ऐसा कुछ लिखने की चाहत जो किसी की जिंदगी बदल पाए ...मन के अनछुए उस कोने को छू पाए जो इक कवि अक्सर छूना चाहता है ...काश अपनी लेखनी को कवि-काव्य के उस भाव को लिखने की कला आ जाये ....फिलहाल आपको हमारे मन का गुबार खूब मिलेगा यहाँ ...जो समाज में यत्र तत्र बिखरा है ..| दिल में कुछ तो है, जो सिसकता है, कराहता है ....दिल को झकझोर जाता है और बस कलम चल पड़ती है |
फ़ॉलोअर
फ़रवरी 22, 2018
दिसंबर 11, 2017
देते हैं ...कुछ यूँ ही
भावों को हम शब्दों में पिरो देते हैं
विचारों को वाक्यों में तिरो देते हैं
मेरे भावों को भाव देता है जब कोई
संबल मिलता जो लेखन में सिरो देते हैं |
सिरो...ध्यान, रचनात्मक |
"पांच लिंकों का आनन्द" ब्लॉग में सोमवार ११ दिसंबर २०१७ को कमेन्ट में लिखी |
हाँ! हाँ! क्या बात है
शब्द शब्द लताड़ रहे न जाने किसको किसको
सोच बैठे कहीं हमको कह के तो नहीं खिसको
वाह वाह क्या बात है ! लगी कसके चमात है !! सविता ..
मन के हैं शब्द फूटे
दिल आपका न टूटे
छंद-बंद से दूर हैं हम
भाव बस शब्दों में छूटे | किसी ब्लॉग पे लिखी
विचारों को वाक्यों में तिरो देते हैं
मेरे भावों को भाव देता है जब कोई
संबल मिलता जो लेखन में सिरो देते हैं |
सिरो...ध्यान, रचनात्मक |
"पांच लिंकों का आनन्द" ब्लॉग में सोमवार ११ दिसंबर २०१७ को कमेन्ट में लिखी |
हाँ! हाँ! क्या बात है
शब्द शब्द लताड़ रहे न जाने किसको किसको
सोच बैठे कहीं हमको कह के तो नहीं खिसको
वाह वाह क्या बात है ! लगी कसके चमात है !! सविता ..
मन के हैं शब्द फूटे
दिल आपका न टूटे
छंद-बंद से दूर हैं हम
भाव बस शब्दों में छूटे | किसी ब्लॉग पे लिखी
दिसंबर 07, 2017
कोई बात हो तभी लिखे
कोई बात हो तभी लिखे यह जरुरी तो नहीं
चोट खाए दिल तभी लिखे यह जरुरी तो नहीं
मन का गुबार निकल जाये यह बात जरुरी है
दिल में रखकर दिल जलाये यह जरुरी तो नहीं |..सविता
----००------
चोट खाए दिल तभी लिखे यह जरुरी तो नहीं
मन का गुबार निकल जाये यह बात जरुरी है
दिल में रखकर दिल जलाये यह जरुरी तो नहीं |..सविता
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कोई ख़ास नामचीन तो पहले भी ना थे पर अब तो हम गुमनाम होना चाहते हैं ! ........सविता मिश्रा
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----००------
जैसे ही साँसों की डोर टूटेगी, अपनी किमत बढ़ जायेगी ! saविता miश्रा
बेवकूफ पति अपनी पत्नी को घर की मुर्गी साग बराबर समझते हैं और दुखी रहते हैं और उसे भी दुःख देते हैं ...!
