समर्थक

जुलाई 27, 2018

दोमुँहे-

"मन की"

दोमुँहों से रहना सदा बच के
चलो जरा संभल-संभल के

निंदक तक तो सब ठीक हैं
दुरी उनसे ,जो करते पीक हैं

दोमुँहें  होते हैं घातक बेहद
बचना उनसे मुश्किल है शायद

सामने मुँह पर लल्लो-चप्पो करते हैं
पीठ पीछे वही जहर उगलते फिरते हैं

सांप- छुछुंदर तो हैं आपस में दुश्मन
दोमुँहें तो आपके अपने बन छलते हैं

अतः चलना जरा उनसे संभल-संभल के
वर्ना हाथ मलते रहोगें खड़े हक्के-बक्के । 
सविता मिश्रा
 यूँ ही फालतू बकवास
हो कुछ हास-परिहास😊
:)

पुरानी कविता कमेंट में पड़ी हुई आज किसी के लाइक करने पर मिला💁
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1150622668309320&id=100000847946357

कोई टिप्पणी नहीं: