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मई 26, 2017

खिल उठे पलाश--mukesh dubeyभैया के 'कहानी संग्रह' की समीक्षा




गुबार नहीं है यह। दिल से निकली आवाज है। लेकिन दिल की गहराइयों से में कथाएं पोस्ट करते इस लिए इस को यहाँ ही पोस्ट करना मज़बूरी थी।..:)

कुछ मेरी कलम से---:)  

दस कहानियों में शब्दों की
हुई है सरलता से ऐसी झोकाई
जैसे की कोई जुतें हुए खेत में
बीज बो रहा हो किसान भाई।

पढ़ते पढ़ते पढ़ डाली थी कब की सारी
समीक्षा लिखनी थी तो एक बार फिर खंगाली
हतप्रभ थी कथानक की बुनावट देखकर
खाना भी भूली जबकि रोटी रखी थी सेंककर।

मिलकर आपकी विनम्रता तो देखे थे
जाना आपको 'दो शब्द' पढ़कर 
क्या कहानियां बनायी हैं आपने
दादी- नानी के किस्से से बढ़कर।

सामने पहली कहानी थी 'फासले'
'अंशुल', 'शर्मिष्ठा' को देखकर
'शालू' होने का था भ्रम पाले
अंत बड़ा सटीक लिख दिया
'अंशुल' ने अपना दिल-हाले ।

सच्ची प्रेम की महत्ता है आपने दर्शायी
मुझमें आगे पढ़ने की लालसा जाग आयी।

दूजी कथा 'सिद्धार्थ' और 'आरोही' की 'जुगलबन्दी'
पढ़ते-बढ़ते हुई चेहरे की मुस्कान थोड़ी मन्दी
दो दिलो का प्यार टूटकर बिखर रहा था
अंत में 'सिरोही' करके भाई तुसी कमाल कर दी।

'हकीकत' में असलियत की मिली झलकी
'आशिमा' की कहानी पढ़ के भुजा 'अक्षजा'की फड़की
ऐसे 'वैदिकों' की शायद कमी नहीं है
'अशिमाओं' को चाहिए दे 'वैदिकों' को अब पटकी।

'राज' और 'सोमी' की धीरे-धीरे बढ़ती
'सरहदे अपनी अपनी' की लवस्टोरी
पढ़ते हुए आँखे मेरी नम हो गयी
किताब रूप में प्यार की बन्द हुई तिजोरी।

'उसके हिस्से का दर्द' शीर्षक पढ़ा तो
सोचा किसके हिस्से में होगा दर्द?
पढ़ते ही आज की हकीकत समझ रूह काँप गयी
शक के दानव ने दिल के रिश्ते को किया गर्त।

'यही है सहर'
पत्नी के कहर से टूट चुका था
कि अचानक 'रोहित' को मिली 'गति' शाम के पहर
'गति' ने जो उसके जीवन को दी गति
तो लगा सच में यही तो है असली सहर।

'लिबास' दिल को झकझोरने में सफल हुई
कपड़े-लत्ते पर मानवीय संवेदना भारी पड़ी
यर्थार्थ को परिलिक्षित करा गयी
'श्रेया' कर रही एहसान इस भाव पर अंत में हथौड़ी पड़ी।

'खिल उठे पलाश' में कुछ तो था ख़ास
किताब का नाम यही, तो जगी एक आस
मान्यताओं को इस कहानी में धत्ता बता दिया
'शम्पा'  से दस साल छोटे 'आवि' की शादी करा दिया।

'आंतकवादी' में 'वीरा' की कहानी
आंतक के बीच लड़ती झाँसी की रानी
प्रेमी 'करतार' आतंकवादियों की मंशा करता फेल
'वीरा को कहना उसका करतारा आंतकवादी नहीं था'
अंत के इस वाक्य ने मेरी आँखों से आँसू दिया धकेल।

अंतिम कहानी 'कॉल सेंटर और पूस की रात'
इस कहानी में हुई है युवाओं की बात
बहकते युवाओं में 'अर्पित' की जिम्मेदारी भा गयी
अंत होते होते आधुनिक पूस की रात छा गयी।

शब्दों के खिलाड़ी ने
खूब खेल दिखाया है
हर कहानी में बड़ी खूबी से
मानवी संवेदना को भर पाया है।

देती हूँ मैं अपने शब्दों को अब यही पर विराम
"खिल उठे पलाश" को पढ़िए आप सब जल्दी हाथ में थाम।

नाम 'अक्षजा' रखा तो सोचा
कुछ नया सा मैं कर डालूँ

गद्य 'कहानी संग्रह' पढ़कर मैं
पद्य सी समीक्षा ही लिख डालूँ।

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
पढ़ने के बाद लिखने में कल कल होता रहा, कल जल्दी कब आता। इस लिए लिखने में बड़ी देर हो गयी। 

पर कहे थे कि लिखेंगे तो देर आये दुरुस्त आये वाले रास्ते पर चलकर दुबारा पढ़ी गयी कहानियां यह खुशी की भी बात न mukesh dubeyभैया।
बड़े हैं छोटा समझ गलती क्षमा करेंगे उम्मीद है

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