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नवंबर 29, 2014

सुनहले ख़्वाब बस

 दिल में तो धड़कती हूँ मैं  पर
सांसो में भी फ़ैल जाना चाहती हूँ
किसी ने तीसरी बटन
किसी ने दूसरी
किसी ने सिर्फ बटन कह ही
ख्याली पुल कर लिया तैयार
पति का सानिध्य पाने को........
मैंने भी सोचा ...तोड़ दूँ मैं भी
तुम्हारे शर्ट की पहली बटन
क्योकि मैं सांसो में तुम्हारे बस जाना चाहती थी
टांकने को जब तुम बटन कहो
तुम्हारी सांसो को अहसास कर सकूँ
तुम्हारी आँखों में झांक सकूँ प्यार
तुम्हारी सांसो से अपनी साँस को
मिलाकर सांसो की करूँ एक
प्यारी सी खुबसुरत डोर तैयार
सांसो में मेरे बस जाओ तुम
अपने सांसो के जरिये
तुम्हारे दिल की धड़कन
महसूस करूँ मैं करीब से
जिसमें बसती हूँ शायद सिर्फ मैं
बटन हाथो में लिय खयाली पुल
तुम तक पहुँचने के रही थी बना
तभी एक झटका सा लगा
तुम्हारे गुस्से का शिकार हो गया सपना मेरा
वर्दी की टूटी बटन कैसे पहनू मैं
गूंजी कानो में एक तीखी आवाज
तुम्हारी लापरवाही के कारण
समय पर नहीं पहुँच पाउँगा
उप्पर से अधिकारी सर चढ़ रहे
बडबडाते बडबडाते उनके जल्दी से
रात जो धोयी थी वर्दी
बहाते-बहाते आंसू झट प्रेस कर हाथो में थमा दी
आंसुओ को पास जाने से पहले ही
जब्ज कर लिया आँखों में ही
क्योकि पता है इन आंसुओ की कोई कीमत नहीं
तुम्हें अपनी नौकरी से ज्यादा
कोई भी और चीज प्यारी नहीं
रोज ही ऐसे कई सपनें 
चकनाचूर हो जाते है
सपनों की बगिया में जो फूल सजाये होते है
वह अक्सर ही असमय ही मुरझा जाते है | सविता मिश्रा

नवंबर 24, 2014

मुर्ख -

मुर्ख होता तो
समझ सोच कर
हर एक कदम

संभल संभल कर
सावधानी से बढ़ाता
पर गलती से
समझदार समझ बैठा
ओंधे
मुहं गिरा जब
उठाने को हाथ कम
हंसी उड़ाte daant jtada dikhe
समझदार था
अतः बहुत शर्मिंदा हुआ
मुर्ख होता तो उठता
हँस खुद पर ही
फिर आगे को
बढ़ चलता । सविता

+कन्धा +

इतनी ज्यादा
मोटी हो रही है
कौन ढ़ोंयेगा इन्हें
कंधो पर अपने !
एम्बुलेस मंगा भेजवा देंगे
चिता नहीं अपितु
शवदाह गृह में जलवा देंगे |
tu chinta n karo
jhnjht साड़ी nitva|
आँख चुराते हुए
हाथों से अपने
मुहं छुपाते हुए
बोल रहा था वो!
शायद शर्म तनिक बाकी थी !

बीबी इशारा
करते हुए बोली
बूढ़ी भले ही हैं
माँ तुम्हारी पर
कान बड़े तेज हैं
धीरे बोलो तनिक
लेंगी सुन तो
ज़ायदाद से
हो जाओंगे बेदखल !

सुनकर भी बूढ़ी माँ ने
कर दिया अनसुना |
आकर कमरे में
विफर पड़ी बुढऊ पर अपने !

तुम तो स्वर्ग पधार गएँ
छोड़ मुझे मझधार
बेटे समझते है भार !
दो बेटे और दो दामाद
चार कंधो पर जाने का था अरमान
बच्चों के मिज़ाज देख
जैसे अब ये मुमकिन नहीं !

अतः तुम्हारी बात
टाल रही हूँ
ज़ायदाद सारी मैं
विधवा आश्रम को
भेंट कर रही हूँ !
शरीर की भी
नहीं करवानी हैं
इनसे दुर्गति
इसे भी मैं अभी ही
रुग्णालय को
दान कर रही हूँ !

जिन्हें कंधो पर बैठा
बड़ा किया हमने
उनके कंधो का हल्का
आज भार कर रही हूँ | सविता मिश्रा

नवंबर 16, 2014

माँ तुम कहीं नहीं जाती हो


एक उम्र ढलने के बाद अपने आप अपनी बेटी के लिए अपनी ही माँ की आदतें आ जाती हैं।...... :)

माँ तुम कहीं नहीं जाती हो
बेटी के अस्तित्व में ही बस जाती हो |

माँ तुम
तब तो बिल्कुल नहीं भाती हो
जब मेरी बेटी किशोरावस्था की
दहलीज को लाँघती है
मुझमें बसी तुम तब उसको
उलजुलूल नसीहतें देने लग जाती हो।

जब नातिन जवान हो जाती है
तुम्हारा अस्तित्व जाग जाता है
जो छुपा बैठा होता है
अपनी बेटी के ही अन्दर !

कितनी भी नसीहतें दूँ
नये जमाने की दूँ मैं दुहाई
समझाऊं कितना भी मन को
पर तुम विद्रोह कर देती हो
दोष तुम्हारा भी नहीं
तुम माँ जो ठहरी |

माँ तुम कहीं नहीं जाती हो
यहीं मेरे अस्तित्व में
अपनी बेटी के भीतर
बसी रह जाती हो |

चिता भले जला दी गयी हो तुम्हारी
पर अपनों की चिंता
सताती रहती है तुमको
सुलगती हुई चिंगारी सी तुम
मेरे ही अन्दर सोयी पड़ी हो!

यौवन की दहलीज पर
रखते ही कदम नातिन के
तुम भड़क जाती हो
अस्तित्व में जो सोयी पड़ी थी
एकबारगी जाग जाती हो !

मेरी बिटिया कहती है
कि माँ तुम बदल गई हो
किस्से जो नानी के सुनाती थी कभी
खुद ही तुम उसी में ढल गयी हो।

सविता मिश्रा 'अक्षजा'