और समझदार पति अपनी पत्नी को हूर की परी समझते हैं, खुद भी खुश रहते हैं और उसे भी खुशियाँ ढेर सारी देते हैं |
सविता मिश्रा
----००------
और समझदार पति अपनी पत्नी को हूर की परी समझते हैं, खुद भी खुश रहते हैं और उसे भी खुशियाँ ढेर सारी देते हैं |
सविता मिश्रा
नवंबर 20, 2017
कुछ यूँ ही-
जिंदगी हमारी इधर इक खुली किताब भले ही हो
मगर उसको पढ़ने के सलीके बेहतर रखिये। #सविता मिश्रा #अक्षजा
बस अभी अभी दिल कह गया।
#सोच को रोक सका क्या कोई
--००--
मेरी जिंदगी की शाम हो तो ऐसी हो
कि अभी अभी हुआ भोर हो की जैसी हो। #sm
----००----
बेनकाब हो जाने का जुनून है सर पर
शर्त यह है आइना सा कोई हो सामने |..सविता यूँ ही
---००----
खुद की उलझनों में उलझ कर प्रभु को
भूल जाना इंसानी फितरत तो ना थी
जब जब उलझता है सुलझने के बाद
उसी को याद कर करके शिकवा करता |
---००---
मगर उसको पढ़ने के सलीके बेहतर रखिये। #सविता मिश्रा #अक्षजा
बस अभी अभी दिल कह गया।
#सोच को रोक सका क्या कोई
--००--
मेरी जिंदगी की शाम हो तो ऐसी हो
कि अभी अभी हुआ भोर हो की जैसी हो। #sm
----००----
बेनकाब हो जाने का जुनून है सर पर
शर्त यह है आइना सा कोई हो सामने |..सविता यूँ ही
---००----
खुद की उलझनों में उलझ कर प्रभु को
भूल जाना इंसानी फितरत तो ना थी
जब जब उलझता है सुलझने के बाद
उसी को याद कर करके शिकवा करता |
---००---
जन्म लेते ही पेट के लिए जद्दोजहद शुरू हो जाती है और मरने तक कायम रहती है
😂 पापी पेट का सवाल है। Savita Mishra
👩
चार लाइना
ढेरों कमियां है हम में
इस लिए हम दूर रहते हैं
मिलकर हमसे कहते हैं लोग
हम बड़े ही मगरूर रहते हैं। sm
इस लिए हम दूर रहते हैं
मिलकर हमसे कहते हैं लोग
हम बड़े ही मगरूर रहते हैं। sm
अक्टूबर 01, 2017
मैं सूरज नहीं हूँ~
मैं सूरज नहीं हूँ कि ...
अपनी प्रकाश की किरणें
बिखेर दूँ |
अपनी प्रकाश की किरणें
बिखेर दूँ |
मेरा नाम
अवश्य सूर्य का संबोधन है
पर मैं सूरज नहीं हूँ |
अगर अपने नाम का
थोड़ा भी अंश होता मुझमें
तो मैं भारत में रोशनी बिखेरती |
अँधेरे में प्रकाश फैलाती
अन्धों को रास्ता दिखाती |
अगर अंधकार बस
मार्ग भटकता कोई
तो मैं उसे
अँधेरे से निकालकर
सही रास्तें पर लाती|
मगर अफ़सोस कि ..
मैं सूरज नहीं हूँ |
||सविता मिश्रा "अक्षजा" ||अवश्य सूर्य का संबोधन है
पर मैं सूरज नहीं हूँ |
अगर अपने नाम का
थोड़ा भी अंश होता मुझमें
तो मैं भारत में रोशनी बिखेरती |
अँधेरे में प्रकाश फैलाती
अन्धों को रास्ता दिखाती |
अगर अंधकार बस
मार्ग भटकता कोई
तो मैं उसे
अँधेरे से निकालकर
सही रास्तें पर लाती|
मगर अफ़सोस कि ..
मैं सूरज नहीं हूँ |
सितंबर 29, 2017
सत्य ही लिखो-
लिखो
सत्य ही लिखो !
भले ही वह
थोड़ा कड़वा हो !
सत्य कब
किसे मीठा लगा !
सुनने में भले लगे
बड़ा ही अटपटा
पर सत्य पर असत्य ही
भारी पड़ा है आज !
असत्य को
महत्व दे रहे है जो
सत्य को
कैसे बर्दाश्त कर पायेगें ?
फिर भी बेधडक हो
बिंदास लिखो आज
सहज हो
सत्य का ही उजास लिखो ।
यकीन है हमें
असत्य पर सत्य
विजयी ही होगा
भले थोड़ी देर से सही ...!.
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
सत्य ही लिखो !
भले ही वह
थोड़ा कड़वा हो !
सत्य कब
किसे मीठा लगा !
सुनने में भले लगे
बड़ा ही अटपटा
पर सत्य पर असत्य ही
भारी पड़ा है आज !
असत्य को
महत्व दे रहे है जो
सत्य को
कैसे बर्दाश्त कर पायेगें ?
फिर भी बेधडक हो
बिंदास लिखो आज
सहज हो
सत्य का ही उजास लिखो ।
यकीन है हमें
असत्य पर सत्य
विजयी ही होगा
भले थोड़ी देर से सही ...!.
