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नवंबर 19, 2016

सेवा का फल

Dinesh Tripathi भैया आपकी बात का जबाब ......:)

सेवा का फल-

बड़ी शिद्त्तो के बाद
पति पर शासन कर पाते
ना जाने कितने सालों के
सेवा का फल हम पाते|
चंद दिनों में हम पतिदेव को
अपना आदेश कैसे दे पाते
सालों-साल तपस्या करके
हुक्म फिर हम उनपर चलाते|
शुरू-शुरू में तो डरे सहमे से
एक कोने में खड़े हो जाते थे
जो आदेश मिलता वह
इमानदारी से निभाते थे |
नहीं थे पहले अपने यह तेवर
डर-डर ही जीते थे हम भी
अपमान का घूंट रह-रहकर
कभी-कभी पीते थे हम भी|
अब मुद्दतों बाद
सेवा कर-करके
यह स्तिथि है आई
हुक्म चलाने की नौबत
बड़ी मुश्किल से है पाई|

आज की नवयुवती 
जाते ही ससुराल 
शासन करना चाहती
बन के सास की काल |

वृक्ष को ही जड़ से झकझोर देती 
पति के दिल को भी वह तोड़ देती 
पिज्ज़ा बर्गर सा झट बनता समझ लेती  पकवान 
बीरबल की खिचड़ी बनाने का होता नहीं उसे भान |

जल्दीबाजी की होती उसे होड़  
घर प्यारा अपना देती वह तोड़ |

अकेले रहकर सारा जीवन अपना काट देती 
या फिर रिश्ते को ही टुकड़ों में वह बाँट देती |..
क्षुधा शांत करनी हो गर तो बीरबल सा रखो सब्र 
वरना फिर खोद लो अपने ही मुहब्बत की कब्र |

हर पत्नी की दशा और दिशा ...:) सविता मिश्रा
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12 March 2013 at 18:15 · Like · 1

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