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अक्तूबर 31, 2016

धनतेरस की हार्दिक बधाई

धन, धन की ओर झुकने को बेताब हैं | सही बात है कि जहाँ लक्ष्मी होतीं हैं पहले से लक्ष्मीजी भी वहीं जाने को बेताब रहती हैं| कुटियाँ वाले को मिठाई कौन भेंट करने पहुँच रहा|
उपहारों में बड़े बड़े गिफ्ट देने निकले लोगो को शायद यह नहीं पता कि जो गिफ्ट उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से खरीदकर दुसरों पर लुटाने जा रहे हैं उनकी कीमत वह समझता ही नहीं है | या पता है पर वह इसे नकारते हुए उपहार भेंट कर रहा उसे, जिसको इसकी जरूरत ही नहीं |
घर के किसी कोने में पड़ा रहता हैं वह उपहार उपेक्षित होकर | या फिर उपहार स्वरूप ही किसी और के घर की शोभा बन जाता हैं जाकर |....इससे अच्छा गरीबों को दे वह खुश भी और लाखों दुआए भी|
 पर हाय रे इंसान तू कभी ना सुधरा ......| अब क्या सुधरेगा ....| धन की बर्बादी और व्यापारियों की आबादी पर दुखी आत्मा ..| सविता

आप सभी को धनतेरस की हार्दिक बधाई|  कल किसी पर तो धन वर्षा होगी ही ..:)

कलयुगी भगवान् भी ना जाने कैसे कैसो पर मेहरबान हैं आजकल :) :)

अक्तूबर 21, 2016

~~मन को जो भाये वो करिए~~मन की बात या फिर कहें गुबार :)


जो मन भाये वो करिए, बस मर्यादा में रहिये|
तोड़ने की जिद न हो, हों सकें तो जोड़ते रहिये|

