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अक्तूबर 03, 2016

~जरा चैन से जीने दो~


धरा पर नहीं जीने देते
हमें इन्सान!!
गिद्धों के हवाले है यहाँ सारा आसमान!
धरती पर शैतानो का है बोलबाला
तुम आसमान से आँख दिखाते हो!!
जायें तो जायें कहाँ ?
हमारे पूछने पर
नरक की राह हमें बताते हो!
तुम जब जी सकते हो
तब हमको क्यों नहीं जीने देते हो!
हमसे तुम हो ! तुमसे हम नहीं!
फिर भी जहर का घूंट क्यों पीने देते हो !!

हम नारि
याँ नहीं रहेंगी तो तुम कैसे आओगे
सोचो जरा, कुछ तुम भी विचार करो
ना यूँ दर्द दो हमें धरा और आसमान से
नहीं रह पाएँगी हम इस सृष्टि में
बिना प्यार के इस जहान में
जब तक जिओगे, सर दीवारों से फोड़ोगे
पछाताओगे बहुत, खून के आंसू बहाओगे !

न घर होगा, न होगा घाट कहीं भी
रहना होगा तुमको कहीं वीराने में !
अतः मान लो 'सविता' की बात तुम
खुद जियो चैन से और औरों को भी
जरा चैन से तुम जीने दो
अत्याचार कर नारियों को
यूँ तुम कभी मजबूर मत करो!

वरना होगा बांस और
न बजेगी कभी बांसुरी !
एक-एक कर नारियाँ तुमको ही
जन्म नहीं लेने देंगी कभी भी
फिर हाथ मलते रह जाओंगे
भूले से भी नारियों का संसार न पाओगे!!
सुना ही होगा बुजुर्गो से कभी
नारियाँ जब बदला लेने की ठानती हैं
फिर वह आगा-पीछा नहीं निहारती हैं |...सविता मिश्रा

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