसने देखा है
क्या होगा !
आज में जीना सीखो 
दूजे के प्रति रुखे
अपने व्यवहार को
तुम बदलना सीखो
सोते सोते दिन बिता रहे हो
तो जरा जागना सीखो
पाप कर्म को पुन्य में
तुम तनिक बदलना सीखो
मान लो सविता की बात
हर एक क्षण तुम जीना सीखो
कल रहे, न रहें हम
आज ही सब से प्रेम से
मिल-जुलकर रहना सीखो |सविता मिश्रा 'अक्षजा'

मार्च 26, 2018

फ़रवरी 22, 2018

कुछ मन की

नया मौसम भी कम ख़ुशगवार नहीं
खिलखिलाइयें कि आप वर्तमान में हैं😜

बस दिमाग है कभी कभी नहीं चलता। 
#sm

--००--

हम तेरे हुए तो क्या! तू मेरा हो जाये तो बात बने!!

#sm मन लागा यार...

--००--

मेरी जिंदगी की शाम हो तो ऐसी हो 
कि 

अभी अभी हुआ भोर हो की जैसी हो। #sm
-
शाम हो अभी अभी हुआ भोर हो की जैसी हो।

दिसंबर 11, 2017

देते हैं ...कुछ यूँ ही

भावों को हम शब्दों में पिरो देते हैं 
विचारों को वाक्यों में तिरो देते हैं
मेरे भावों को भाव देता है जब कोई
संबल मिलता जो लेखन में सिरो देते हैं |

सिरो...ध्यान, रचनात्मक |

"पांच लिंकों का आनन्द" ब्लॉग में सोमवार ११ दिसंबर २०१७ को कमेन्ट में लिखी |

हाँ! हाँ! क्या बात है 
शब्द शब्द लताड़ रहे न जाने किसको किसको 
सोच बैठे कहीं हमको कह के तो नहीं खिसको 
वाह वाह क्या बात है ! लगी कसके चमात है !! सविता ..

मन के हैं शब्द फूटे 
दिल आपका न टूटे 
छंद-बंद से दूर हैं हम 
भाव बस शब्दों में छूटे | किसी ब्लॉग पे लिखी

दिसंबर 07, 2017

कोई बात हो तभी लिखे

कोई बात हो तभी लिखे यह जरुरी तो नहीं
चोट खाए दिल तभी लिखे यह जरुरी तो नहीं
मन का गुबार निकल जाये यह बात जरुरी है
दिल में रखकर दिल जलाये यह जरुरी तो नहीं |..सविता
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कोई ख़ास नामचीन तो पहले भी ना थे पर अब तो हम गुमनाम होना चाहते हैं ! ........सविता मिश्रा
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जैसे ही साँसों  की डोर टूटेगी, अपनी किमत बढ़ जायेगी ! saविता miश्रा
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बेवकूफ पति अपनी पत्नी को घर की मुर्गी साग बराबर समझते हैं और दुखी रहते हैं  और उसे भी दुःख देते हैं  ...!
और समझदार पति अपनी पत्नी को हूर की परी समझते हैं, खुद भी खुश रहते हैं और उसे भी खुशियाँ ढेर सारी देते हैं |

सविता मिश्रा