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
---------------------०० ---------------------
सितंबर 24, 2017
बीएचयू से छनती आती खबरों पर
😊
बन्द मुँह था खोलना नहीं, कहीं कुछ भी था हमें बोलना नहीं
पर चुप न रह सकें देर तक, दिल-दिमाग को अब तोलना नहीं |
बहुत सोचा हमने। बड़े ध्यान से सबको पढ़ा लेकिन ...
मन को अपने मना नहीं पाए
हम हाँ में हाँ मिला नहीं पाए
अराजकता का यह माहौल
हम तो बर्दाश्त कर नहीं पाए।
मन कुछ कहता रहा.....
सवाल उठाने का दिल करता है
जवाब जानने का दिल करता है
बंधन की डोर तोड़ने को है जो आतुर
उन छात्राओं को रोकने का दिल करता है।
दिल से आवाज आई हमारे....
😊
सब बेटियां सदा महफूज रहें
अराजकतावाद से वह दूर रहें
जहां सिंकती हो राजनीतिक रोटियां
ऐसे दकियानूसी विचारों से सदा दूर रहें। #sm #अक्षजा
सुबह से लिखना चाह रहे थे, लेकिन लिख नहीं पाए। मन बेचैन था घटनाओं से। अभी बेटी दिवस की पोस्ट पर दिल की बात कलम तक आ गयी
बन्द मुँह था खोलना नहीं, कहीं कुछ भी था हमें बोलना नहीं
पर चुप न रह सकें देर तक, दिल-दिमाग को अब तोलना नहीं |
बहुत सोचा हमने। बड़े ध्यान से सबको पढ़ा लेकिन ...
मन को अपने मना नहीं पाए
हम हाँ में हाँ मिला नहीं पाए
अराजकता का यह माहौल
हम तो बर्दाश्त कर नहीं पाए।
मन कुछ कहता रहा.....
सवाल उठाने का दिल करता है
जवाब जानने का दिल करता है
बंधन की डोर तोड़ने को है जो आतुर
उन छात्राओं को रोकने का दिल करता है।
दिल से आवाज आई हमारे....
सब बेटियां सदा महफूज रहें
अराजकतावाद से वह दूर रहें
जहां सिंकती हो राजनीतिक रोटियां
ऐसे दकियानूसी विचारों से सदा दूर रहें। #sm #अक्षजा
सुबह से लिखना चाह रहे थे, लेकिन लिख नहीं पाए। मन बेचैन था घटनाओं से। अभी बेटी दिवस की पोस्ट पर दिल की बात कलम तक आ गयी
सितंबर 22, 2017
"मुख रखो बन्द"
न बाबा न
हम तो नहीं कह सकते
कोई ऐसी बात
जो पहुंचाए
किसी को भी आघात।
शिक्षक तो हैं
बच्चों के भविष्य की
नींव की ईंट
सरकारों ने किया
अक्सर उनसे चीट
अव्यवस्था की पड़ी है
उनपर आज भारी मार
साबित करने पर वो तुला
सबसे असहाय है वह किरदार।
खाली पड़ी हैं कई शिक्षक सीट
पास करने की शर्त रखी है नीट
कई कच्ची ईंटें बैठाई गई हैं
तो कई लोना ही खाई हुई हैं
जिन्हें आती नहीं टीचर की स्पेलिंग
वह कर रहें टीचर-सीट की हीलिंग |
ट्यूशन का बढ़ा है कारोबार
कोचिंग-सेंटर हुए हैं गुलजार
जहाँ ठेके पर बच्चें पास किये जाते हैं
भविष्य के साथ खिलवाड़ किये जाते हैं
कैसे बने मंजिल मजबूत
जब मिलावट नींव में ही
बहुत ज्यादा मात्रा में
गहराई तक पाई गई है।
शिक्षण-संस्थाओं में लग गई है घुन
पढ़ाई का रवैया हुआ बड़ा ढुलमुल |
स्कूलों के हालात
बड़े भयावह हैं भैया
मासूम बच्चों को
मारने पर रोक क्या लगी
अब तो वहां बलात्कार
और हत्या तक होने लगी।
न बाबा न
मुख अपना हम
नहीं खोलते हैं
झूठ के खिलाफ हम
सच्चाई को नहीं बोलते हैं।
सविता मिश्रा 'अक्षजा' २१/९/2017
सितंबर 20, 2017
भाषा की मर्यादा..मन की
ग़ुबार
😊
😊
😊
हत्या किसी की भी हो हत्या है। अभी छः महीने में ही कई हत्याएं हुई । अब हमारी जनरल नॉलेज इतनी बढिया नहीं कि हम सारे नाम गिनाकर आपसे पूछे कि आप फला-फला पर क्यों चुप थे।
