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नवंबर 19, 2016

लक्ष्मीबाई के जन्मदिन पर मन की बात

आत्मा सुकून पायेगी ...:)
सभी नारियों और बच्चियों को झाँसी की रानी बनने-बनाने का आह्वाहन!
कभी अंग्रेज सत्ता काबिज करने को लड़ते थे| पर आज के अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम हम भारतीय नारियों पर ही कुदृष्टि डाल रहें हैं| एक गुलाम दूजे को गुलाम बनाने पर तुला| हास्यास्पद हैं यह तो ...| खुद जियो और औरों को भी जीने दो चैन से |
नारियों गुलामी का सख्त विरोध करो मिलकर| तलवार न सही किताबें थामों हाथो में और अपना परचम लहराओं| टूटपुजियें छक्के-छिछोरे, जो हर वक्त ताड़ते हैं आपको , भद्दी टिप्पड़ी करते हैं, मुहं तोड़ जबाब दो उनका .....|
हार्दिक शुभकामना सभी को ...|

और ......
लक्ष्मीबाई की जन्मदिन पर भी हार्दिक बधाई .....| दस स्त्री भी हर जन्मदिन पर उनकी तरह बनना चाहेगी तो उनकी रूह सच में सुकून पायेगी|....सविता

सेवा का फल

Dinesh Tripathi भैया आपकी बात का जबाब ......:)

सेवा का फल-

बड़ी शिद्त्तो के बाद
पति पर शासन कर पाते
ना जाने कितने सालों के
सेवा का फल हम पाते|
चंद दिनों में हम पतिदेव को
अपना आदेश कैसे दे पाते
सालों-साल तपस्या करके
हुक्म फिर हम उनपर चलाते|
शुरू-शुरू में तो डरे सहमे से
एक कोने में खड़े हो जाते थे
जो आदेश मिलता वह
इमानदारी से निभाते थे |
नहीं थे पहले अपने यह तेवर
डर-डर ही जीते थे हम भी
अपमान का घूंट रह-रहकर
कभी-कभी पीते थे हम भी|
अब मुद्दतों बाद
सेवा कर-करके
यह स्तिथि है आई
हुक्म चलाने की नौबत
बड़ी मुश्किल से है पाई|

आज की नवयुवती 
जाते ही ससुराल 
शासन करना चाहती
बन के सास की काल |

वृक्ष को ही जड़ से झकझोर देती 
पति के दिल को भी वह तोड़ देती 
पिज्ज़ा बर्गर सा झट बनता समझ लेती  पकवान 
बीरबल की खिचड़ी बनाने का होता नहीं उसे भान |

जल्दीबाजी की होती उसे होड़  
घर प्यारा अपना देती वह तोड़ |

अकेले रहकर सारा जीवन अपना काट देती 
या फिर रिश्ते को ही टुकड़ों में वह बाँट देती |..
क्षुधा शांत करनी हो गर तो बीरबल सा रखो सब्र 
वरना फिर खोद लो अपने ही मुहब्बत की कब्र |

हर पत्नी की दशा और दिशा ...:) सविता मिश्रा
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12 March 2013 at 18:15 · Like · 1

नवंबर 18, 2016

भुक्तभोगी हैं क्या ...:)


गुरुत्वाकर्षण का नियम कहिये या मंथरा जैसे लोगों की उपलब्धी .....!! बुराई जहाँ, जिससे शुरू होती हैं, घूम फिर के फिर वहीं आ जाती है ....!! बस उसमें नमक मिर्च और हाँ खटाई भी लग जाती है ......!!
उदाहरण बताते चले ...!
जैसे आपने कहा 'यार शर्माइन बड़ी कंजूस हैं, इतने घटिया कपड़ें या चीजें उपहार देती है कि जी करता है कि किसी को दे दे! पहनने लायक होते ही नहीं ....!!
यह बात दुसरे के पास फिर तीसरे के पास पहुंची .......! तीसरे से फिर शर्माइन के पास और शर्माइन फिर गुस्से में तमतमा आपसे आकर बोलेगी कि "तुमने कहा कि हम (शर्माइन) बड़ी कंजूस हैं, इतने घटिया कपड़ें या चीजें उपहार देते हैं कि तुम्हारा जी करता है कि मुहं पर हमारे ही फेंक दो .... ! हम लेने को चाहते है कि कोई हजारों की दे और खुद सौ की भी देने में माई मरती हैं हमारी ....! कैसे कहा ऐसा तुमने ....?"
हिदायत :) कोई शर्माइन मुहँ न फुलाना ....जो कोई शर्मा शर्माइन हो यहाँ :) सविता

नवंबर 15, 2016

जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई (आलेख)


