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फ़रवरी 12, 2017

तुम्हारे बिन-

तुम्हारे बिन-

सुनो !
तुम्हारे बलिष्ठ
सीने पर
सिर रखकर
जो सुकून मिलता था
वह इन मुलायम सी
तकियों में कहाँ
तुम्हारे बिन!

सुनो !
तुम्हारे बलशाली
बाहों का हार
गले में पड़कर
फूल सा लगता था
पर देखो न
यह हल्का-फुल्कासुगन्धित
गुलाबों का हार भी
बड़ा भारी सा
लग रहा है
आज मुझे
तुम्हारे बिन!

सुनो !
तुम्हारी वो
कठोर भाषा
और
सख्त लहजे में
बोल
ने का अंदाज भी
बांसुरी से बजाते थे
कानो में मेरे

आजकल
बच्चों की भी
प्यारी सी
तोतली भाषा
वो रस न
हीं घोल पाते
मेरे कानों मेंतुम्हारी तरह
तुम्हारे बिन!

सुनो !
सुन रहे हो न
याद आती बहुत
आजकल तुम्हारी
सपने में भी तुम
जागती आँखों में भी
तुम ही तुम !

सुन रहे हो न
आजकल मैं
आईने के सामने
होकर खड़ी
निहारती हूँ
खुद में ही
तुमको
तुम्हारे बिन!!! सविता मिश्रा

2 टिप्‍पणियां:

संजय भास्‍कर ने कहा…

सच कहती पंक्तियाँ .
नई पोस्ट ….शब्दों की मुस्कराहट पर आपका स्वागत है

Savita Mishra ने कहा…

शुक्रिया,