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मार्च 11, 2015

~उलझा विवाद~

बस अभी ऐसे ही लिख आये कैसे क्यों लिखे पता नहीं
Veeru Sonker bhai ki परेशानी पर
.....

उलझा विवाद
सुलझा क्या कभी
उलझता गया
जितना सुलझाया
तू तड़ाक कर
ख़त्म होते होते भी
फिर उलझा
ऐसे क्या सुलझा कभी
सुलझते उलझते

उलझते सुलझते

हम ही उलझ कर रह गये
बहती नदी के साथ
बहते बहते बह गये
ऐसा नहीं है कि
रुकना नहीं चाहा
चाहा ...
बहुत चाहा पर
क्या कभी रुक पाया
बल्कि लपेट लिया उसने
आस पास बहती
सारी नदी नालियों को | सविता बस यूँ ही

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