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जुलाई 13, 2015

तुला पर जो कभी भी तूला--

तुला-तुला कर रहा
तुला का तू
जाने क्या मोल
न्यायाधीश की कुर्सी के पीछे
अटकी जिसकी साँसे
उससे जाके बोल |

तुला पर तूला जो
साँसे वह रखे रोक
सजा सुनते ही उसके
पड़ जाए घर में जो शोक |

पैसे कौड़ी का मोह नहीं
ना ही रखे घर द्वार
बेच के सब ले आये
न्याय तराजू में रख सब हार |

दर-दर डोला फिरे
न्याय मिले कहीं तो
पर मिलते मिलते न्याय
जिन्दगी गया हार वो |

धन दौलत सब कुछ तो लुट गया
साथ अपनों का भी छूट गया |
न्याय तुला सुरसा मुख में सब झोंके
रह गया वह अब तो कंगाल होंके |

जीवन मरण की तुला पर
पड़ गयी मौत भारी
मौत जैसे ही मिली
हुई कफन की तैयारी |

कफन भी नसीब नहीं अब
साहब था कभी डीके
मरना अच्छा है फिर
क्या करेगा कोई जीके |

न्याय तुलती है
 पट्टी बांधे आँख
छूट जाता वह
जो लुटाता लाख |

न्याय
 चक्रव्यूह बनी हमेशा
छूट न पाया कभी
अर्जुन सरीखा
तुला पर जो कभी भी तूला
न्याय तुला क्या कभी वो भूला |..सविता मिश्रा

2 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

अच्छी है !

Shiv Raj Sharma ने कहा…

अच्छी रचना । बधाई