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अगस्त 08, 2013

माँ तुम यूँ शांत हो कैसे बैठी हो
गीदड़ देखो दहाड़ रहें हैं
अचानक पीछे से वार कर जवानो की
शरीर से गर्दन ही उड़ा रहें हैं
शेरो का देश हैं फिर भी मौन कैसे हो
सब ऐसे ही जब मौन धरे रहेगें तो
गीदड़ तो हम पर राज ही करेगें
एक बार बस सहनशीलता दिखाएँ तो
उसने हमारी भावनाओं का फायदा उठाया
मार भगा सकने की शक्ति हैं
फिर भी हम हाथ बांधे खड़े हैं
माँ हम क्यों ऐसे मौन पड़े हैं
शर्म से हम ऐसे क्यों गड़े है
माँ तू इशारा बस जरा कर दे
या थोड़ी छुट हमको भी दे दे
खून खौल खौल कर उफान ले रहा
कलम पकड़ बस जबान दे रहा
हाथों में अपने भी तलवार दे दो माँ
एक के बदले दस सर ना ला दू तो कहना माँ
माँ तू यूँ क्यूँ मौन पड़ी हो
कितने दरिंदो से तो अब तक लड़ी हो
अपनों के करनी पर शर्मसार हो
या कुछ नयी तरकीब सोच रही हो
अपने बच्चों के सर देख भी खड़ी हो
खून में उबाल नहीं हो रहा क्या माँ
गरजो तुम दहाड़ो तनिक तो जरा
देखो कैसे ना दुश्मन थर्रा दूम दबाये हो भाग खड़ा
...सविता मिश्रा

अगस्त 05, 2013

राजनीती क्यों सभी जगह यही हाल है आरोप प्रत्यारोप गढ़ना तो आम बात है .........
झांकते नहीं अपना गिरेबान लगाते है दूजो पर ही दाग़ हो चाहे जितना वह बेदाग़ .......
सविता मिश्रा

मार्च 30, 2013

हुल्लड़ होली की

सड़कों पर लड़के आवारा बन घूम रहे
शराब के नशे में लड़को को ही चूम रहे ।
सब मिलकर कैसे-कैसे जुगाड़ बना रहे
तिरछी नजरों से लड़कियों को ताड़ रहे |

चीथड़े-चीथड़े हो गए हैं उनके कपड़े
मुख पर वार्निश हैं सारे के सारे चुपड़े
दूर से ही दिख रहे हैं बड़े ही डरावने
देख उन्हें लगी हैं लड़कियाँ दूर भागने ।

लावारिस का गाना गाते हुए बेसुरा
सड़क पर बेताल ही खूब झूम रहे हैं ।
खेलेय गोरी का यार बलम तरसे
गाते-इठलाते इधर-उधर घूम रहे हैं |

कोई तो लग रहे हैं बिलकुल लंगूर
रंगो से खूब निखरा है उनका नूर |
हरे, लाल, पीले रंगों से हैं सरोबार
लजा जाते रंग डाले जब कोई नार |

होली की मस्ती सब पर ऐसी छाई
पी गए सारी भांग लोग और लुगाई |
झूम-झूमकर सारे ही लोटपोट हो रहे हैं
हँस-हँसकर एक दूजे को रंग पोत रहे हैं |

कभी खड़े हो रहे हैं खूब तन कर
कभी धराशायी हुए पंगु बन कर |

होली के हुल्लड़ में बूढ़ों पर भी
देखो  जवानी 
इसबार ऐसी छाई
मस्ती में खूब झूमें अब बेदम हो पड़े हैं
कराहते हुए शाम तलक चारपाई |
चिल्ला रही है अब खूब उनकी लुगाई
तुम्हें काहे को इस बुढ़ापे में जवानी छाई ।

