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फ़रवरी 22, 2015

जीवन ~

नाच-नाच के
थक गयी जब मैं
बैठ़ गई सुस्ताने 
पेड़ की छाँव में
पलक झपकते पेड़ 
ही न रहा
बूरन कंक्रीट के
जंगल में छाया 
की तलाश में
भटक रही हूँ 
समय पंख लगा
उड़ गया पल भर में
हताश मैं 
अंधी गली के 
कोने में पड़ी
जीवन का
चिन्तन कर रही हूँ 
एक एक कर के
यादो की परत हटाते हुए
देखो तो
अपने आप से ही
बात कर-करके
कभी आँखों में नमी
और चेहरे पर हंसी 
बिखरा रही हूँ मैं
हठ़ात् सडाँध 
का एक झोंका 
मुझे हकीक़त के 
दायरे में 
खींच लाता है 
मैं सोच रही 
हूँ 
आयेगा एक दिन ऐसा ही
सभी के जीवन में
फिर भी
भविष्य के लिये 
वर्तमान को
दांव पर लगते देख
घबरा रही हूँ मैं
स्वयं की जैसी गति देख
सभी गतिमान की
बेचैन हुई जा रही हूँ मैं
तरक्की की अंधी दौड़ में
भागते -भागते
जीवन की सच्चाई से
रूबरू हो कर
फिर से पेड़ की छाँव
तलाश रही हूँ मैं
कठपुतली सा मुझे
नचा-नचा के तू ना का  पर
नाच-नाच के थक गयी हूँ मैं| .....सविता मिश्रा
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3 टिप्‍पणियां:

Shiv Raj Sharma ने कहा…

बहुत अच्छा द्वंद्व ।

Naveen Kr Chourasia ने कहा…

BAHUT SUNDAR VICHAARPURN RACHANA!

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर..