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नवंबर 14, 2012

मेरा नाता

जिधर देखती हूँ,
गम की परछाइयाँ है|
ना मुहब्बत की डगर,
ना प्यार की खाइयाँ है |

दुःख को ही बना लिया है,
हमने अपना|
खुशी तो लगती है अब कोई,
भयानक सपना|

दुःख से ही है ,
अब मेरा नाता |
खुशी के बदले,
गम ही है भाता |

दुखी मिलता है,
जब कोई अदना |
रिश्ता है कोई ,
लगता है अपना |

गम को कहो,
कैसे छोड़ दूँ|
किस्मत को ,
भला कैसे मोड़ दूँ|

किस्मत व गम,
जब दोनों ही है पर्याय|
तो फिर क्यों करूँ,
मैं हाय -हाय|

सुख ने तो कुछ ही पल,
पकड़ा था हाथ|
गम ही ने तो निभाया है,
जीवन भर साथ |
+++सविता मिश्रा +++

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Achchhi rachna

बेनामी ने कहा…

achha

Savita Mishra ने कहा…

धन्यवाद आचार्य भैया ......