दुनिया में न जाने कितने प्रकार के दर्द हैं। इनमें से जब एक भी प्रकार का दर्द खुद पर पड़ता है, तभी पता चलता कि दर्द में कितना दर्द होता है।
दर्द को भोगे बगैर कोई कैसे जान पाएगा दर्द की इन्साइक्लोपीडिया| उसको जानना हैं तो दर्द तो भोगना ही पड़ेगा| वैसे भी इस जहान में ऐसा कोई नहीं जिसे दर्द से रूबरू न होना पड़ा हो| इधर कोई जिस प्रकार के दर्द से रूबरू हुआ उधर उसको उस दर्द से पीड़ितों का दर्द समझ में आया| 'जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई' कहा ही गया है।
किसी हथियार, या फिर गिरने-पड़ने से तो चोट लगती रहती है| पर इन चोटों के घाव जल्दी भर जाते हैं। लेकिन बातों से जो घाव लगते हैं वे कभी नहीं भरते| हम सब यह सुनते ही रहते हैं कई बार।
बातों की चोट तभी लगती है जब हम मन से घायल होते है| जब हम मन से स्वस्थ होते तो यह बातें महज़ शब्दबाण की तरह दिखती हैं | जिसे हम स्वयं भी दूसरों पर बेफ़िक्री से छोड़ते रहते हैं| परन्तु जैसे ही ये बातें हमारे घायल मन पर पड़ती है तो ये सामान्य सी बातें भी व्यंग्य बाण बनकर सीधे हृदय के विच्छेदन की क्षमता रखती हैं| हमारे अंदर का कोई सूखा हुआ घाव भी हरा हो जाता है, ऐसे व्यंग्यात्मक बाणों से| तभी हमें "जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई" कहावत का अर्थ समझ में आता है|
ऐसा लगता है, कुछ तो ऐसा असामान्य नहीं कहा गया, परन्तु जब तक खुद को न लगे वह शब्द बाण, अपने सूखे जख्म, हृदय के किसी कोने में सुषुप्तावस्था से जागृत नहीं हो जाते, हम नहीं समझ पाते।
बातों की चोट पर एक बात याद आई जो कहावत से ही सम्बन्धित है| कहावत का मतलब तो सामान्य सा ही होता है, पर यदि वह कहावत किसी ऐसे व्यक्ति के सामने कही जाये जिसपर यह कहावत चरितार्थ होती हो, तो उन्हें अवश्य चोट लगतीं है|
वह कहावत है- 'बाँझ बियाय न बियाय देय'। अक्सर आप सभी ने भी सुना ही होगा इस कहावत को, अपने गाँव के अंचल में| कोई जब न खुद कोई काम करे न किसी को कुछ करने दे, ऐसी स्थिति में अक्सर यह कहावत कही जाती हैं गाँवों में। यह कहावत तब तक सामान्य सी लगती थी जब तक हम इसे ऐसो के सामने न कहें जहाँ कोई बाँझ स्त्री हो|
एक बाँझ(गर्भधारण में असक्षम) औरत के सामने इस कहावत को कहते ही आप खुद देखेंगे कि इस कहावत को सुनकर कोई भी बाँझ स्त्री बेइंतहा पीड़ा से भर सकती है। आपको उसकी पीड़ा उसके चेहरे पर उभरती हुई दिख जाएगी| फिर महसूस करिये उसकी पीड़ा!! यदि आप दिल से उस पीड़ा को महसूस करेंगे तो आपको लगेगा कि आप को जैसे किसी जलती अंगीठी पर बैठा दिया गया हो।

यदि दूसरों के दर्द को हम महसूस नहीं कर पाते हैं तो हममें संवेदना का आभाव कहा जा सकता है| किन्तु जिन्दगी के किसी भी मोड़ पर ऐसी कोई बात तो हर इंसान के साथ हो ही सकती है जो उसे दर्द पहुँचाती है| या हर इंसान की दु:खती रग होती है कोई न कोई बात। बस उस दुखती रग पर कभी हाथ रखिये, फिर देखिये। वह आहत होते ही कराहकर कह उठेगा कि जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई!!!

बड़ी बिडंबना है कि हम कोई भी बात तब तक बड़े सामान्य होकर बोल लेते हैं , जब तक उस बात से खुद न आहत होते हो। खुद के आहत होते ही हमें पता चलता है कि हम कितना गलत बोल गए..! फिर लाख माफ़ी मांगकर भी व्यंग बाण से हुए दिल के घाव नहीं भर सकते हैं..! भले ही कितनी भी कोशिश क्यों न करें।

