समर्थक

नवंबर 14, 2012

मेरा नाता

जिधर देखती हूँ
गम की परछाइयाँ है
मुहब्बत की डगर में
बस नफरत की खाइयाँ है !!

दुःख को ही बना लिया है
हमने अपना
खुशी तो लगती है
अब भयानक कोई सपना

दुःख से ही है अब
मेरा नाता
खुशी के बदले
गम ही है हमें भाता

दुखी मिलता है
जब कोई अदना
रिश्ता है कोई
लगता है अपना

गम को कहो
कैसे छोड़ दूँ !
किस्मत को भला
कैसे मोड़ दूँ!

किस्मत व गम
जब दोनों ही है पर्याय
तो फिर क्यों करुँ
मैं हाय -हाय

सुख ने तो कुछ पल ही
पकड़ा था हाथ
गम ही ने तो निभाया है
सदा मेरा साथ |

+++सविता मिश्रा 'अक्षजा' +++

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Achchhi rachna

बेनामी ने कहा…

achha

Savita Mishra ने कहा…

धन्यवाद आचार्य भैया ......