होली के हुल्लड़ में गम सारे ही भूल गये
बड़े-बुजुर्ग भी होली खेलन पर तूल गये |
ताल से ताल मिले ओ मेरे बबुआ तो, गाकर
जीवन के सारे दुःखों पर देखो डाल धूल गए।
होली के उमंग में उसूल भी अपने सारे भूल गये
बच्चों के रंग में वो रंगकर कूप्पा होकर फूल गए।

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
--००---

मार्च 29, 2013

प्यार के बजाय अंगार दिल में है भरा ~

देश की तरफ आँख उठा कर देखे दुश्मन जो कोई ,
जा पड़े आँख में हम शोला बन उसकी शामत आई।

अब तो हो चुके शहीद स्वदेश पर क्या करें हम में से कोई
जो जिन्दा है उनकी तो जैसे आज देशभक्ति ही है खोई |

भरा है प्यार का दहकता अंगार दिल में हमारे ,
स्वदेश के प्रति सम्मान भरा अधिकार दिल में हमारे |

देश के लिए मर मिटने का जूनून था कभी दिल में हमारे ,
आज स्वप्रेम के मोह में देशप्रेम हो गया है एक किनारे |

आज देश की देख यह हालत गर्व के बजाय अफ़सोस है ,
जिसके लिए मर मिटे हम भूलकर हमें ही वह मदहोश है |

जिस देश के लिए हँसते हँसते खाई हमने अपने सीने पर गोलियां,
उसी मेरे प्यारे देश को बेच रही हैं यहाँ अराजक तत्वों की टोलियां|

खोखला कर स्वदेश को अपना ही घर माल से भर रहें हैं ये नेता
क्यों देश-भक्ति के बजाय भर गयी हैं इनमें इतनी अधिक लोलुपता |

चूमकर झूल गए थे फांसी के फंदे पर कुछ भी न निकली बोलियाँ,
उदास बहुत ये मन बढ़ता हुआ देख देश में गरीबों की खोलियां|

प्यार के बजाय दिल में धधक रही है अब ज्वाला समझो
कहीं ऐसा ना हो कि कब्र से उठकर जला दे हम तुमको | 
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सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई ....भले ही हम पूर्ण स्वतन्त्र नहीं है फिर भी बहुत बहुत शुभकामनायें ................

...पुराना रूप ...

प्यार के बजाय अंगार दिल में है भरा हमारे ,
अपने देश के प्रति सम्मान दिल में है भरा हमारे |
आँख उठा कर जो देखे कोई दुश्मन इसकी तरफ ,
आँख में जा पड़े हम उनके शोला बन चौतरफा |
देश के लिए मर मिटने का जूनून था दिल में हमारे ,
देश प्रेम में आ फांसी के फंदे को भी चूम लिया हमने |
पर आज देश की देख यह हालत गर्व के बजाय अफ़सोस है ,
जिसके लिए मर मिटे हम वह हमें ही भूल मोहपाश में है |
जिस देश के लिए हमने हंसते-हंसते खायी थी ,
सीने पर अपने गोलियाँ झूमे थे फांसी के फंदे पर भी |
उसी देश को बेच खा रहे है यहाँ के नेता ,
क्यों देश-भक्ति के बजाय भर गयी है इनमें इतनी अधिक लोलुपता |
प्यार के बजाय अंगार दिल में है भरा हमारे ,
कही ऐसा ना हो कि कब्र से भी उठ जला दे हम तुमको |
||सविता मिश्रा ||


मार्च 28, 2013

~~सवांर लो अपना परलोक~~

पुण्य-

बूढ़े बच्चे एक समान
करो सेवा उनकी बारम्बार
बूढ़ों के प्रति है अगर सम्मान 
तो बच्चों में बसते हैं भगवान |

बूढ़े-बच्चे की सेवा कर
बढ़ाओ अपने पुन्य कर
बूढ़ा देगा आशीर्वाद तुम्हें
तो बच्चा देगा आदर तुम्हें |

बूढों का आदर कर
सुकून अपार पाओगें
बच्चों में स्वयं भगवान
की झलक देख इतराओगें |

सेवा से मिले शांति
सेवा से ही आती कान्ति
सेवा से ही मिले भक्ति
सेवा में ही अपार शक्ति |

सेवा करके सबका
हो जाओ सबके मन का
पुन्य कर लो तुम इह लोक
सवांर लो अपना परलोक |
|| सविता मिश्रा ||
अप्रैल १९८९

बुरा ना मानो होली है-

८८ -९० में लिखी रचना पेश हैं इस रंगों भरे त्योंहार पर .....