कोई भी व्रत-उपवास अच्छा ख़राब नहीं होता है| न हमारी रीतियाँ- परम्पराएँ अच्छी -ख़राब है!! हाँ इसे न मानने वाले खराब और मानने वाले अच्छा कहते रहतें हैं गाहे-बगाहे|
फेसबुक पर हुई व्रतों की निंदा- और गुणगान साबित करते है कि सब तरह की सोच वाले हर कहीं पर हैं | घर हो, समाज हो, चाहे यह मायावी दुनिया|
करवाचौथ और तीज दोनों ही व्रत अपने आप में महत्वपूर्ण है| तीज जहाँ बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश में ज्यादा मान्य है वही करवाचौध टीवी के कारण पुरे भारतवर्ष में प्रचलित हैं| तीज जैसा महत्वपूर्ण व्रत पश्चिम की तरफ किसी को पता ही न शायद|
कितने सारे व्रत बच्चों और पति के सुख,समृद्धि, आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य के लिए रखे जाते हैं| कई व्रत प्रचार-प्रसार के अभाव में न जाने किस घुप्प कुँए में जा फंसे हैं|
अतः ऐसा लगता है कि महिमामंडन पर सब निर्भर| जिन्दगी से जुड़ी चीजें हो या समाज से जुड़ी, प्रचार मायने तो रखता हैं!! जिसके बारे में कोई बतायेगा नहीं , जागरूक नहीं करेंगा, कोई नहीं जान पाएंगा | बुराई- हो या गुणगान दोनों ही प्रचार का हिस्सा बनते है, न कि किसी रीति-कुरूति पर रोक लगाते है| नास्तिक टाइप के लोगों को भी किसी के विश्वास पर कुठाराघात कभी नहीं करना चाहिए| क्योंकि जिसका विश्वास जिस किसी में है, वह करने में बुराई है ही न| चाहे वह तथाकथित पाखंड ही क्यों न हो|
व्रत तो हमारे जीवन में रंग भरते| व्रत रहे न रहे कोई परन्तु आडम्बर का नाम न दे इसे ...| बहुत दुःख होता है, यह सुन -देखकर..| यह बात सही हैं कि सारे व्रत पहले भी रखे जाते रहें हैं, आज बस इनका महिमामंडन हो गया है| अच्छा है न आजकल की नयी पीढ़ी सहर्ष स्वविकार कर रहीं हैं| कितना भी हम कहें कि नयी पीढ़ी परम्पराओं से दूर भाग रही, परन्तु न जाने क्यों ऐसा लगता नहीं है| मंदिरों में भीड़, बजारवाद के कारण ही सही बाजारों में त्यौहार -व्रत के दिन भीड़ साबित करती है कि नयी पढ़ी और ज्यादा अधीरता से हमारी पुरानी परम्परा की नींव को मजबूत कर रहीं हैं|
अभी बीते समय में यहाँ फेसबुक पर पितृपक्ष को लेकर जब जंग सी छिड़ी थी| माता-पिता का तिरस्कार करके, उनके मरने के बाद श्राध को आडम्बर कहके औचित्य पर सवाल उठाया रहा था| जरुरी थोड़े जो अपमान कर रहें थे, वह यह आडम्बर करते हैं | श्रद्धा से जो अपने माँ-बाप का श्राध कर रहा है, जाहिर है उसे बहुत बुरा लगता होगा ऐसा कुछ पढ़कर,सुनकर|
सवाल था कि जो आदमी जीते जी सुख शांति न दिया वह मरने पर क्या करेगा शन्ति के लिए| लेकिन शायद अपने माता-पिता का तिस्कार करने वाले लोग भी डर से करते कि कहीं माँ बाप भूत बन न आए...| सब दिखावा होता या डर या मन की सन्तुष्टि!! राम जाने!! पर यह उनकी अपनी इच्छा हैं| वैसे भी भय बिन प्रीत हुई कब है!! वह जिन्दा रहते हो या मरने के बाद, परोक्ष रूप से तो भय ही छुपा होता हैं न | चाहे समाज का भय या फिर मान्यताओं का|
हर धर्म के लोगों में श्रद्धा होती है अपनी-अपनी ढंग की | हिन्दू धर्म में भी वही श्रद्धा परम्परा चली आ रही है!! फिर हिन्दुओं में आपस में ही इतना विरोध क्यों? यह सच है कि कई लोग कई परम्पराओं, रीतियों ( कुरीतियों नहीं कहेंगे) को नहीं मानते, पर मानने वालों का विरोध भी नहीं करना चाहिए| हाँ तरीके से यानि मर्यादा विरुद्ध हो तो टिप्पड़ी जरुर करें परन्तु उनका विरोध हरगिस नहीं करियें !!
