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दिसंबर 16, 2012

~ अपने और गैर ~


तुम थे कभी अपने अब गैर क्यों हो गये,
वे थे कभी गैर अब अपने क्यों हो गये |
यह बात है मुझे कोसती,
मैं हूँ कि जबाब नहीं दे पाती |
जब मेरे पास दौलत थी सभी थे अपने,
आज क्यों हो गये सब के सब बेगाने |
आज वही लोग जिन्हें समझती थी मैं गैर,
सहारा दे रहे है मुझे दे रहे है आदर |
मुझे दुःख है कि मैं इंसान होकर भी,
इंसान को ना समझ सकी |

गैरों को अपना समझ कर अपना न सकी,
अपनों को गैर समझ कर भूला न सकी |
गैर है कि मेरे इतने हमदर्द हो गये ,
हम है कि इतने बेदर्द हो गये |
गैरों की जमात में खड़े अपनों को अपना ना सकी,
अपनों की खाल में छुपे हुए गैरों को ठुकरा न सकी |


सविता मिश्रा 

2 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यही जग की रीत है .... भाव प्रधान रचना ॥
मेरे ब्लॉग पर आने का शुक्रिया

राकेश कौशिक ने कहा…

"गैर है कि मेरे इतने हमदर्द हो गये,
हम है कि इतने बेदर्द हो गये|"