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अक्तूबर 01, 2016

~नियम कानून में फंसा साहित्य ~कुछ मन की



तकनीकि के जाल में फँसता साहित्य उचित है भी और नहीं भी | उचित उनके लिए जो लिखने की इस तकनीकि को जानते समझते है | अनुचित हम जैसे फक्कड़ो के लिए | हर चीज लिखने का एक नियम होता है| सत्य बात है यह और उसी नियम के कसौटी पर कसा हुआ साहित्य को ही साहित्यकार साहित्य कहते है, और मानते भी है | बाकी को कूड़ा कह वो एक सिरे से नकार देते हैं |

पर हमारा मानना है कि जो दिल से लिखा जाय और दिल तक पहुँच जाय वह सच्चा साहित्य है | भले उसमें तकनीकि खामियाँ क्यों न हो | इससे फर्क नहीं पड़ता है | पर मठाधीश साहित्यकारों को कौन समझाए भला |

दिल से लिखी कविता जब दिल तक पहुँचती है तो उसका शोर फेसबुक पर भी साफ़ साफ़ दीखता है | लोग पसंदगी के साथ शेयर भी करते है | हमें कोई यह बता दें कि क्या किसी साहित्यकार की कविता सामान्यजन ने इतनी ज्यादा पढ़ी और शेयर की है | नहीं बिलकुल नहीं क्योंकि वह कविता शब्दों के खेल में दिमाग का इस्तेमाल कर तैयार की गयी है और सामान्यजन दिमागी खेल नहीं खेलता| वह दिल को भाने वाली कविता , कहानी और कथा पढ़ता और सुनता है |

दिल के खेल में दिमाग कभी ठहरा है क्या भला ! दिल से लिखिए दिल तक पहुँचिये | दिमाग से तो बस दिमाग वालों तक ही पहुँच पाएंगे आप | दिमाग वाले उसमें भी दिमाग लगा आपका छंद विच्छेदन कर देंगे |

माना नियमों को तोड़ना अच्छी बता नहीं है | पर नियम यदि गला घोंटने पर आमादा हों जाये तो तोड़ ही देना चाहिए | आज के साहित्यकार अपनी बात कहने के लिए दिनकर जी की बात करते है पर वह निराला जी को कैसे भूल जाते है भला |

निराला जी ने साहित्य को छंद से मुक्त कर दिया था | विरोध उनका भी खूब हुआ था | लेकिन वह प्रतिष्ठित साहित्यकार है और सदियों तक रहेंगे | यानि आज जो छन्दमुक्त लिख रहें हैं वह कोई नई विधा नहीं लिख रहें बल्कि अपने पूर्वजों की दिखाई राह पर ही चल रहें हैं |

यानि छन्दमुक्त एक ऐसी विधा भी है साहित्य की जिसमें ज्यादातर लोग अपने भाव व्यक्त करते है | भले ही इस विधा को आज के साहित्यकार लोग मानने से इंकार कर दें | आज छन्दमुक्त लिखने वालों की संख्या अधिक हुई है क्योंकि इसे लिखने में भाव की जरूरत होती है और हमारे ख्याल से भाव सभी के पास है | खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदल लेता है, बिलकुल ऐसा ही देखने को मिल रहा है | फेसबुक पर देखा-देखी कई लोग साहित्य की दुनिया में विचरण करने लगे है बेखौफ होकर | बस उस भाव को एक लय में बांधना आना चाहिए | यदि लय- तालसब सही है और लोगों के दिल में जगह बना पाने में सक्षम है आपके शब्द, तो बिलकुल वह कविता ही है | अपना मानना तो यहीं हैं |

राह में कोई फूल बिछाता है कोई काँटा | हमें चाहिए कि काँटों को फूल समझ अपनी राह चलते चले | उचित और अनुचित का प्रश्न ही नहीं उठता है | जो बात छन्दमुक्त लिखने वाले के लिए उचित है वही बात छंदबद्ध लिखने वालों के लिए अनुचित हो सकती है |


