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मार्च 11, 2015

~बेटा ! तू क्या समझेगा ~

यह कविता हम यही फेसबुक पर किसी का स्टेटस पढ़े थे उसको पढ़ने के बाद लिखी वह भी स्टेटस अपने भाई के गंगा में डूब जाने पर थी .वह अपनी माँ पर कविता लिखना चाहते थे जहा तक हमें याद है बहुत दिन हो गया पढ़े अतः याद नहीं पर हा वह कवि ही कोई होगे यह अवश्य पता ..पता नहीं हम उनकी भावना को समझ पाए या नहीं पर इन पंक्तियों में अपनी भावना जरुर व्यक्त की है ........यह पंक्तिया उन भाई को समर्पित करते है ................
बेटा !
तू क्या समझेगा
माँ की वेदना
कभी
तू बेटा है अ
भी
बाप बनेगा कभी
पर माँ नहीं बन पायेगा |
बिन माँ बने कैसे समझेगा
माँ की भावनाएं
कैसे दर्द को
उसके
अपने अंतःकरण से
महसूस कर पायेंगा |
ढ़ेर सारी तकलीफ सह
जन्म दिया उसने
नाज-नखरे उठा तेरे
किया था बड़ा उसने |
जब वही अकाल ही
काल के गर्त में
समां जाता है
कितना कष्ट होता है
तू क्या समझेगा ?
आँख से पानी नहीं खून रिसता है
दिल भी पल-पल हर क्षण रोता है |
दिखे तुम्हें अश्रु भले ही ना
पर आँखे भर आती है
हर क्षण, पल पल
याद कर वह लम्हां |
शरीर क्या वह तो
लाश बन रह जाती है
तेरे लिए ही बस
सब कुछ सह जाती है |
बेटा !
तू क्या समझेगा
कभी माँ की बेदना
माँ को बहुत कुछ
पड़ता है सहना ..
बहुत ही सहना ...
ऐसे मंजर ना हो घटित
कभी किसी माँ के जीवन में
बस कर सकना तो यही
प्रार्थना तुम!
प्रभु के आगे सदैव  करना || .सविता मिश्रा

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