माना कई चीजें अन्धविश्वास है.हमारी नजर में , दूसरों की नजर में हो सकता है वह विश्वास हो| हम जिस चीज पर विश्वास कर रहे हो सकता है दुसरा हमें अन्धविश्वासी मान रहा हो| कुल मिला के अपनी राय रखना अलग बात है, परन्तु किसी के विश्वास को कटु शब्दों में अन्धविश्वास कह देना अलग बात|
मन की शांति के लिए उस अन्धविश्वास में यदि कोई विश्वास जमाये है, तो बुरा क्या हैं ..? उससे आपको कोई तकलीफ तो है न| मन के संतोष के लिए ही तो आदमी इतनी भागादौड़ी करता है| किसी को अपनी परम्पराएँ अपनी रीति को निभाने से संतोष मिल रहा, तो बुराई भी न| उनके संतोष में आपको बुराई भले नजर आयें पर यह उनके लिए शायद बड़े पुण्य का काम हो| अतः जब तक किसी भी परम्परा से किसी दुसरे को शारीरिक तकलीफ न हो, उसे करने से रोकने का हक किसी को भी नहीं है|
ऐसे तो पितृपक्ष पर सवाल उठाने वाले मरने के बाद क्रियाकर्म जो होता, फिर जो १३ दिन का पूरा कार्यक्रम होता है, उस पर भी सवाल उठा सकते हैं| सवाल उठाने के लिए तो हिन्दूधर्म क्या, सभी धर्मो में हजार मुद्दे है| यहाँ हमारी युवा पीढ़ी अवश्य भटक गयी है ! शायद उसका कारण है समय की कमी| वह हर काम फटाफट चाहती है, पर यह तेरही तक का शोक कार्यक्रम जल्दी तो नहीं ही निपट सकता| हां साल भर के झंझट से वह मुक्त होना चाहती है| फिर भी ठीक है, जितना श्रधा से हो जाये अच्छा है| यह उसकी भी श्रधा की बात हैं न|
सब चीजो पर सवाल उठाने सवाल वाले उठा सकते है..!! व्याह हो, मुंडन हो, जनेऊ हो, व्रत हो, पूजा हो सब में दिखावा भारी पड़ रहा| शादी व्याह में होने वाले पांच -छ फंक्शन!! ..सब आडम्बर ही तो है ..| किन्तु सबका प्रतिकार तो नहीं होना चाहिए न | आपके लिए आडम्बर परन्तु दुसरे के लिए वह पल ख़ुशी, सौहार्द के पल होते हैं|
पूजा पाठ ...के लिए 'रैदास तो कह गयें हैं कि मन चंगा तो कठौती में गंगा ..' लेकिन फिर भी सभी धर्म के धर्म स्थलों पर इतनी भीड़ क्यों होती फिर ..?? सब विश्वास और भावनाओं के कारण ही न|
ग़रीब तो सबसे बड़े आडम्बरी ही होते...| ऐसा स्वांग रचते जैसे बड़े बीमार और निहायत ही गरीब हैं, पर लाखों के मालिक होते कई, फिर भी भीख मांगते फिरते ...| ऐसे मुहँ बना के सामने हाथ पसार खड़े हो जाते कि आदमी अपनी हाड-पसीने की कमाई उन्हें मुफ्त में खिला दे..| कभी कभी लगता है क्यों खिलाये मुफ्त, इन हट्टे-कट्टो को ..| फिर भी आडम्बर है जहान में ..| परम्परा भी है गरीबों को भोज कराने की| कई शिद्दत से निभाते है इसे भी ..| इसी कारण शायद आजकल हर दूसरा आदमी एनजीओ खोल के व्यापार करने लग पड़ा है ....| दान देने वाले उन्हें दान देकर पुण्य कमा रहे हैं |
व्यक्ति और परिस्थिति के अनुसार आडम्बर, श्रद्धा और श्रद्धा आडम्बर कहलाता रहता| फ़िलहाल हमारी परम्पराएँ कुछ तो कहती ही है..राज गहरा है, विरोधी लोग क्या समझे, जब समर्थक भी सही से समझ न पाए अब तक| परम्पराओं को अन्धविश्वास, आडम्बर कहने की दौड़ में हम शायद मूल को भूल, शूल की राह तैयार कर रहे| मर्यादा में रह परम्पराएँ निभ रहीं हैं तो निभाने दीजिए न|
'जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तीन तैसी' ! लोग हर बात पर यह घिसापिटा राग अलापते हैं! आज हम अलाप रहें हैं, अपने इस लेख में| आपको जहाँ भी लगे हम गलत है इस कहावत को हम पर थोपते जाइए |

