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अक्तूबर 06, 2014

~प्यार का धागा ~

प्यार के धागे को तोड़कर
बिखेर गया था वो
समेट रही हूँ उसे
गांठ पर गांठ डाल
जोड़ रही हूँ
जोड़ने के बाद
सोच में डूबी थी
क्या यह प्यार वही
पुराना प्यार पा सकेगा
अथवा जैसे इस पर
गांठे लग गयी है
उसी तरह उस प्यार पर भी
थोड़ी सी कड़वाहट की
परत पड़ जायेगी
हा शायद कुछ ऐसा ही होगा
क्योकि खोया हुआ प्यार
फिर मिल तो जाता है
पर ये प्यार वो प्यार
नहीं रह जाता है
इस प्यार को प्यार नहीं
समझौते का नाम दे दिया जाता है |
||सविता मिश्रा ||

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