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अक्तूबर 08, 2013

.....आकाश तुम धरती बन जाओ.....


हे आकाश कुछ दिन तुम धरती बन जाओ
देखो कितना कुछ धरती सहती है
तुम दूर बैठ हँसते हो
नजदीक आ कहर ढाते हो
साथ मिलते हो जिस छोर
तो अंत होता हैं धरती का
हे आकाश कुछ दिन ही सही
तुम धरती बन जाओ....

धरती आकाश बन जाएगी
सबको अपने में समेट लेगी
दूरियाँ नजदिकिया बन जाएगी
धरती में सहने की आपर क्षमता हैं
सब के दुःख सह जाएगी
दुःख को सुखों में बदल
अमृत वर्षा कर जाएगी
हे आकाश कुछ दिन ही सही
धरती को आकाश बनने दो ....

आकाश तुम दूर क्षितिज तक फैले हो
देखो फिर भी कितने अकेल हो
तुहारी सतह तक पंक्षी उड़ते हैं
पर वह भी धरती पर आ सुकून पाते हैं
घर अपना आकाश में नहीं
धरती पर ही बनाते हैं
हे आकाश धरती सा धैर्य धर लो ....

बेवजह बादलों को चंचल ना होने दो
धरती को तोड़ने की साजिस में ना फंसने दो
बादल फट कभी भी धरती को ना मिटा पायेगा
बस कुछ शरारती बालक की तरह उत्पात ही कर जायेगा
धरती सहनशील हैं सब सह जाएगी
फिर से प्रफुल्लित और पुष्पित हो जाएगी
फिर से आकाश को झुकने को मजबूर कर जाएगी
हे आकाश तुम बहुत विशाल हो
अपनी बिशालता को अहम में ना फंसने दो
कुछ दिन ही सही धरती सा बन कर देखो ||
..
.सविता मिश्रा

3 टिप्‍पणियां:

Abhay Mishra ने कहा…

उम्दा रचना

देवेन्द्र ओझा ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

भावमय रचना ... धरती स बनना बहुत मुश्किल होता है ...