अक्तूबर 03, 2016

~~ मेरी कलम~~

मैं तो कुछ भी ना थी,
तूने ही तो हमें

कुछ बना दिया।
जो छुपे थे भाव
दिल की गहराइयों में,
तूने ही उन्हें
सार्थक शब्दों से बूना।

भावों को मेरे शब्द दिया,
मूक भावना को मेरे
उनका अर्थ दिया।
स्वयं भी थी मूक
पर कागज पर आते ही,
विद्रोही,पीड़ित बनी
एवं हमें भी तूने
कुछ यूँ ही बना दिया।
तूने मुझे ताकत दी हिम्मत दी,
करूँ कैसे धन्यवाद तेरा
ओ मेरी लेखनी!

कलम थी एक आम
तू भी मेरी तरह,
पर तूने ही हमें
आम से खास बना दिया
तू भी अब मेरे लिए
बहुत ही है खास |
क्योंकि तेरे ही तो
सहारे मैं अल्पज्ञ से,
सर्वज्ञ्य की ओर
बढ़ने की कोशिश में हूँ।

तू भी मेरा साथ देना
ओ मेरी कलम !
मेरी मूक भावना को
आवाज देना ओ मेरी कलम !
मैं तो कुछ भी ना थी,
तूने ही हमें सब कुछ बना दिया।

८/५/२०१२

~जरा चैन से जीने दो~


धरा पर नहीं जीने देते
हमें इन्सान!!
गिद्धों के हवाले है यहाँ सारा आसमान!
धरती पर शैतानो का है बोलबाला
तुम आसमान से आँख दिखाते हो!!
जायें तो जायें कहाँ ?
हमारे पूछने पर
नरक की राह हमें बताते हो!
तुम जब जी सकते हो
तब हमको क्यों नहीं जीने देते हो!
हमसे तुम हो ! तुमसे हम नहीं!
फिर भी जहर का घूंट क्यों पीने देते हो !!

हम नारि
याँ नहीं रहेंगी तो तुम कैसे आओगे
सोचो जरा, कुछ तुम भी विचार करो
ना यूँ दर्द दो हमें धरा और आसमान से
नहीं रह पाएँगी हम इस सृष्टि में
बिना प्यार के इस जहान में
जब तक जिओगे, सर दीवारों से फोड़ोगे
पछाताओगे बहुत, खून के आंसू बहाओगे !

न घर होगा, न होगा घाट कहीं भी
रहना होगा तुमको कहीं वीराने में !
अतः मान लो 'सविता' की बात तुम
खुद जियो चैन से और औरों को भी
जरा चैन से तुम जीने दो
अत्याचार कर नारियों को
यूँ तुम कभी मजबूर मत करो!

वरना होगा बांस और
न बजेगी कभी बांसुरी !
एक-एक कर नारियाँ तुमको ही
जन्म नहीं लेने देंगी कभी भी
फिर हाथ मलते रह जाओंगे
भूले से भी नारियों का संसार न पाओगे!!
सुना ही होगा बुजुर्गो से कभी
नारियाँ जब बदला लेने की ठानती हैं
फिर वह आगा-पीछा नहीं निहारती हैं |...सविता मिश्रा

~तोल मोल के बोल~


तोल मोल के बोल,
शब्द बड़े है अनमोल।
दुखे दिल किसी का ,
मुख से ऐसा कुछ न बोल|

वाणी में अपने अमृत घोल,
कड़वा तू कभी न बोल|

शब्द ऐसे न बोल कभी,
जो घाव कर जाऐ।
अन्दर ही अन्दर दिल का,
जो नासूर बन जाऐ|

निकले न मुख से वह शब्द जिससे,
किसी के मन में मलाल आये।
और सामने वाला दुःखी हो जाऐ ,
शब्द बाण से विचलित हो जाऐ।

शब्द नेक बढाएं मान सदा,
कुटिल शब्द अपमान करा जाएं|

तीर तलवार के घाव भर जाते है,
शब्दों के घाव नासूर बन जाते हैं।
सोच-समझ के ही तू बोल जरा,
कम बोलने वाले ही सबको भाते हैं |

उटपटांग बोल,
समय- समय पर,
दिल को उद्धेलित करते है,
घृणा-इर्ष्या, बदले की आग को,
सदा प्रज्जवलित करते है।

शब्द कहो नहीं ऐसे, जिससे,
किसी को घृणा हो जावे,
कानों में पड़ते ही शब्द,
ह्रदय तार-तार हो जावे|

बोलो ऐसे शब्द जो कर्ण प्रिय हो,
हृदय भी शब्द -सार से प्रफुल्लित हो।

तोल मोल के बोल,
शब्द बड़े है अनमोल।
प्यार के मीठे दो बोल से
दिल के दरवाजे तू खोल|
तोल मोल के बोल...

