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सितंबर 28, 2014

~कृपा बरसा जाना ~


धर्म विरुद्ध ना चले कभी हम
 मार्गदर्शन मैया तू सदा करती रहना ...
 हम तो तेरी ही संतान है
करम सदा हम पर बनाये रखना ..
माना मानुष तन में रह हम खुद पर
 गर्व कर बैठते कभी
 
कभी इतरा जाते है ..

तू तो सर्वव्यापी, सर्वशक्तिशाली हो तुम
जगतजननी और पालन हारी भी हो मैया ....
नादां-सा बालक समझ तू 
 क्षमा कर हमको अपना बना लेना ....
भटक गये जो हम सत्कर्मों से अपने
 सच्ची राह हमें अवश्य ही दिखा जाना ...
मैया तू  कृपा अपनी हम सब पर
इस नवरात्रे अवश्य ही बरसा जाना ......सविता मिश्रा

जय माता दी ...........आप सभी को नवरात्री की हार्दिक बधाईयां .....

===दिल की गहराइयों से === : ++त्यौहार क्यों मनातें हो ++

===दिल की गहराइयों से === : ++त्यौहार क्यों मनातें हो ++: त्यौहार तो अब हम क्या कैसे मना यें सब दिन तो सूखी नमक रोटी खा यें | फिर किसी तरह त्यौहार के खातिर पैसा जुटा यें थैला ले जरा बाजार हो अपना ...

सितंबर 26, 2014

===दिल की गहराइयों से === : ~प्राणवान दुर्गा~

===दिल की गहराइयों से === : ~प्राणवान दुर्गा~: स्कूल के प्रांगण में ही कोलकत्ता से कलाकार आते थे माँ दुर्गा की मूर्ति बनाने| सब बच्चें चोरी-छिपे बड़े गौर से देखते माँ को बनते| ऋचा को तो उ...

सितंबर 18, 2014

गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ~


गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी
जिह्वा भी गुस्से की ही भेंट चढ़ गयी
एक गुस्से में बोले एक तो दूजा चार बोलता
जिह्वा बेचारी सबके सामने शर्मसार हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ............

गालिया बकते एक दूजे को अचानक
आपस में ही मारामार हो गयी
एक ने चलाया हाथ दूजा करे पैर से वार
देखते देखते कुटमकाट हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........

एक ने सर फोड़ा तो दूजे ने हाथ तोड़ा
आपस में ही काटम काट हो गयी
एक ने लाठी उठाई तो दूजे ने पत्थर चलाये
देखते ही देखते खून की नदिया बह गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........

जब तक आपस में लड़ थक कर चूर ना हुए
धुल धरती की चाटने को मजबूर ना हुए
तब तक एक दूजे के खून के प्यासे रहे बने
मानवता यहाँ शर्मसार हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........

होश आया तो शर्म से आंखे झुक गयी
अपनी करनी पर पश्चाताप बहुत हुआ
गाली गलौज कब हाथापाई पर ख़त्म हुई
गुस्से पर गुस्सा प्रभावी ना जाने कब हुआ
गुस्से से गुस्से की तकरार जब हुई
गुस्से से गुस्से की तकरार हुई
तकरार हुई ....................
+++ सविता मिश्रा +++