जैसा की लोग गुटबाजी कर शोर कर रहें है कि कूड़ा लिखा जा रहा आजकल | तो भैये कूड़ा यदि लिख भी रहें लोग (स्त्रियाँ जैसा कि कुछ बददिमाग साहित्य के रखवाले कह रहें आजकल ), छप रहें है तो न पढ़े कोई उन्हें | हमें तो लगता हमारा छन्दमुक्त नामक कूड़ा ही रिसाइकिल कर कविगण छंदबद्ध कर लेते है | कोई शक आप सबको ! नहीं न ! हमें भी नहीं है कोई शक| क्योंकि इन तकनीकि के ज्ञाताओं को हमने उसे छन्दबद्ध कर शान से पोस्ट करतें देखा है |
फिर छंदमुक्त भी कूड़ा नहीं होता | जो ऐसा कहते है वह निराला जी को श्रद्धा से याद कर लें जरा |
इन दंभ भरने वाले साहित्यकारों के आगे यदि दिनकर जी की भी पंक्तियाँ हम जैसे लोग रख दें तो वह उनमें भी कई कमियाँ निकाल देंगे | अतः अपना मानना है मस्त हों लिखना चाहिए| जितना जैसा समझ आए | निरंतर सीखिए, सीखने की राह में किसी को बाधक न बनाइए |

बिन भाव के नियमों में बंध साहित्य भले लिख लिया जाता हों | पर दिल छूने वाला साहित्य कभी नहीं कोई लिख सकता | यानि भाव बिन नहीं लिखा जा सकता है लेकिन साहित्यिक नियमों के बिन लिखा जा सकता है |
यानि आप खुद समझ सकते कि क्या ज्यादा जरुरी है |

बस तारतम्य अव्यवस्थित नहीं होना चाहिए किसी भी तरह के लेखन में | यह भी न हो कि आप कहें अपने लिखे हुए को गज़ल या दोहा परन्तु वह उनके नियमों से परे हो | मुक्त हो लिख रहें है तो मुक्त ही कहिये फिर उसे|

अपने लेखन में गुणवत्ता का ध्यान हर व्यक्ति अपने हिसाब से रखता ही है | कभी वह लिखने के लिए लिखता है और कभी भावों को शब्द देने के लिए| जरुरी न कि सभी लिखने वाले साहित्यक दौड़ में शामिल ही है| फिर इतना हाय तौबा क्यों ?

भरसक प्रयास करियें नियम में बन्ध लिख सकें और उसे साहित्यधारा में दृढ़ता पूर्वक जोड़ सकें | पर साहित्यकारों से गुजारिस यह जरुर है कि छन्दमुक्त को अनुचित कह अपमान न करें  किसी छन्दमुक्त लिखने वाले का |

यह तो रही मात्राओं की गिनती वाले साहित्य की बात | अब आते है गद्य साहित्य पर |
गद्य साहित्य पर भी तमाम बंदिशे लगा रखी हैं साहित्यकारों ने | हम जैसे लोग तोड़े तो अपराधी जैसा बर्ताव परन्तु यही कोई प्रतिष्ठित साहित्यकार नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर लिखता है तो एक नया नियम बन जाता है |

कथ्य, कथानक,शैली नामक बला भूत सा पीछे पीछे लगा रहता है | कभी कभी लगता कि सिर पर कोई नियम का भार रखा हों तो कोई साहित्य रचना कैसे हो सकती है | रचना तो तब होती है जब हम मन से जुड़े हो लेखन में | कलम पर हमारे कोई भार न हो न ही दिमाग पर | हैं की नहीं !! लेकिन नियम विरुद्ध होते ही आलोचना होने लगती है|


हमारा तो मन करता है कि काव्य की मुई काव्यकता और नियमों को मुआ ही डाले | और लघुकथा के कालखंड को खंड खंड कर डाले | कहानियों में अपने भाव का उन्माद भर डाले |

आलोचना की परवाह नहीं तो दिल को खुली छुट दे दीजिये और परवाह है तो दिमाग को सतर्क करिए |
उदण्ड बनने की सलाह हरगिस नहीं दे रहें हम पर साहित्य रचनाओं को तकनीकि के जाल में न उलझाइये | उचित अनुचित के डर से बाहर निकल अपने भावों को तारतम्यता में ढ़ाल व्यक्त करते रहिये | ..सविता मिश्रा

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