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जनवरी 09, 2014

====अतीत की दस्तक ===

दरवाजे पर
कितने भी ताले लगा
बंद कर दो
पर अतीत आ ही जाता है
ना जाने कैसे
दरवाजे की दस्तक
कितनी भी अनसुनी करो
पर अतीत की दस्तक
झकझोर देती है पट!!
एक-एक कर
यादों के जरिये
आती जाती है
मन मस्तिक पर
पुनः वही अकुलाहट
और कसमसाहट
अतीत के झरोखों से निकल
भावभंगिमा में बस जाती हैं
एक क्षण में आंसू
दुसरे ही क्षण
ख़ुशी चेहरे पर बिखेर
फिर दिल बहला जाती है
आसपास हमें
देखने वाला
पागल समझता है
उसे क्या मालुम
हम अतीत के विशाल समुन्दर में
गोते लगा रहे है
वर्तमान की छिछली नदी को छोड़|..सविता

2 टिप्‍पणियां:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर...कितना भी चाहो अतीत की यादें कहाँ पीछा छोड़ती हैं...

Savita Mishra ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद आपका कैलाश भैया