आईना निहारिये सब जरा । हम सब दोगले हैं। मुखौटा भी एक चेहरे को छुपा सकता है कई नहीं इस युग में हमारे शायद कई चेहरे हैं और सारे चेहरों के साथ जीने के शायद हम अभ्यस्त भी हो चुके हैं।
न जाने क्यों लगता है अपशब्द कहने वाले इन चार पांच साल में हुई सभी हत्याओं को हत्या नहीं मानते हैं । उन्हें उनकी हत्या, हत्या लगती है जिनकी लकीर पर वह चल रहें। या उसकी जिसका समर्थन करने से वह लोगों की नजर में सेक्यूलर साबित हों जाए। और बची हुई जो हत्याएं हुई उसमें हमारी सम्वेदना सो जाती है।
खुशियां मनाने वाले को गाली दो और जब खुद किसी की मौत पर लड्डू बाँटो तो कहो प्रसाद है। यह तो वही बात हुई कि अपने घर की शादी में आप ढोल नगाड़े बजाए तो कानों में बांसुरी बजते और पड़ोस के घर वही बजे तो कान आपके शोर से फटने लगते। आप रह रहकर सारी की सारी गालियॉ उनके हवाले कर देते।
हत्या किसी की भी हो हत्या है। अभी छः महीने में ही कई हत्याएं हुई । अब हमारी जनरल नॉलेज इतनी बढिया नहीं कि हम सारे नाम गिनाकर आपसे पूछे कि आप फला-फला पर क्यों चुप थे।
आईना निहारिये सब जरा । हम सब दोगले हैं। मुखौटा भी एक चेहरे को छुपा सकता है कई नहीं इस युग में हमारे शायद कई चेहरे हैं और सारे चेहरों के साथ जीने के शायद हम अभ्यस्त भी हो चुके हैं।
न जाने क्यों लगता है अपशब्द कहने वाले इन चार पांच साल में हुई सभी हत्याओं को हत्या नहीं मानते हैं । उन्हें उनकी हत्या, हत्या लगती है जिनकी लकीर पर वह चल रहें। या उसकी जिसका समर्थन करने से वह लोगों की नजर में सेक्यूलर साबित हों जाए। और बची हुई जो हत्याएं हुई उसमें हमारी सम्वेदना सो जाती है।
खुशियां मनाने वाले को गाली दो और जब खुद किसी की मौत पर लड्डू बाँटो तो कहो प्रसाद है। यह तो वही बात हुई कि अपने घर की शादी में आप ढोल नगाड़े बजाए तो कानों में बांसुरी बजते और पड़ोस के घर वही बजे तो कान आपके शोर से फटने लगते। आप रह रहकर सारी की सारी गालियॉ उनके हवाले कर देते।
माना हम सब
विचारों से विरोधी हो सकते हैं लेकिन क्या हक है हमें किसी को बुरा कहने का
वह भी सार्वजनिक। यह तो पता है कि बन्द कमरे में आप 100 मे से 90 को गाली
ही देतें होंगे।
कल परसो देखे लोग कंगना रनावत को कांटो की माला पहना रहे थें। एक औरत मुहँ खोले तो आपकी जबान काली क्यों होने लगती हैं।
जागिये बंधुओं विरोध करिये पर मर्यादा कैसे भूल जाते आप।
कल की ही एक पोस्ट पर जवाब देने पर एक महान शिक्षक का मानहत हो गया। वह सब बड़ाई करने वालों का धन्यवाद देने के बजाय हमसे ही दादागीरी करने लगें। ऐसा हमने कई बार कइयों की पोस्ट पर महसूस किया है।
हमें इस बात का बड़ा अफसोस होता है कि लोग अपने मेहमान की इज्जत नहीं करतें।
कोई भी आपकी पोस्ट पर यदि कमेंट करता है और दूसरा उससे बदतमीजी करने लगे तो आपका फर्ज बनता कि आप मेजबान का मान रखे। आपका चुप रहना यह साबित करता कि आप कमेंटकर्ता की बेइज्जती पर फूल के कूप्पा हुए जा रहें। वैसे यह भी एक भारतीयता की पहचान है।
हम अपने सम्मान पर कम दूसरों के अपमान पर ज्यादा ही खुश होतें। क्या करें यही तो भारतीयता की जड़ है। और हम अपनी जड़ को त्याग थोड़े सकते हैं।
हम कमेंट इसी लिए बहुत कम करते हैं। जैसी पोस्ट आप लिखेंगे उस समय जैसा दिमाग में आएगा आदमी बोलेगा। लेकिन सामान्य जवाब पर आपके चमचे चीखने लगे तो ....
😣 भाषा की मर्यादा तोड़ने लगे तो। इसलिए सबसे भला चुप। लेकिन आदमी कब तक मौन रह सकता।
आप क्या समझते हो सामने वाले को गाली नहीं आतीं यदि ऐसा समझता हैं कोई तो वह भारत को देखा ही नहीं। हम भारतवासी तो बिन बात के गाली देते। भारतीय तो कोई गाली गलौज वाली बात हो तो बिना रुके घण्टो चीख चीख कर पूरे मोहल्ले को गाली ज्ञान में पीएचडी करा सकता हैं।
किसी की हत्या पर छाती पीटीए या फिर लड्डू बांटिए लेकिन बस एक काम करिये दूसरों को अशब्द बोलकर मर्यादा की हत्या नहीं करिए। #सविता मिश्रा
कल परसो देखे लोग कंगना रनावत को कांटो की माला पहना रहे थें। एक औरत मुहँ खोले तो आपकी जबान काली क्यों होने लगती हैं।
जागिये बंधुओं विरोध करिये पर मर्यादा कैसे भूल जाते आप।
कल की ही एक पोस्ट पर जवाब देने पर एक महान शिक्षक का मानहत हो गया। वह सब बड़ाई करने वालों का धन्यवाद देने के बजाय हमसे ही दादागीरी करने लगें। ऐसा हमने कई बार कइयों की पोस्ट पर महसूस किया है।
हमें इस बात का बड़ा अफसोस होता है कि लोग अपने मेहमान की इज्जत नहीं करतें।
कोई भी आपकी पोस्ट पर यदि कमेंट करता है और दूसरा उससे बदतमीजी करने लगे तो आपका फर्ज बनता कि आप मेजबान का मान रखे। आपका चुप रहना यह साबित करता कि आप कमेंटकर्ता की बेइज्जती पर फूल के कूप्पा हुए जा रहें। वैसे यह भी एक भारतीयता की पहचान है।
हम अपने सम्मान पर कम दूसरों के अपमान पर ज्यादा ही खुश होतें। क्या करें यही तो भारतीयता की जड़ है। और हम अपनी जड़ को त्याग थोड़े सकते हैं।
हम कमेंट इसी लिए बहुत कम करते हैं। जैसी पोस्ट आप लिखेंगे उस समय जैसा दिमाग में आएगा आदमी बोलेगा। लेकिन सामान्य जवाब पर आपके चमचे चीखने लगे तो ....
आप क्या समझते हो सामने वाले को गाली नहीं आतीं यदि ऐसा समझता हैं कोई तो वह भारत को देखा ही नहीं। हम भारतवासी तो बिन बात के गाली देते। भारतीय तो कोई गाली गलौज वाली बात हो तो बिना रुके घण्टो चीख चीख कर पूरे मोहल्ले को गाली ज्ञान में पीएचडी करा सकता हैं।
किसी की हत्या पर छाती पीटीए या फिर लड्डू बांटिए लेकिन बस एक काम करिये दूसरों को अशब्द बोलकर मर्यादा की हत्या नहीं करिए। #सविता मिश्रा
जून 24, 2017
बोल ~
श्री मुख से
दो शब्द
निकले नहीं कि
मैंने कैद कर लिया
अपने हृदय उपवन में !!
अब हर रोज
दिल से निकाल
दिमाग तक लाऊँगी
फिर कंठ तक
फिर मुस्कराऊँगी
मेरे चेहरे पर
एक अलग सी
चमक बिखर जाएँगी
इसी क्रिया को
दुहराती रहूंगी
क्योंकि
अच्छी यादों को
बार-बार खाद-पानी
चाहिए ही होता है!
और तब जाके
एक दिन
तैर जायेंगी
सरसराहट सी
पूरे तनबदन में
फिर
बेकाबू हो
उड़ चलेगा
पूरा शरीर ही
हल्का-फुल्का हो
आकाश के उस पार!