.~हम बच्चे हैं~


हम बच्चे है, इतिहास पढ़ने में कच्चे है|
पर सदा ही अपनी बात के पक्के है|
इतिहास हैं कि बढ़ता ही जाता है
रोकेंगे हम इसे बढ़ने से
कभी वीर लड़े थे स्वंत्रता को
हम बच्चे इतिहास से लड़ेंगे|

लड़ेंगे भी लेकिन कैसे
लड़ने से इतिहास बढेगा
हमारी लड़ाई भी उसमें
लिख दी जाएगी विस्तार से
रोकेंगे हम फिर कैसे और
बचेंगे इसके हम बोझिल विस्तार से |

यह बढ़ता ही जा रहा
एक परिवार की तरह
हम न लड़ेंगे और
न ही लड़ने देंगे किसी को|

बस इसी तरह रोकेंगे
बढ़ने से इतिहास को|
देंगे अगली पीढ़ी को हम
इतिहास की पुस्तकें पतली|
हम बच्चे हैं इतिहास पढ़ने में कच्चे है|
पर सदा ही अपनी बात के पक्के है| सविता मिश्रा

~छन्नपकैया~


छन्नपकैया छन्नपकैया देखो तो तितली आई
भैया तुम दौड़ो, पकड़ो न उसे वह डर जाई|

छन्नपकैया छन्नपकैया देखो सुनो बंदर तुम भाई
हमसे क्या दुश्मनी, हमसे छीनकर क्यों रोटी खाई|

छन्नपकैया छन्नपकैया क्यों करते चूहें तुम धमाचौकड़ी
बिल्ली मौसी पालूँगा, फिर भूल जाओगे तुम यह हेकड़ी|

छन्नपकैया छन्नपकैया छछूंदर जीजी क्यों इधर आई
मैं डरता हूँ तुमसे, मेरी माँ कितना तुमको समझाई|

छन्नपकैया छन्नपकैया भैया कुत्ते तुम जल्दी घर आना
दिनभर खेलना मुझसे नहीं तुम तनिक भी सुस्ताना |

छन्नपकैया छन्नपकैया रानी मछली जल की
मुझे छोड़ अकेला, तुम अकड़ कहाँ चल दी |

छन्नपकैया छन्नपकैया शेरो की हो तुम मौसी बिल्ली
डरता  देख मुझे तुम उड़ाती हो हमेशा मेरी खिल्ली |

छन्नपकैया छन्नपकैया मेरे प्यारे मिट्ठू तोता भाई
तुम्हारें फायदें सुनकर ही मम्मी तुम्हें घर ले आई |

छन्नपकैया छन्नपकैया खूब दो जानवरों और panक्षी को प्यार
मम्मी पापा कहते मेरे , बदले में तुम्हें भी मिलेगा स्नेह अपार| सविता मिश्रा

अक्तूबर 01, 2016

~नियम कानून में फंसा साहित्य ~कुछ मन की



तकनीकि के जाल में फँसता साहित्य उचित है भी और नहीं भी | उचित उनके लिए जो लिखने की इस तकनीकि को जानते समझते है | अनुचित हम जैसे फक्कड़ो के लिए | हर चीज लिखने का एक नियम होता है| सत्य बात है यह और उसी नियम के कसौटी पर कसा हुआ साहित्य को ही साहित्यकार साहित्य कहते है, और मानते भी है | बाकी को कूड़ा कह वो एक सिरे से नकार देते हैं |

