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नवंबर 19, 2012

~जमीर को खत्म कर हम जी सकेंगे ~





बात दिल पर लगी थी
बिन घाव के ही
व्यंग वाणों से
घायल हुए थे !
सत्य है देर तक सोते थे
पर अब नींद
गायब सी होने लग गयी है
चिंतामग्न रहते
अपनों के साथ-साथ
जो जुड़े थे दिल से वह भी
आखिर क्या हुआ
जो दूरी बना लिए.....!

होती है तकलीफ
जब बिना बात के ही
कोई ठहराता है गलत
आखिर इंसान है हम !
पूछा अपने आप से बहुत देर तक
कि आखिर क्या गलती की हमने
महसूस किया अन्दर से एक आवाज
कि नहीं !
तुम नहीं गलत हो
जमाना ही ख़राब है
भलाई का जमाना कहाँ रहा
और तुम भलाई करने चली हो !
सोचो खूब सोचो पर
दूसरे नहीं !
अपने विषय में
और करो भी सिर्फ
खुद के लिए ही
गैरों के लिए कितना भी करो पर
एक गलतफहमी
सारे किये करायें पर
पानी फेर देंगी
तब सिर्फ अपयश मिलेगा...
सच भी बोलो पर
जरा संभल के !
क्योकि सच कड़वा ही नहीं
बल्कि खतरनाक होता है
सच बोलने पर तुम्हारा
कौन होगा सोचो जरा
झूठ बोलना भी सीखो
जरा मक्खन भी लगाना आना चाहिए
चमचागिरी तो आनी ही आनी चाहिए
वर्ना जिन्दगी का सफ़र मुश्किल ही है
यह गुण आ गए तो देखना
आगे-पीछे भीड़ ही भीड़ होगी
लोग तुम्हे हँसाने की जुगत लगायेंगे
अकेले बैठ यू नहीं तलासोगी खुद को
बस थोड़ा हुनर सीख लो
भीड़ में शामिल होने का
उनके साथ घुल-मिल रहने का
जाहिर है इसके लिए
अपनी सच्चाई आत्मसम्मान को छोड़ना होगा
चापलूसी, मक्कारी, चमचागिरी,
बातो को लागलपेट कर बोलना सीखना होगा
क्या उम्र के इस पड़ाव पर अब सीख सकोगी
यदि हाँ तब तो स्वागत है
और यदि नहीं तो फिर
यूँ ही अकेले रहने की आदत डालो
और खुश रहो अपने आप में ही !
सुन अन्दर की आवाज चिंतित है
करें तो आखिर क्यां करें
शान से खुद मरे या
अपना जमीर ही मार डाले
पर क्या जमीर को खत्म कर हम जी सकेंगे ????????सविता मिश्रा

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Aachary Kashyap----
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bahut hi sundar rachna hai bahin.
Bahut hi marmik ......

Savita Mishra ने कहा…

dhanyvaad aachary bhaiya