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नवंबर 24, 2014

+कन्धा +

इतनी ज्यादा
मोटी हो रही है
कौन ढ़ोंयेगा इन्हें
कंधो पर अपने !
एम्बुलेस मंगा भेजवा देंगे
चिता नहीं अपितु
शवदाह गृह में जलवा देंगे |
tu chinta n karo
jhnjht साड़ी nitva|
आँख चुराते हुए
हाथों से अपने
मुहं छुपाते हुए
बोल रहा था वो!
शायद शर्म तनिक बाकी थी !

बीबी इशारा
करते हुए बोली
बूढ़ी भले ही हैं
माँ तुम्हारी पर
कान बड़े तेज हैं
धीरे बोलो तनिक
लेंगी सुन तो
ज़ायदाद से
हो जाओंगे बेदखल !

सुनकर भी बूढ़ी माँ ने
कर दिया अनसुना |
आकर कमरे में
विफर पड़ी बुढऊ पर अपने !

तुम तो स्वर्ग पधार गएँ
छोड़ मुझे मझधार
बेटे समझते है भार !
दो बेटे और दो दामाद
चार कंधो पर जाने का था अरमान
बच्चों के मिज़ाज देख
जैसे अब ये मुमकिन नहीं !

अतः तुम्हारी बात
टाल रही हूँ
ज़ायदाद सारी मैं
विधवा आश्रम को
भेंट कर रही हूँ !
शरीर की भी
नहीं करवानी हैं
इनसे दुर्गति
इसे भी मैं अभी ही
रुग्णालय को
दान कर रही हूँ !

जिन्हें कंधो पर बैठा
बड़ा किया हमने
उनके कंधो का हल्का
आज भार कर रही हूँ | सविता मिश्रा

1 टिप्पणी:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यथार्थ को कहती िसटीक प्रस्तुत