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अक्तूबर 07, 2015

वर्चश्व-

स्त्री ही नहीं
कोई भी
विरोधी हो सकता हैं!
कभी भी
कहीं भी
कैसे भी
विरोध कर सकता हैं !

आखिर प्राणी ही तो हैं
अपना दबदबा
रहें बना
इसके लिए
करता रहता हैं मंथन!

अपने ही
अपने को
काटते रहते
  कि वर्चश्व
डिगे न कभी !

पर भूल जाते
हमारी ही तरह
दूसरा भी
करना चाहता हैं
अपना ही वर्चश्व कायम !

भले ही दबाना पड़े उसे
अपनी ही जाति को
धर्म को
राज्य को
समाज को
या फिर परिवार को !

इस वर्चश्व की
लड़ाई में सब शामिल !

 
क्याँ नर! क्या नारी!!क्याँ जानवर! 
और
 
क्याँ पेड़ पौधे !
सब के सब
दूजे को दबा
उठा लेते खुद को!!!
बस समझने की बात हैं
आँख की पट्टी को खोल।।।।sm

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