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जुलाई 31, 2014

कष्ट हर एक सरलता से सहे जा रहे है-

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कोमलांगी सुकोमल थे बहुत मगर
कष्ट हर एक सरलता से सहे जा रहे है|

रहम ही करके पाला पोसा है आपको
होके खड़े यूँ तभी आप बोल पा रहे है|

ढहाए हम पर ना जाने कितने ही सितम
क्षमा कर आपको हम मुस्कराते आ रहे है|

नहीं है मलाल ना कोई कडवाहट ही है
भूल सब कुछ सम्मान दिए जा रहे है|

करते नहीं कीमत आप जरा सी हमारी
सर-आँखों पर हम बैठाते आ रहे है|

उड़ाते हो मखौल सदैव कह कमजोर
हम तो गाथा आपकी सुनते आ रहे है|

कही बेबस नहीं थे कभी भी तनिक भी
सर्वोपरि आप ही को मानते आ रहे है|

आइने की तरह रही साफ़ नियत हमारी
आप ही हमें बदनीयती से देखते आ रहे है|

सदियों से समझते रहे अहमक आप हमें
हर रूप में हम आपको आदर देते आ रहे है|


सविता मिश्रा