पर हमारा मानना है कि जो दिल से लिखा जाय और दिल तक पहुँच जाय वह सच्चा साहित्य है | भले उसमें तकनीकि खामियाँ क्यों न हो | इससे फर्क नहीं पड़ता है | पर मठाधीश साहित्यकारों को कौन समझाए भला |

दिल से लिखी कविता जब दिल तक पहुँचती है तो उसका शोर फेसबुक पर भी साफ़ साफ़ दीखता है | लोग पसंदगी के साथ शेयर भी करते है | हमें कोई यह बता दें कि क्या किसी साहित्यकार की कविता सामान्यजन ने इतनी ज्यादा पढ़ी और शेयर की है | नहीं बिलकुल नहीं क्योंकि वह कविता शब्दों के खेल में दिमाग का इस्तेमाल कर तैयार की गयी है और सामान्यजन दिमागी खेल नहीं खेलता| वह दिल को भाने वाली कविता , कहानी और कथा पढ़ता और सुनता है |

दिल के खेल में दिमाग कभी ठहरा है क्या भला ! दिल से लिखिए दिल तक पहुँचिये | दिमाग से तो बस दिमाग वालों तक ही पहुँच पाएंगे आप | दिमाग वाले उसमें भी दिमाग लगा आपका छंद विच्छेदन कर देंगे |

माना नियमों को तोड़ना अच्छी बता नहीं है | पर नियम यदि गला घोंटने पर आमादा हों जाये तो तोड़ ही देना चाहिए | आज के साहित्यकार अपनी बात कहने के लिए दिनकर जी की बात करते है पर वह निराला जी को कैसे भूल जाते है भला |

निराला जी ने साहित्य को छंद से मुक्त कर दिया था | विरोध उनका भी खूब हुआ था | लेकिन वह प्रतिष्ठित साहित्यकार है और सदियों तक रहेंगे | यानि आज जो छन्दमुक्त लिख रहें हैं वह कोई नई विधा नहीं लिख रहें बल्कि अपने पूर्वजों की दिखाई राह पर ही चल रहें हैं |

यानि छन्दमुक्त एक ऐसी विधा भी है साहित्य की जिसमें ज्यादातर लोग अपने भाव व्यक्त करते है | भले ही इस विधा को आज के साहित्यकार लोग मानने से इंकार कर दें | आज छन्दमुक्त लिखने वालों की संख्या अधिक हुई है क्योंकि इसे लिखने में भाव की जरूरत होती है और हमारे ख्याल से भाव सभी के पास है | खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदल लेता है, बिलकुल ऐसा ही देखने को मिल रहा है | फेसबुक पर देखा-देखी कई लोग साहित्य की दुनिया में विचरण करने लगे है बेखौफ होकर | बस उस भाव को एक लय में बांधना आना चाहिए | यदि लय- तालसब सही है और लोगों के दिल में जगह बना पाने में सक्षम है आपके शब्द, तो बिलकुल वह कविता ही है | अपना मानना तो यहीं हैं |

राह में कोई फूल बिछाता है कोई काँटा | हमें चाहिए कि काँटों को फूल समझ अपनी राह चलते चले | उचित और अनुचित का प्रश्न ही नहीं उठता है | जो बात छन्दमुक्त लिखने वाले के लिए उचित है वही बात छंदबद्ध लिखने वालों के लिए अनुचित हो सकती है |