---बुरा ना मानो होली है--

बुरा ना मानो होली है
जीजा साली की डोली है

जीजा बड़े भोले है
पर साली के लिए शोले है|
.....भौजाई के गले में हाथ डाल
.....देवर की यह ठिठोली है
.....बुरा ना मानो होली है
......देवर भौजाई की हम जोली है|
सुन्दरियों को आँख मार
कुमारियों पर रंग डाल
कहते बुरा ना मानो होली है
बेगारो की यह टोली है|
........सफ़ेद पोश एवं काले पोश की
.......सदा से हम जोली है
........बुरा ना मानो होली है
........छुपे रुस्तम की टोली है|
बुरा ना मानो होली है
मिलन की यह टोली है|...सविता मिश्रा

मार्च 15, 2013

====हर पल साथ रहना ओ मेरे प्रभु ====

हर पल साथ रहना ओ मेरे प्रभु
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दुःख दिया है तो बाँट लेना ओ मेरे प्रभु |
दुखी हूँ जब मैं तो साथ देना ओ मेरे प्रभु|
मझधार में जब मैं कभी अटकू बेड़ा-पार करना ओ मेरे प्रभु |
कभी गलत रास्तें पर मैं न चलू तू रास्ता दिखाना ओ मेरे प्रभु |
गलती से भी संकट में फंस जाऊँ तो तू संकट-मोचन बन आना ओ मेरे प्रभु |
दृष्टि-भ्रमित हो जब कभी मेरी तू पथ-प्रदर्शक बन रहना ओ मेरे प्रभु |
दुःख के सागर में जब मैं डूबू तो तू खेवनहार बनना ओ मेरे प्रभु |
सुखों का अम्बर जो दिया है हमें उसमें दुःख की बदली ना देना ओ मेरे प्रभु |
कोई कांटा बिखेरे जो रास्ते में मेरे प्रभु तू उन काँटों को फूल बना देना ओ मेरे प्रभु|
जब कभी दुखी हूँ मैं तो मनमोहन बन खुशियाँ बिखेर जाना ओ मेरे प्रभु ||

||सविता मिश्रा ||
३०/३/२०१२

+++सच्चाई की शक्ति +++

सच्चाई के लिए लड़ते हुए ,
खोया बहुत कुछ ,
पाया !
पाया कुछ भी नहीं |
फिर भी गर्व है खुद पर ,
सर उठा
गर्व से चलते है ,
आँख से आँख मिला कहते है ,
पीछे कदम नहीं हटाते है ,
आगे ही आगे बढ़ते जाते है |
सच कहते है सच्चाई में ,
एक अजीब सी शक्ति है ,
जो ना हमें झुकने देती है ,
ना ही रुकने देती है |
गर्व से सर उठा चलते जाते है,
सच्चाई के लिए लड़ते जाते है | ||सविता मिश्रा ||

मार्च 09, 2013

+चूहे की करामत+


एक चूहे की करामत,
प्रोफाइल -पिक पकड़,

चिपका दिया लें जा यहाँ-वहाँ|
देखा जब हमने उ़स मंच पर सुन्दर सा चित्र ,
लिखा बहुत अच्छा है, काश यह अपना होता |
पर फिर सोचा दो -चार दिन में एकाक चित्र या,
पोस्ट खातिर क्यों हम चिपके यहाँ |
जिस चूहे ने चपकाया था वहाँ
उसी को पकड़ हम निकल गये |

