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फ़रवरी 04, 2015

~~सांचे में ढल ना सकीं ~~

मगरूर थी सांचे में ढल ना सकीं
ढ़लने चली तो साँचा ही न रहा |


बेकदरी के जमाने में कद्र कितनी
नापने चली तो कद्रदान ही ना रहा |

खुशियों के बादल घुमड़ते हरदम
भींगना चाहा जब तरसा वह रहा |

निश्चिन्त हो शांति तलासती थी कभी
आज शांति का लगा जमावड़ा रहा |

चीखते-चीखते गले पड़ी खराश
बोले बिन आज पड़ ख़राश रहा |

आगे-पीछे घूमते रहते थे लोग
पदमुक्त तब घर में अकाल रहा |..सविता मिश्रा

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