जैसा की लोग गुटबाजी कर शोर कर रहें है कि कूड़ा लिखा जा रहा आजकल | तो भैये कूड़ा यदि लिख भी रहें लोग (स्त्रियाँ जैसा कि कुछ बददिमाग साहित्य के रखवाले कह रहें आजकल ), छप रहें है तो न पढ़े कोई उन्हें | हमें तो लगता हमारा छन्दमुक्त नामक कूड़ा ही रिसाइकिल कर कविगण छंदबद्ध कर लेते है | कोई शक आप सबको ! नहीं न ! हमें भी नहीं है कोई शक| क्योंकि इन तकनीकि के ज्ञाताओं को हमने उसे छन्दबद्ध कर शान से पोस्ट करतें देखा है |
फिर छंदमुक्त भी कूड़ा नहीं होता | जो ऐसा कहते है वह निराला जी को श्रद्धा से याद कर लें जरा |
इन दंभ भरने वाले साहित्यकारों के आगे यदि दिनकर जी की भी पंक्तियाँ हम जैसे लोग रख दें तो वह उनमें भी कई कमियाँ निकाल देंगे | अतः अपना मानना है मस्त हों लिखना चाहिए| जितना जैसा समझ आए | निरंतर सीखिए, सीखने की राह में किसी को बाधक न बनाइए |

बिन भाव के नियमों में बंध साहित्य भले लिख लिया जाता हों | पर दिल छूने वाला साहित्य कभी नहीं कोई लिख सकता | यानि भाव बिन नहीं लिखा जा सकता है लेकिन साहित्यिक नियमों के बिन लिखा जा सकता है |
यानि आप खुद समझ सकते कि क्या ज्यादा जरुरी है |

बस तारतम्य अव्यवस्थित नहीं होना चाहिए किसी भी तरह के लेखन में | यह भी न हो कि आप कहें अपने लिखे हुए को गज़ल या दोहा परन्तु वह उनके नियमों से परे हो | मुक्त हो लिख रहें है तो मुक्त ही कहिये फिर उसे|

अपने लेखन में गुणवत्ता का ध्यान हर व्यक्ति अपने हिसाब से रखता ही है | कभी वह लिखने के लिए लिखता है और कभी भावों को शब्द देने के लिए| जरुरी न कि सभी लिखने वाले साहित्यक दौड़ में शामिल ही है| फिर इतना हाय तौबा क्यों ?

भरसक प्रयास करियें नियम में बन्ध लिख सकें और उसे साहित्यधारा में दृढ़ता पूर्वक जोड़ सकें | पर साहित्यकारों से गुजारिस यह जरुर है कि छन्दमुक्त को अनुचित कह अपमान न करें  किसी छन्दमुक्त लिखने वाले का |

यह तो रही मात्राओं की गिनती वाले साहित्य की बात | अब आते है गद्य साहित्य पर |
गद्य साहित्य पर भी तमाम बंदिशे लगा रखी हैं साहित्यकारों ने | हम जैसे लोग तोड़े तो अपराधी जैसा बर्ताव परन्तु यही कोई प्रतिष्ठित साहित्यकार नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर लिखता है तो एक नया नियम बन जाता है |

कथ्य, कथानक,शैली नामक बला भूत सा पीछे पीछे लगा रहता है | कभी कभी लगता कि सिर पर कोई नियम का भार रखा हों तो कोई साहित्य रचना कैसे हो सकती है | रचना तो तब होती है जब हम मन से जुड़े हो लेखन में | कलम पर हमारे कोई भार न हो न ही दिमाग पर | हैं की नहीं !! लेकिन नियम विरुद्ध होते ही आलोचना होने लगती है|


हमारा तो मन करता है कि काव्य की मुई काव्यकता और नियमों को मुआ ही डाले | और लघुकथा के कालखंड को खंड खंड कर डाले | कहानियों में अपने भाव का उन्माद भर डाले |

आलोचना की परवाह नहीं तो दिल को खुली छुट दे दीजिये और परवाह है तो दिमाग को सतर्क करिए |
उदण्ड बनने की सलाह हरगिस नहीं दे रहें हम पर साहित्य रचनाओं को तकनीकि के जाल में न उलझाइये | उचित अनुचित के डर से बाहर निकल अपने भावों को तारतम्यता में ढ़ाल व्यक्त करते रहिये | ..सविता मिश्रा