एक भईया ने तो हद कर दी,
जैसे आये वैसे ही ,

दूसरे मंच से जा चपकाया हमको|
हम भी निकले बड़े सयाने,
बिन देखे ताकें,

तुरंत वहाँ से भी खिसक लिए |

यहाँ भी एक छोटे से चूहे ने ही ,करामात दिखाई |
हमें जोड़ने से पहले थोड़ा तो पूछ लिया करो भाई |

जब हम मंचों से चपके ,
कुछ पर तो वहाँ के ,

मेंठो ने स्वागत किया,
कुछ ने तो भाव भी ना दिया |


कुछ ने शिष्टता दिखाई,

यहाँ-वहाँ चपकाने से पहले ,
इजाजत पानी चाही |

हम यहाँ वहाँ चपकने के कारन,
हो गये थे
परेशान ,
अत:कैसे जुड़ते वहाँ साईं |

पता नहीं क्यों नहीं सोचते ,
मंचों के ठेकेदार |

हम ही इस थाली से,
उ़स थाली ढनग रहे ,

  और मेंठ है कि अपनी ,
संख्या बढ़ा ही चहक रहे |

संख्या बढ़ाने के चक्कर में,
ना जाने किसको किसको जोड़ रहे |

अपने सदस्यों की संख्या में ही फूले है,
नहीं जानते यह सब भ्रम के झूले है |

पहले हमें पता ही नहीं था,
कैसे खिसके मंचों से|

जब तक पता चला हमें,
एकाक अच्छे पोस्ट पढ़ चुके थे |

उन्ही एक-दो के कारन,
आज भी जुड़े हुए है |

यह सब तमाशा देख,
सहसा हमें हमारे बुजुर्ग याद आ गये |

सही कहते थे वे कि चूहा भी,
कभी कभी शेर पर भारी पड़ता है |

||सविता मिश्रा ||

फ़रवरी 28, 2013

गम के समुन्द्र में न कभी डूबना
खुशियों नदियों में भी तैरना
आदत है दुनिया की ग़मों को देना
खुशियों के पोखर को भी सहेजना
गमो पर तब खुशियाँ होगी भारी
दुनिया के कवायदों पर फिरेगा तब पानी
|..सविता मिश्रा

फ़रवरी 26, 2013

अड़ियल दिल

समझाने की कोशिश की बहुत दिल को
पर कम्बख्त ना समझा ना ही बहला
सुनहरे पलों को याद दिलाकर बहलाया इसे 
कोई  करता है 
प्यार बहुत ही ज्यादा तुझसे 
पर मूरख था दिल अपना ना समझा ना बहला
 रहा कोसता खुद को मेरी सुनने को कहाँ तैयार भला
उनके एक व्यंग्य  पर इतना टूट सा गया
कि रो-रोकर आँखों को भी सुजा लिया
प्यार भरी बातें  थी जितनी वे
  भूलकर  सभी
 कड़वी बात
एक उनकी दिल से लगा लिया
बहुत समझाया हमने इस नादाँ दिल को
करता है कोई प्यार बहुत ही ज्यादा तुझको
पर अड़ियल था ये दिल अपना
ना समझा 
और ना ही बहला
दिल मेरा अकड़ा था और अकड़ा ही रहा
पूर्वाग्रह में जकड़ा था और जकड़ा ही रहा |
..सविता मिश्रा

फ़रवरी 25, 2013

~पानी पानी होता है~


पानी पानी होता है,
नेता बड़ा नामी होता है
सदा खद्दर पहनता ,
काले कारनामे छुपाता |


लच्छेदार भाषण देकर,
जनमानस को है बहकाता,
हर गुर है जानता परन्तु,
अपनी राष्ट्रभाषा नहीं पहचानता

करता हिन्दी का प्रचार ,
रख अंग्रेजी का आड़ ,
हिन्दी में टाय-टाय फिस,
पढता अंग्रेजी में फिजिक्स |

अंग्रेजी में भाषण देता फटाफट ,
हिन्दी सुनते ही मुंह जाता लटक,
सभी दागते उन्हें सलामी क्योकि
नेता होता है बड़ा नामी |