सितंबर 09, 2014

~फूल की चीख~

गुड्डी दौड़ी दौड़ी झट फूल तोड़ लाई
माली को भी अपने पीछे पीछे भगाई|

गुड्डी नन्हें नन्हें पाँव से हारी
माली पड़ गया उस पर भारी|

गुड्डी का पकड़ कान उमेठा ही कि
दर्द से गुड्डी खूब तेज चीखी चिल्लाई|

माली बोला देख इतना दर्द तुझे हो आई
सिर्फ कान पकड़ने भर से तू इतना चिल्लाई|

फूल की सोच जिसको तूने बेदर्दी से तोड़ा
डाल से तोड़, यूँ रौंद करके उसको छोड़ा|

गुड्डी ने मानी गलती और बोली
आगे से कभी फूल नहीं तोडूगी|

अब तो दूजो को भी दूंगी यह सीख
फूल तोड़ उसकी निकालो ना चीख|....सविता मिश्रा

सितंबर 03, 2014

अतीत की दस्तक

दरवाजे पर कितने भी
ताले लगा बंद कर दो
पर अतीत आ ही जाता है
ना जाने कैसे
दरवाजे की दस्तक
कितनी भी अनसुनी करो
पर अतीत की दस्तक
झकझोर देती है पट
एक-एक कर यादों के जरिये 
आती जाती है
मन मस्तिक पर पुनः
वही अकुलाहट, हंसी
एक क्षण में आंसू
दूसरे ही क्षण ख़ुशी
बिखेर जाती है
हमारे आसपास
देखने वाला
पागल समझता है
उसे क्या मालुम
हम अतीत के
विशाल समुन्दर में
गोते लगा रहे है
वर्तमान की
छिछली नदी को छोड़|..सविता

सितंबर 01, 2014

यूँ ही मन की बात

..शिक्षा प्रेम की
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१..शिक्षा प्रेम की पर नफरत बढ़ती रही
जिन्दा थी कभी अब लाश होती रही|

२..बेइज्जत नारी की भरे बाजार कर दी
कोफ़्त उस कामी के प्रति जगती रही|

३..हिम्मत दिखाती तो बचा लेती शायद
दिन रात बस यही सोच सोच कुढ़ती रही|

४..अहम् मार सर झुकाए खड़ी चौराहें पर
बुद्धू कह हम पर ही उँगलियाँ उठती रही|

५..स्नेह का आँचल फैला दिया था अम्बर तक
मासूमियत ही अपनी खता बनती रही|

६...कलियों को मसल फेंक दिया अँधेरे में
दरिंदगी के पाश में कई जकड़ती रही|

७..शैतान के अन्दर का जाग उठा इंसान
हैवानियत फिर भी अपार होती रही|

८...दोजख का भी डर काफूर होता गया
दुनिया बढ़-चढ़ कर पाप करती रही|

९...जींस टाप पहन रहती माएं फिगर बनाए
ऐसी नार पुरुषो की नजर में चुभती रही|

१०..दूध का कर्ज चुकाना हुआ मोहाल अब
पिलाया क्या दुनिया कुतर्की होती रही|

११..
क्या  हाल तूने अपना बना डाला सविता
मजलूम कोई तू खुद को कोसती रही| ....सविता मिश्रा

उफ़ गर्मी बहुत है रे

उफ़ ! गर्मी बहुत है रे..
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !
रह-रह के हैसियत दिखलाए
पास खड़ी कितना इतराए 
महंगी-महंगी साड़ी पहने 
तन पर लादे हीरों के गहने 

उफ़ गर्मी बहुत है रे ....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !

निशदिन मंहगे पार्लर को जाए
ख़ुद पर लीपा-पोती करवाए
बालों पर कालिख पुतवाए
नाखूनों पर सान चढ़वाए
दाँत भी डाक्टर से चमकवाए
अपनी हर कुरूपता छुपाए
कृत्रिम सुन्दरता पर भी इतराए

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !
पति की चाकरी पर इठलाए
उसको आला अफसर बतलाए
पति न देता हो चाहे कुछ भाव 
कहे जमीन पर रखने न दे पाँव 
कहती फूलों की सेज पर सोए
पति के दुलार में सुध-बुध खोए
उसके प्यार की क़समें खाए
प्रेम की झूठी तस्वीरें दिखलाए

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !

बच्चो की बड़ाई करते नहीं अघाए 
उनकी कमायाबी की कथा सुनाए
फेल हुए को भी पास बताए
उनकी नौकरी पर भी इतराए 
बिगड़ैलों को संस्कारी जतलाए
अच्छे-खासे रिश्तों को ठुकराए

उफ़ गर्मी बहुत है रे .....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !

सास ससुर ठीक से खाना न पाए
ख़ुद चुप्पे-चुप्पे रबड़ी-मेवा उड़ाए
झूठी सेवा के यश-गान गाए
पीठ पीछे सास को गुच्चि आए
पति के सामने भोली बन जाए
त्रिया चरित्र के रंग-ढंग दिखलाए

उफ़ गर्मी बहुत है रे.....
उस पर ये बेशर्मी बहुत है रे !


सविता मिश्रा 'अक्षजा'