कई कहावतें ऐसी हैं जिनका अर्थ बड़ा सीधा और सरल सा है| पर कहावत बड़े टेढ़े अंदाज में कही गयी है| जैसे कि 'भैंस के आगे बीन बजायें, भैंस खड़ी पगुराय', 'अंधे के आगे रोये, अपने दीदे खोये, 'या फिर '
कुत्ते भौंकते रहते हैं, हाथी चलती रहती अपनी राह' |
बड़े बड़े घाव किये है ऐसी ऐसी कहावतों ने| और ऐसी कहावतें यह कहने को भी मजबूर करती हैं कि जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई|
--सविता मिश्रा

नवंबर 10, 2016

सामयिक घटनाक्रम पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी-(नोट की चोट)

मोदी भैया यहाँ दो दिन सब की ढ़ोल बजाने के बाद टोक्यो में बड़ी ख़ुशी से ड्रम बजा रहे हैं | देख के लगा कि उन्हें इस तरह बड़ा मजा आ रहा है| और यहाँ विरोधी से लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले तक...अरे इस बात से याद आया कि कहाँ हैं हमारे अन्ना चाचा .. बहुत दिनों से दिखे नहीं ..? हम तो समाचार घंटो देखे |

देश में इतनी उथल-पुथल हो गयी| और वह बाल्मीकि की तरह बिलकुल शांत हैं| तपस्या रत हैं लगता है| जो शांत थे वह दुर्वाषा रूप में दिख रहें हैं | दो दिन में न जाने कितनी गृहणियां दुर्वाषा बनकर मोदी भाई पर अपने मुख से अग्निवाण बरसा चुकी हैं| एक जन विश्वामित्र बनने की कोशिश में थे दो दिनों से, लेकिन आज वह भी मुखर हुए| कह रहे थे कि उन्हें समझ ही नहीं आया कि 2000 के नोट चलाकर भ्रष्टाचार कैसे रोका जा सकता है|

सबकी राजनीतिक बहनजी कह रही हैं कि श्री मोदी जी अपने 100 साल के खर्चे के लिए पैसे विदेश में छुपा आए| हमें भी अफ़सोस है। मोदी भैया को ख्याल रखना चाहिए अपने भाई बन्धुओं का भी|

हम जनता का क्या है, किसी न किसी तरह तोड़-मोड़कर अपनी जुगाडू राह निकाल ही लेंगे| परन्तु चुनाव आ रहें| आप अपने खर्च का इंतजाम तथाकथित ही सही, कर लिए और सब अपने संगी-साथियों को मौका ही न दिए| इतनी बड़ी नाइंसाफ़ी कर कैसे सकते भई आप !

हम सोच रहें है और विनती भी कर रहें प्रभु से, सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं आप सभी के लिए भी कि वहीं टोक्यो में ही बजा लीजिए। अरे बाबा ड्रम, फालतू ही न सोच लिया करें आप सभी | अधूरी लाइन पढ़ना सोच के लिए घातक हो सकती है|

मतलब जितना मन करे, उतना ड्रम जोश से वहीं बजाइए। फिर आकर अपने देश में मत बजा डालियेगा सबकी| बड़ी मुश्किल से लोग तोड़ निकाल रहें हैं आपके सुर-संगीत की| भ्रष्टाचार से उबरने के आपके इस अभियान में कितनी बेतुकी राहें अपनाए हैं लोग, आप न जानेंगे| अपने ही करारे नोटों को घाटे में देकर तुड़े-मुड़े से सौ-पचास के नोट लेकर अपने लाकर में रखने का दर्द आप क्या जानें| समचार पढ़-सुनकर आप जान भी गए होंगे, पर समझेगें नहीं|

दो हजार के नोट के रूप में मंजिल तो आपने सबकी तय कर दी है एक महीने समय देकर| अब तो मंजिल पर पहुँचना मज़बूरी है सबकी| रास्ते में ही अटक भी गए यदि मंजिल समझ, तो वह रद्दी बन कर रह जाएगी ३० दिसम्बर तक | अतः सब भले ही संकरे, छोटे, कांटे भरे रास्ते चुनें लेकिन मिलेंगे आपकी बनाई मंजिल पर ही| उसके लिए अपनी ब्लैक में से व्हाईट के लिए जरा कुर्बानी भी देंगे ही|

आपने स्वच्छ भारत का सपना नोटों के लिए भी साकार कर ही दिया हैं | यकीन करिए, जनता हर हाल में चाहती है कि यह स्वछता कायम रहें | जनता से अलग हटकर जैसे ही आदमी कुरता पायजामा पहनकर नेता बन जाता है, वह स्वछता भूलकर ब्लैक होने लग जाता है| उसके काले होते ही उसकी परछाई जिस जिस पर पड़ती है वह भी उन्ही के रंग में रंगता जाता है| जबकि सब देशवासियों का दिल कहता है कि रे नेता, न कर, न कर, गंदा तन-मन-धन! पर दिमाग़ है कि इस भ्रष्टाचार के खेल में रंगता हुआ देश की धरती को अस्वच्छ कर देता है | #सविता