नेता के इशारे पर होता ट्रांसफर ,
इंजिनियर ,डाक्टर, हो या पोलिस आफिसर ,
दम पर चलते उनके ,
काला बाजार हो या शराब के ठेके |

सफ़ेद पोश की काली छाया ,
पड़ी जिस पर वह उभर कर ना आया,
चुनाव में चलती उसकी गुंडागर्दी ,
जो बोलता उसकी उतरती वर्दी |

भ्रष्टाचार के सौदागर ,
उसके होते हमसफ़र ,
उसके बल पर ही चलता ,
सदा शासन व सत्ता |

इजाजत बैगेर नेता के ,
पत्ता भी नहीं हिलता,
देता नहीं जब तक सिग्नल,
छुटता नही कोई क्रिमनल |

कराते है सांप्रदायिक दंगा,
करते है माँ बहनो को नंगा,
करते है देश की इज्जत का सौदा,
इससे ज्यादा कार्य अब और करगे क्यां भद्दा |

चुनाव में पानी -पानी होता है
फिर भी नेता बड़ा नामी होता है || ३/९०
||सविता मिश्रा ||

फ़रवरी 14, 2013

वेलेंटाइन-डे

वेलेंटाइन-वेलेंटाइन यही हैं सब रट रहें
क्या हुआ हमारी युवा पीढ़ी को जो भटक रहें|
सड़क चलतें,स्कूल-कालेज एवं पार्क में
ढूढ़ते अपना वेलेंटाइन है नजर आ रहें|
हर जगह हर कहीं अब तो यही
वेलेंटाइन-डे ही सब मना रहें|
विरोध करके कुछ लोग ना चाहतें हुए भी
इसी उपयोगिता और भी अधिक बढ़ा रहे|
मना करो बच्चों को कि यह मत करना कभी
और भी उत्साहित हूँ करतें हैं वह काम|
उसी तरह इसका विरोध कर रहे है जो विरोधी
स्वयं ही इसका ना चाहते हुए कर रहें हैं प्रचार|
विरोध ना करके इसका डालो मिट्टी इस पर
करो अपनी ही सभ्यता एवं संस्कृति का प्रचार|
जैसे भड़कती हुई आग जल्दी से नहीं होती शांत
उसी तरह यह भी युवाओं के मन में है धधक रही|
जितना ही रोकेगे रोक लगा इस वेलेंटाइन डे पर
उतना ही ज्यादा भड़केगी विकट रूप लेकर|
पुरानी कहावत है अपनी मिट्टी डालो
उसी को तुम विरोधी भी अपना लो|
अतः शांत हो सोचों एक नयी राह आज
विरोध बंद कर करो अपनी सभ्यता का आगाज|
जिस दिन करना छोड़ दोगे विरोध का तांडव
अपने आप ही शांत हो जायेगा यह फूहड़पन|....सविता मिश्रा

+अंधभक्त +



लकीर पर चलने वाले
बात कब किसकी माने है
बोलो कुछ आस्था विरुद्ध तो
भृकुटी हम पर ही ताने है|
क्या करें मौन रह सब कुछ
सह सुन हम रो पड़ते है
अपनी आस्थाओं को हम यूँ ही
क़दमों में रौद देते है|
आस्था के नाम पर लगती है
मंदिर मस्जिद में खूब भीड़
नहीं किसी का ख्याल करतें
मिलेगें जैसे इन्हें ही प्रभु सीना चीड़|
धक्का मुक्की कर बढतें है
प्रभु के नजदीक ऐसे
प्रभु मिल ही जायेगें इनकों
जो दूसरो को सतायेगे जैसे|
आस्था के नाम पर यही खिलवाड़
और भक्त जाये चाहे भाड़

अक्सर देखा है प्रभु मिलन को देते धक्का
अंधभक्तों से पल्ला पड़ाऔर दिमाक सटका|...........सविता मिश्रा

फ़रवरी 03, 2013

:) रिश्वत का थैला :)