फिर तुम्हारें ही
महज दो बोल
भारी कर जाएंगे
मन को
और तत्क्षण
ला पटकेंगे मुझे
धरती पर !
क्यों !
होता है न
ऐसा
कभी कभी !
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
---------------------०० ---------------------
जून 02, 2017
हारा मन-
तमस था घिरा
मन में
तन भी था
कमजोर थका
कैसे लड़े बुराई से
वह था ताकतवर बड़ा
उठा पटक चलती रही
तन मन के बीच
मन हारा जब
तन तो था
पहले से ही हार गया
कमजोरी का अहसास
मन को भी मार गया |
||सविता मिश्रा 'अक्षजा'||
मन में
तन भी था
कमजोर थका
कैसे लड़े बुराई से
वह था ताकतवर बड़ा
उठा पटक चलती रही
तन मन के बीच
मन हारा जब
तन तो था
पहले से ही हार गया
कमजोरी का अहसास
मन को भी मार गया |
||सविता मिश्रा 'अक्षजा'||
दरार- muktak
दोगलेपन की भरमार बहुत
दुश्मनों की खरपतवार बहुत
बहुत से लोग शर्तो पर ही जीते
दरो -दीवार में हैं दरार बहुत |
दुश्मनों की खरपतवार बहुत
बहुत से लोग शर्तो पर ही जीते
दरो -दीवार में हैं दरार बहुत |
@सविता मिश्रा 'अक्षजा'यूँ ही
मई 29, 2017
muktak-
बस ऐसे ही ..........
राहों से फूल चुन के कांटे बिछा देते है लोग
कदम आगे बढाओ तो जंजीरे डाल देते है लोग
जबान खोलने पर भी लगा दी है पाबंदिया यहाँ
अच्छो अच्छो की सोहबत में बिगड़ जाते है लोग| सविता मिश्रा 'अक्षजा'
राहों से फूल चुन के कांटे बिछा देते है लोग
कदम आगे बढाओ तो जंजीरे डाल देते है लोग
जबान खोलने पर भी लगा दी है पाबंदिया यहाँ
अच्छो अच्छो की सोहबत में बिगड़ जाते है लोग| सविता मिश्रा 'अक्षजा'
मई 28, 2017
फेसबुकी रस-
इतने !
इतने
😊
इतने गन्दे है हम कि
अच्छे लोग
🐦
पोस्ट पर आते हैं-
समझाने हमको
🐰
पर हमारी ही समझ पर
लानत भेज भाग जाते हैं
😉
कहाँ?
कहाँ क्या!
कुछ ब्लाक करके
कुछ ऐसे ही उलटे पाँव
अपने घर को (वाल)!
और कहाँ!!
😊
फिर??
फिर क्या !
हम भी मन मार
उन्हें महापागल कहके
संतुष्ट हो लेते।
😊
और कुछ ?
कुछ तो
समझा
समझाकर
🐥
समझ के पागल हमे
चुप्पी लगा जाते हैं
☺
☺
तब ?
तब क्या !
उनकी पोस्ट देखकर
हम भी कुछ
अइसने ही समझ
अनदेखा करके
चुप्पे चले आतें !
👻
😁
और जो
पोस्ट पर आते वो!
वो
वो क्या समझ आतें ?
राम जाने !
शायद वो
पागल हमको न माने
हम उन्हें पानी पिलाकर ही
अपनी पोस्ट से देते जाने।
😊
😊
और जो !
सोये पड़े वो ?
उन्हें पानी
पिला पिलाकर
मन करता है
बाहर निकालें !!
क्यों?
क्योंकि
खरबूजे को देखकर ही
खरबूजा रंग बदलता
कुछ मेरे साथ भी
ऐसा ही करतें हैं
फिर हम क्योंकर
न करें!!
😛
हम आत्मियता में
फंसे रहतें
😊
😊
और वो
हमें आँख दिखाते!
हम बर्दाश्त
करें फिर उन्हें
यह हमारी प्रवित्ति
में कहाँ!!
😊
😊
दिल करता
उन्हें उनकी
औकात दिखला दे
😷
भौ भौ करते जो
😊
उन्हें आईना
पकड़ा दें!!
#सविता मिश्रा 'अक्षजा'
एक भैया के कहने पर बाद में मिर्च भी छिटके :P
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